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Solan News: नौणी विवि और देव संस्कृति विवि करेंगे अपशिष्ट से संपदा अनुसंधान में सहयोग

Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sat, 20 Jun 2026 01:06 AM IST
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Nauni University and Dev Sanskriti University to collaborate on 'waste-to-wealth' research.
हरिद्वार स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय का दौरा करते नौणी विवि का  प्रतिनिधिमंडल। स्रोत : नौण
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विश्वविद्यालय के प्रतिनिधिमंडल ने किया देव संस्कृति विवि हरिद्वार का दौरा


संवाद न्यूज एजेंसी

सोलन। नौणी विश्वविद्यालय के एक प्रतिनिधिमंडल ने हरिद्वार स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय का दौरा किया। इस यात्रा का उद्देश्य अपशिष्ट से संपदा आधारित अनुसंधान और शिक्षा में सहयोग की संभावनाओं को तलाशना था। यह पहल सतत नवाचार और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों पर अनुसंधान को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कुलपति एचएस बवेजा ने किया। नौणी विश्वविद्यालय औद्यानिकी, वानिकी और खाद्य प्रौद्योगिकी में अग्रणी है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणालियों के वैज्ञानिक प्रमाणीकरण के लिए जाना जाता है। प्रस्तावित सहयोग का लक्ष्य पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से जोड़ना है। इसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और नवाचार आधारित अनुसंधान के लिए एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है। विशेष रूप से, गोबर और गोमूत्र जैसे गो-आधारित उप-उत्पादों के मूल्य संवर्धन पर जोर दिया जाएगा। उन्नत प्रसंस्करण तकनीकों के विकास और उनकी व्यावसायिक संभावनाओं के दोहन पर भी ध्यान दिया जाएगा। दौरे के दौरान, प्रतिनिधिमंडल ने देव संस्कृति विवि के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से विस्तृत चर्चा की।
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कुलपति एचएस बवेजा ने देव संस्कृति विवि के प्रति-कुलपति चिन्मय पंड्या से मुलाकात की। दोनों पक्षों ने संस्थागत सहयोग की संभावनाओं तथा व्यापक समझौता ज्ञापन पर विचार-विमर्श किया। प्रतिनिधिमंडल ने उन्नत गोपालन केंद्रों और गोबर-गोमूत्र प्रसंस्करण इकाइयों का भी दौरा किया। उन्होंने उन इकाइयों का निरीक्षण किया जहां जैविक संसाधनों से कपड़े और कागज जैसे पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद बन रहे हैं।
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दौरे का एक मुख्य आकर्षण विद्यार्थियों एवं युवा उद्यमियों के साथ संवादात्मक सत्र रहा। प्रतिनिधिमंडल ने देखा कि युवा कौशल विकास से जैविक अपशिष्ट को उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदल रहे हैं। यह मॉडल आत्मनिर्भर भारत तथा सतत संपदा सृजन के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप है। प्रस्तावित सहयोग से वानिकी शिक्षा, खाद्य विज्ञान और सतत ग्रामीण उद्यमिता के क्षेत्र में नए अवसर सृजित होंगे। यह देश में अभिनव अपशिष्ट से संपदा प्रौद्योगिकियों के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। साथ ही, पर्यावरण-अनुकूल व्यावसायिक मॉडलों को भी बढ़ावा मिलेगा।
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