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हाईकोर्ट का फैसला: दूसरे राज्यों से ब्याह कर आई महिलाओं को हिमाचल में नहीं मिलेगा आरक्षण

संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 03 Jun 2026 05:00 AM IST
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सार

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि दूसरे राज्यों से शादी कर राज्य में बसी आरक्षित वर्ग ओबीसी और एससी की महिलाएं यहां आरक्षण के लाभ का दावा नहीं कर सकतीं। 

hp High Court Verdict: Women Married in from Other States Will Not Receive Reservation in Himachal
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि दूसरे राज्यों से शादी कर राज्य में बसी आरक्षित वर्ग ओबीसी और एससी की महिलाएं यहां आरक्षण के लाभ का दावा नहीं कर सकतीं। भले ही वे महिलाएं अपने गृह राज्य में आरक्षित श्रेणी में आती हों और हिमाचल में भी उनकी जाति आरक्षित हो। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने फैसले में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि विवाह के बाद जिस राज्य में कोई व्यक्ति विस्थापित होता है, वहां उसे आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। इससे पहले अदालत की एकल पीठ ने नवंबर 2024 और मई 2026 के बीच इन महिलाओं की याचिकाएं खारिज की थीं। खंडपीठ ने भी राज्य सरकार के रुख को सही पाया है और महिलाओं की अपीलों को खारिज कर दिया। खंडपीठ ने यह आदेश जसवंत कौर और अन्य तीन अलग-अलग दायर अपीलों को खारिज करते हुए दिया है।

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उल्लेखनीय है कि अपीलकर्ताओं में से दो महिलाएं पंजाब की सैनी जाति ओबीसी से थी, जबकि तीसरी हरियाणा के वाल्मीकि समुदाय अनुसूचित जाति (एससी) से थी। इन सभी ने हिमाचल में अपनी ही जातियों के पुरुषों से विवाह किया था। हिमाचल प्रदेश में भी सैनी और वाल्मीकि दोनों जातियों को ओबीसी और एससी के रूप में मान्यता है। इन महिलाओं को बोनाफाइड हिमाचली (स्थायी निवासी) प्रमाणपत्र भी जारी किए जा चुके थे। इसी आधार पर उन्होंने राज्य सरकार की नौकरियों व अन्य क्षेत्रों में आरक्षण मांगा था, जिसे सरकार ने यह कहकर खारिज किया था कि उनका जन्म हिमाचल में नहीं हुआ है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के पुराने फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से बंधे हैं। उस मामले में भी पंजाब की एक वाल्मीकि जाति की महिला ने उत्तराखंड में उसी जाति के पुरुष से शादी की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे उत्तराखंड में आरक्षण का लाभ देने से मना कर दिया था।

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