Himachal: सीपीआरआई ने तैयार कीं नई किस्में कुफरी अभेद्य और कुफरी रूबी, बदलेगी किसानों की तकदीर
केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के निदेशक ब्रजेश सिंह ने कहा कि यह अधिसूचना हिमाचल प्रदेश के लिए विशेष महत्व रखती है। हिमाचल में आलू राज्य की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है और हजारों पर्वतीय किसानों की आजीविका का मुख्य आधार है।
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भारत सरकार ने केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला की ओर से विकसित आलू की दो नई किस्में कुफरी अभेद्य और कुफरी रूबी खेती के लिए अधिसूचित की हैं। यह अधिसूचना भारत के राजपत्र में प्रकाशित हुई। इससे देशभर में आलू उत्पादन, रोग प्रबंधन और किसानों के लिए बेहतर बाजार अवसर उपलब्ध होंगे। केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के निदेशक ब्रजेश सिंह ने कहा कि यह अधिसूचना हिमाचल प्रदेश के लिए विशेष महत्व रखती है। हिमाचल में आलू राज्य की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है और हजारों पर्वतीय किसानों की आजीविका का मुख्य आधार है।
ब्रजेश सिंह ने कहा कि इन किस्मों की अधिसूचना भारत की जलवायु-अनुकूल, रोग-प्रतिरोधी तथा बाजार की मांग के अनुरूप आलू की उन्नत किस्में विकसित करने की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे देश की गुणवत्तायुक्त बीज प्रणाली को मजबूती मिलेगी, उन्नत प्रौद्योगिकियों के प्रसार में तेजी आएगी तथा किसानों की उत्पादकता और आय में वृद्धि होगी। अधिसूचित होने के बाद इन किस्मों के गुणवत्तायुक्त बीजों का उत्पादन, प्रमाणीकरण और बिक्री उनके अनुशंसित क्षेत्रों में की जा सकेगी।
कुफरी अभेद्य की विशेषताएं
वरिष्ठ वैज्ञानिक शैलेज सूद ने कुफरी अभेद्य की जानकारी दी। यह मध्यम अवधि 110-120 दिन में तैयार होने वाली उच्च उत्पादकता वाली किस्म है, जो खरीफ में 25-30 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे सकती है। इसकी मुख्य विशेषता लेट ब्लाइट और पोटेटो सिस्ट निमेटोड के प्रति उच्च प्रतिरोध है। यह पर्वतीय क्षेत्रों में इन रोगों के प्रति प्रतिरोधी देश की पहली उच्च उत्पादक किस्म है। इसे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय क्षेत्रों, तमिलनाडु के नीलगिरि तथा कर्नाटक एवं महाराष्ट्र के पठारी क्षेत्रों के लिए अनुशंसित किया गया है।
कुफरी रूबी और इसके लाभ
शैलेज सूद ने दूसरी किस्म कुफरी रूबी के बारे में बताया। इसे देश के मैदानी क्षेत्रों में बढ़ रहे बेबी पोटेटो बाजार की मांग के लिए विकसित किया गया है। यह मध्यम अवधि में 23-25 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन देती है, जिसमें 90 दिनों में लगभग 60 फीसदी कंद बेबी पोटेटो के रूप में मिलते हैं।
यह विशेषता इसे ताजा बाजार, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और होटल क्षेत्र के लिए उपयुक्त बनाती है। इसे हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, असम, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा महाराष्ट्र सहित प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों के लिए अधिसूचित किया गया है।