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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   International Kullu Dussehra concludes with 'Lanka Dahan'; chariot procession held in the presence of 60 deiti

वीडियो: लंका दहन के साथ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा का समापन, 60 देवी-देवताओं की मौजूदगी में निकाली रथयात्रा

Tue, 27 Oct 2026 06:56 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू।
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू। Published by: Krishan Singh Updated Tue, 27 Oct 2026 06:56 PM IST
सार

सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का लंका दहन के साथ समापन हो गया है। लंका दहन की रस्म लंकाबेकर में निभाई गई। उत्सव के अंतिम दिन मंगलवार दोपहर बाद 3:47 बजे भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर से रथयात्रा शुरू हुई। 

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International Kullu Dussehra concludes with 'Lanka Dahan'; chariot procession held in the presence of 60 deiti
कुूल्लू दशहरा का समापन। - फोटो : संवाद

विस्तार

ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का लंका दहन के साथ समापन हो गया है। लंका दहन की रस्म लंकाबेकर में निभाई गई। उत्सव के अंतिम दिन मंगलवार दोपहर बाद 3:47 बजे भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर से रथयात्रा शुरू हुई। भगवान रघुनाथ रथ में सवार हुए। रथ के चारों तरफ करीब 60 देवी-देवता ढोल नगाड़ों के साथ यात्रा में शामिल हुए। जय श्रीराम की ध्वनि के साथ रथयात्रा आगे बढ़ी। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने रथ के रस्से को खींचते हुए 4:05 बजे रथ पशु मैदान पहुंचाया। यहां से राज परिवार के सदस्यों और माता हिडिंबा के गूर लंकाबेकर की ओर निकले और लंकाबेकर में करीब 15 मिनट देव नियमों का निर्वहन किया और उसके बाद लौटे। जैसे ही माता हिडिंबा के गूर लौटे, उसके बाद माता भी वापस रवाना हो गई। रथ वापस यहां से 4:30 बजे रवाना हुआ। जहां से भगवान रघुनाथ अपने देवालय के लिए पालकी में सवार होकर लौटे। इसी के साथ दशहरा उत्सव संपन्न हो गया है। रथयात्रा के दौरान श्रद्धालुओं और देवलुओं में काफी उत्साह देखा गया। रथ के रस्से को खींचने के लिए होड़ लगी रही। रास्ते में कई जगह पुलिस को व्यवस्था बनाने में भी काफी कसरत करनी पड़ी। उत्सव के अंतिम दिन करीब एक लाख श्रद्धालु जुटे थे।

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प्रतीकात्मक लंका दहन किया
देशभर में जहां विजयदशमी पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाकर दशहरे का समापन किया जाता है। वहीं कुल्लू दशहरा उत्सव के अंतिम दिन भगवान रघुनाथ की अगुवाई में लंका दहन की अनूठी परंपरा निभाई गई। इस दौरान मिट्टी और गोबर से बनाए गए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के मुखौटों के साथ झाड़ियों को सांकेतिक रूप से जलाया गया। इस परंपरा में न आतिशबाजी होती है और न ही बड़े-बड़े पुतलों का दहन। सदियों पुरानी यह परंपरा कुल्लू की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है।

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ढाई बजे से शुरू हुई थी तैयारियां
भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर में ढाई बजे से तैयारियां शुरू हो गई थीं। यात्रा शुरू होने से पहले नरसिंह भगवान की जलेब ढाई बजे राजा की चानणी से शुरू हुई और क्षेत्रीय अस्पताल, कॉलेज गेट, कलाकेंद्र होते हुए वापिस पहुंची। उसके बाद यहां रथयात्रा निकालने के लिए देव परंपरा का निर्वाहन किया गया। देवी-देवता अपने अस्थायी शिविर से रथ के पास पहुंचने शुरू हुए और उसके बाद लंका पर चढ़ाई के लिए रथ आगे बढ़ा। भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह का कहना है कि दशहरा उत्सव पूरे रस्म के साथ संपन्न हो गया है। इसमें देवी-देवताओं और देव समाज से जुड़े लोगों ने परंपरा निभाने में अपना योगदान दिया है।

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