Himachal: विभाग समान पदों पर बैठे कर्मचारियों के बीच भेदभाव नहीं कर सकता, जानें हाईकोर्ट के बड़े आदेश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के एक आदेश को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि सरकार या कोई भी विभाग समान पदों पर काम कर रहे दो कर्मचारियों के बीच लाभ देने के मामले में भेदभाव नहीं कर सकता।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के एक आदेश को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि सरकार या कोई भी विभाग समान पदों पर काम कर रहे दो कर्मचारियों के बीच लाभ देने के मामले में भेदभाव नहीं कर सकता। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को सहायक अभियंता के रूप में 9 वर्ष की सेवा पूरी करने पर अश्योर्ड कॅरिअर प्रोग्रेशन योजना के तहत उच्च वेतनमान का लाभ दिया जाए। साथ ही फैसले की तारीख से वास्तविक वित्तीय लाभ जारी किए जाएं। अदालत ने यह फैसला सेवानिवृत्त सहायक अभियंता धनी राम वर्मा की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए दिया।
याचिकाकर्ता फरवरी 1973 में जूनियर इंजीनियर के रूप में भर्ती हुए थे। दिसंबर 2001 में उन्हें नियमित तौर पर सहायक अभियंता के पद पर पदोन्नत किया गया। अप्रैल 2011 में वह सेवानिवृत्त हो गए। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उनके ही विभाग के एक अन्य सेवानिवृत्त सहायक अभियंता को विभागीय परीक्षा पास न करने के बावजूद सरकार ने साल 2018 में उच्च वेतनमान (4-9-14 समयबद्ध वेतनमान) का लाभ दे दिया था। लेकिन उन्होंने इसी लाभ के लिए आवेदन किया, तो सरकार ने 6 सितंबर 2022 को एक आदेश जारी कर उनका दावा यह कहकर खारिज कर दिया कि उन्होंने विभागीय परीक्षा पास नहीं की है।
वहीं सरकार की ओर से साल 2020 में वित्त विभाग ने स्पष्टीकरण जारी किया। इसके तहत उच्च वेतनमान (एसीपी) का लाभ केवल उन्हीं को दिया जा सकता है, जिन्होंने अनिवार्य विभागीय परीक्षा पास की हो। अदालत ने कहा कि जब लाभ पाने वाला कर्मचारी और याचिकाकर्ता दोनों एक ही परिस्थिति में थे (दोनों ने विभागीय परीक्षा पास नहीं की थी), तो विभाग केवल एक को लाभ देकर दूसरे के साथ भेदभाव नहीं कर सकता। वर्ष 2007 के हिमाचल प्रदेश विभागीय परीक्षा नियम संशोधन के तहत 55 वर्ष की आयु पार कर चुके राजपत्रित अधिकारियों को उच्च वेतनमान के लिए विभागीय परीक्षा पास करने की अनिवार्यता से छूट दी गई थी।
किन्नौर में पर्यावरणीय नुकसान पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार समेत सभी पक्षों को नोटिस
प्रदेश हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग-5 और किन्नौर जिले में ठोस कचरा प्रबंधन नियमों के उल्लंघन और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के कारण पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर कड़ा संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सौरव कुमार नेगी की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार, पर्यावरण विभाग और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त को होगी। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2026 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 को पूरी तरह लागू किया जाए। इसके साथ ही स्थानीय युवाओं के लिए स्थायी ग्रीन जॉब्स सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय क्षेत्र विकास प्राधिकरण और कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड का एक निश्चित हिस्सा आरक्षित करने की मांग की गई है।
याचिका में प्लास्टिक बाय-बैक फंड, किन्नौर गेट ग्रीन सेस और पर्यावरण मुआवजा शुल्क जैसे राजस्व को मिलाकर एक ट्राइबल इको-ग्रिड पर्यावरण और आजीविका कोष बनाने का आग्रह किया गया है।याचिका में आरोप लगाया गया है कि क्षेत्र में चल रहे हाइड्रो पावर प्रोजेक्टों की ओर से की जा रही ब्लास्टिंग और उससे उड़ने वाली धूल के कारण सेब बगीचे तबाह हो रहे हैं। इसके लिए बागवानी विभाग और हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से संयुक्त नुकसान मूल्यांकन कराने की मांग की गई है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला पूरी तरह से न्यायिक निगरानी का है। सभी हाइड्रो प्रोजेक्ट राज्य को 12 फीसदी मुफ्त बिजली देते हैं, जबकि संबंधित क्षेत्र के लिए एक फीसदी अतिरिक्त बिजली और राज्य सरकार से एक फीसदी मैचिंग ग्रांट का प्रावधान है। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि लाडा और सीएसआर के इस दो फीसदी फंड का इस्तेमाल किन्नौर में प्रभावित क्षेत्र के विकास के लिए कैसे किया जा रहा है। सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया गया कि प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पास उपलब्ध कॉर्पस फंड को प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (कैंपा) परियोजना के तहत राज्य सरकार को स्थानांतरित किया जाएगा। अदालत ने सरकार से इस संबंध में सभी आवश्यक विवरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
सहानुभूति के आधार पर नहीं बदला जा सकता हाजिरी का कानून
प्रदेश उच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश नेशनल लाॅ यूनिवर्सिटी के एक छात्र की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें छात्र को 9वें सेमेस्टर की कक्षाओं में बैठने और 8वें सेमेस्टर की परीक्षा देने की अंतरिम अनुमति देने से इन्कार कर दिया गया था। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय ने नियमों और छात्र के शैक्षणिक हित दोनों को ध्यान में रखकर ही निर्णय लिया है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार डिग्री जारी करते समय विश्वविद्यालय को यह प्रमाणित करना होता है कि छात्र ने अनिवार्य हाजिरी पूरी की है। अदालत ने कहा कि केवल सहानुभूति के आधार पर वैधानिक नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती। विश्वविद्यालय ने दिसंबर 2025 में अपीलकर्ता छात्र को 7वें सेमेस्टर में हाजिरी की कमी के कारण परीक्षा में बैठने से रोक दिया था। विश्वविद्यालय के परीक्षा नियमों के तहत न्यूनतम 70 फीसदी हाजिरी अनिवार्य है, जबकि छात्र की अटेंडेंस केवल 53.02 फीसदी थी। हालांकि, पूर्व में अदालत के अंतरिम आदेशों के तहत छात्र ने अंतिम रूप से परीक्षा दी थी और 8वें सेमेस्टर की कक्षाएं भी लगाई थी, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि इससे छात्र के पक्ष में कोई स्थायी अधिकार पैदा नहीं होती।