नई पीढ़ी नई चुनौती: बिलासपुर से कॅरिअर बनाने निकलीं दो बहनें, एक की नशे से मौत; दूसरी लड़ रही जिंदगी की जंग
बिलासपुर जिले की दो बहनों की कहानी युवाओं में बढ़ती नशे की समस्या की गंभीर तस्वीर पेश करती है। परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने और नौकरी की तलाश में घर से बाहर गईं दोनों बहनें गलत संगत के कारण नशे की चपेट में आ गईं। एक बहन की मौत हो गई, जबकि दूसरी काउंसलिंग और इलाज के सहारे सामान्य जीवन में लौटने का प्रयास कर रही है। विशेषज्ञ परिवारों से बच्चों के साथ लगातार संवाद बनाए रखने की सलाह दे रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर...
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मौजूदा समय में युवा सपनों का बोझ जिंदगी पर भारी पड़ रहा है। परिवार का सहारा बनने और कॅरिअर का बढ़ता दबाव आज नई पीढ़ी के सामने एक मानसिक चुनौती पेश कर रहा है। अपने सपने पूरा करने के लिए घर से दूर जाने वाले युवा मानसिक तनाव, अकेलेपन और गलत संगत के बीच ऐसे फैसले ले लेते हैं, जो उनकी पूरी जिंदगी बदल देते हैं। इसका फायदा नशे के काले धंधे में लगे लोग भी उठा रहे हैं।
बिलासपुर जिले के एक गरीब परिवार की दो बहनों की कहानी ऐसी ही त्रासदी बयां करती है। मां के सपनों को पूरा करने के लिए चंडीगढ़ गईं दोनों बहनें चिट्टे की गिरफ्त में आ गईं। एक की ओवरडोज से मौत हो गई जबकि दूसरी काउंसलिंग और इलाज के सहारे नशे से बाहर निकलकर जिंदगी की नई शुरुआत करने की कोशिश कर रही है। यह घटना बताती है कि नशे की जड़ केवल लत नहीं, बल्कि अधूरे सपनों, मानसिक दबाव और सामाजिक असुरक्षा का वह संगम है, जो युवाओं को धीरे-धीरे विनाश की ओर धकेल रहा है।
घुमारवीं उपमंडल के एक अत्यंत गरीब परिवार में पिता के देहांत के बाद मां ने मजदूरी कर अपनी दो बेटियों का पालन-पोषण किया। अभावों के बावजूद मां ने दोनों को 12वीं तक पढ़ाने के साथ कंप्यूटर का डिप्लोमा भी कराया। मां की उम्मीद थी कि बेटियां रोजगार कर परिवार की जिम्मेदारी संभालेंगी और गरीबी से बाहर निकालेंगी। करीब पांच साल पहले दोनों बहनें रोजगार की तलाश में चंडीगढ़ चली गईं। शुरुआती दिनों में सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन चंडीगढ़ पहुंचने के कुछ समय बाद बेटियां गलत संगत में पड़ गईं।
दोस्तों के साथ सिर्फ आजमाने के तौर पर शुरू हुआ नशा देखते ही देखते जानलेवा लत में बदल गया। परिवार को बेटियों के व्यवहार में अचानक आए बदलाव, पैसों की बेवजह मांग और कम होती बातचीत से शक हुआ। जब परिवार ने समझाने और इलाज कराने की कोशिश की, तब तक लत काफी गहरी हो चुकी थी।
पिता की मौत के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई। आर्थिक हालात कमजोर होने के बावजूद मां ने मजदूरी कर दोनों बेटियों को पढ़ाया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया। घर से दूर चंडीगढ़ में रहने के कारण उन पर परिवार की सीधी निगरानी भी कम हो गई। इसी दौरान वे ऐसे लोगों के संपर्क में आईं, जिनकी वजह से धीरे-धीरे नशे की दुनिया में पहुंच गईं।
घर से बाहर रहकर पढ़ाई या नौकरी करने वाले युवाओं पर परिजनों को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। बच्चों से नियमित संवाद बनाए रखना, व्यवहार में अचानक आए बदलावों पर नजर रखना और शक होने पर बिना झिझक तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहद जरूरी है। जो युवा नशे की चपेट में आ चुके हैं, उनके लिए सामाजिक तिरस्कार नहीं, बल्कि समय पर इलाज, काउंसलिंग और परिवार का सहयोग ही सबसे बड़ा सहारा है।- डॉ. रवि चंद शर्मा, कुलपति एमएमयू, पूर्व प्राचार्य आईजीएमसी, शिमला