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Chamba News: पहली बार जमीन छोड़ सोफों पर बैठे वीआईपी
Mon, 27 Jul 2026 11:05 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Mon, 27 Jul 2026 11:05 PM IST
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अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले की सांस्कृतिक संध्या में टूटी दशकों पुरानी परंपरा
संस्कृति प्रेमियों ने जताई चिंता, बोले- नजर नहीं आई सादगी और अपनापन
संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले की सांस्कृतिक संध्या इस बार सिर्फ रंगारंग प्रस्तुतियों के लिए ही नहीं, बल्कि एक ऐसे बदलाव के लिए भी चर्चा में रही जिसने दशकों पुरानी परंपरा पर सवाल खड़े कर दिए।
वर्षों से मुख्यातिथि और प्रशासनिक अधिकारी आम दर्शकों के बीच जमीन पर बैठकर कार्यक्रमों का आनंद लेते थे लेकिन इस बार पहली बार उनके लिए वीआईपी सोफों की व्यवस्था की गई। इस बदलाव ने मेले की सादगी, समानता और सांस्कृतिक पहचान को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
सादगी लंबे समय से मिंजर मेले की खास पहचान रही है। जमीन पर बैठकर कार्यक्रम देखना केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि आम जनता और प्रशासन के बीच जुड़ाव, समानता और चंबियाली संस्कृति की भावना का प्रतीक माना जाता रहा है। यही कारण है कि इस बदलाव को लेकर कई वरिष्ठ नागरिकों और संस्कृति प्रेमियों ने निराशा जताई है।
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वरिष्ठ भाजपा नेता रविंद्र सिंह किश्तवाड़िया ने कहा कि वह कई वर्षों से मिंजर मेले की सांस्कृतिक संध्याएं देखते आ रहे हैं। अब तक हर बार मुख्यातिथि और प्रशासनिक अधिकारी जमीन पर बैठकर कार्यक्रमों का आनंद लेते थे। इससे मेले का माहौल अलग ही होता था। इस बार पहली सांस्कृतिक संध्या में वर्षों पुरानी परंपरा बदल गई। वीआईपी सोफों की व्यवस्था के कारण वह सादगी और अपनापन नजर नहीं आया। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी कौन सी आवश्यकता आ गई कि वर्षों से चली आ रही परंपरा को बदलना पड़ा। विकास और बदलाव जरूरी हैं लेकिन बदलाव ऐसा होना चाहिए जिससे ऐतिहासिक परंपराओं की आत्मा प्रभावित न हो।
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संस्कृति प्रेमियों ने जताई चिंता, बोले- नजर नहीं आई सादगी और अपनापन
संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले की सांस्कृतिक संध्या इस बार सिर्फ रंगारंग प्रस्तुतियों के लिए ही नहीं, बल्कि एक ऐसे बदलाव के लिए भी चर्चा में रही जिसने दशकों पुरानी परंपरा पर सवाल खड़े कर दिए।
वर्षों से मुख्यातिथि और प्रशासनिक अधिकारी आम दर्शकों के बीच जमीन पर बैठकर कार्यक्रमों का आनंद लेते थे लेकिन इस बार पहली बार उनके लिए वीआईपी सोफों की व्यवस्था की गई। इस बदलाव ने मेले की सादगी, समानता और सांस्कृतिक पहचान को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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सादगी लंबे समय से मिंजर मेले की खास पहचान रही है। जमीन पर बैठकर कार्यक्रम देखना केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि आम जनता और प्रशासन के बीच जुड़ाव, समानता और चंबियाली संस्कृति की भावना का प्रतीक माना जाता रहा है। यही कारण है कि इस बदलाव को लेकर कई वरिष्ठ नागरिकों और संस्कृति प्रेमियों ने निराशा जताई है।
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वरिष्ठ भाजपा नेता रविंद्र सिंह किश्तवाड़िया ने कहा कि वह कई वर्षों से मिंजर मेले की सांस्कृतिक संध्याएं देखते आ रहे हैं। अब तक हर बार मुख्यातिथि और प्रशासनिक अधिकारी जमीन पर बैठकर कार्यक्रमों का आनंद लेते थे। इससे मेले का माहौल अलग ही होता था। इस बार पहली सांस्कृतिक संध्या में वर्षों पुरानी परंपरा बदल गई। वीआईपी सोफों की व्यवस्था के कारण वह सादगी और अपनापन नजर नहीं आया। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी कौन सी आवश्यकता आ गई कि वर्षों से चली आ रही परंपरा को बदलना पड़ा। विकास और बदलाव जरूरी हैं लेकिन बदलाव ऐसा होना चाहिए जिससे ऐतिहासिक परंपराओं की आत्मा प्रभावित न हो।