हिमाचल प्रदेश: अब सूरज की रोशनी से शुद्ध होगा झरनों का पानी, आईआईटी मंडी विकसित कर रहा नई तकनीक; जानें
हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करवाने के लिए आईआईटी मंडी सौर ऊर्जा आधारित जल शुद्धिकरण तकनीक विकसित कर रहा है।
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हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी एक महत्वपूर्ण शोध परियोजना पर काम कर रहा है। इस परियोजना के तहत सूरज के प्रकाश और फोटो-इलेक्ट्रोकेमिकल तकनीक की मदद से हिमालयी प्राकृतिक जलस्रोतों, झरनों के पानी को शुद्ध करने वाली प्रणाली विकसित की जाएगी। इसका उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को कम लागत पर स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के लिए एक प्रभावी और टिकाऊ विकल्प तैयार करना है। इस तकनीक में फोटो-इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें प्रकाश-संवेदी सामग्री और विद्युत-रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से हानिकारक प्रदूषकों को हटाया जाएगा।
शोध में ऐसी प्रणाली विकसित करने पर जोर है, जो पानी में मौजूद सूक्ष्म जीवों और हानिकारक कार्बनिक पदार्थों के निष्कासन में मदद कर सके। इस शोध की खास बात यह है कि इसमें सौर ऊर्जा के उपयोग पर जोर दिया गया है। हिमालय के कई दूरस्थ गांवों में बिजली और आधुनिक जल शुद्धिकरण सुविधाओं की उपलब्धता सीमित है। ऐसे में सौर ऊर्जा आधारित तकनीक भविष्य में इन क्षेत्रों के लिए उपयोगी साबित होगी। शोध के शुरुआती चरण में मंडी के कटौला, घोड़ा फार्म और स्कूल बाजार स्थित तीन प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी के नमूने लेकर उनकी गुणवत्ता और उनमें मौजूद सूक्ष्मजीवों की जांच की गई है। इसके आधार पर सौर ऊर्जा आधारित जल शुद्धिकरण प्रणाली विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। प्रस्तावित प्रणाली का पहले प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाएगा और इसके बाद आईआईटी मंडी परिसर के आसपास स्थित झरनों पर प्रभावशीलता परखी जाएगी।
इस प्रक्रिया के जरिये यह आकलन किया जाएगा कि सूर्य के प्रकाश पर आधारित फोटो-इलेक्ट्रोकेमिकल तकनीक प्राकृतिक जलस्रोतों के पानी से प्रदूषकों को हटाने में कितनी कारगर साबित होती है। परियोजना का नेतृत्व प्रो. प्रेम फेलिक्स सिरिल कर रहे हैं। इसे नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज (एनएमएचएस) के तहत वित्तीय सहायता दी गई है।
हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक झरने लंबे समय से पेयजल के प्रमुख स्रोत रहे हैं। हालांकि, प्राकृतिक जलस्रोतों का पानी हमेशा पीने के लिए सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए पानी को पीने योग्य बनाने के लिए प्रभावी शुद्धिकरण व्यवस्था जरूरी है। प्रस्तावित शोध में छोटे स्तर पर काम करने वाली और निरंतर प्रवाह वाली जल शुद्धिकरण प्रणाली विकसित करने की योजना है। यदि यह तकनीक सफल रहती है, तो इसका इस्तेमाल उन क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहां पारंपरिक जल शुद्धिकरण सुविधाएं स्थापित करना मुश्किल या महंगा है।