विश्व हृदय दिवस: हिमाचल में दिल के रोगियों पर इलाज का बोझ, कई संपत्ति बेचकर उपचार करवाने को मजबूर
प्रदेश में 10 में से सात मरीजों के पास किसी भी प्रकार का स्वास्थ्य बीमा या वित्तीय सुरक्षा नहीं हैं। हैरत की बात तो यह है कि कई मरीजों को संपत्ति बेचकर उपचार करवाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
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हिमाचल समेत देशभर में 70 फीसदी हृदय रोगियों के पास उपचार करवाने का सुरक्षा कवच कमजोर है। प्रदेश में 10 में से सात मरीजों के पास किसी भी प्रकार का स्वास्थ्य बीमा या वित्तीय सुरक्षा नहीं हैं। हैरत की बात तो यह है कि कई मरीजों को संपत्ति बेचकर उपचार करवाने पर मजबूर होना पड़ रहा है। इसके अलावा हार्ट फेलियर से संबंधित बीमारी का उपचार करवाने के लिए कई मरीज कर्ज तले दब चुके हैं, क्योंकि उनका लंबा उपचार चलता है। मरीजों को कई बार अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ता है। हालात ऐसे हैं कि गंभीर बीमारी के उपचार के लिए सरकार की ओर से भी कोई अलग से बीमा योजनाएं नहीं चलाई गई हैं। इस कारण मरीजों के हर साल लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (आईजीएमसी) के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. प्रकाश चंद नेगी ने देश के कार्डियोलॉजिस्ट्स के साथ मिलकर यह अध्ययन किया है।
शिमला समेत 21 राज्यों के 53 अस्पतालों में हुआ अध्ययन
शिमला समेत 21 राज्यों के 53 अस्पतालों में अध्ययन के बाद हैरान करने वाले खुलासे हुए हैं। यह अध्ययन मार्च 2026 में अंतरराष्ट्रीय जर्नल ग्लोबल हार्ट में प्रकाशित हुआ है। देशभर में हृदय बीमारी से पीड़ित मरीजों के वित्तीय और क्लीनिकल डेटा का विश्लेषण किया गया। इसमें पता चला कि मरीजों का औसतन 1.06 लाख रुपये सालाना खर्च हो रहा है। इसके अलावा 37.7 फीसदी परिवार कैटास्ट्रोफिक हेल्थ स्पेंडिंग (अत्यधिक स्वास्थ्य खर्च) का सामना कर रहे हैं, जहां इलाज का खर्च उनकी क्षमता से बाहर हो जाती है। 17.7% परिवारों को इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ा या संपत्ति बेचनी पड़ी है। बीमारी के कारण 32.3% मरीजों और 36.2% परिवारों की मासिक आय में सीधी गिरावट आई है। इसके अलावा यह भी सामने आया कि जिन मरीजों के पास स्वास्थ्य बीमा था, उन्हें आर्थिक संकट से नहीं गुजरना पड़ा। अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि सरकार को हृदय मरीजों की ओर ध्यान देना चाहिए और अलग से बीमा करवाना चाहिए। इससे उपचार करवाने में आसानी होगी।
हृदय की बीमारी पर इलाज काफी लंबा चलता है। इसके लिए समय पर दवाएं और लगातार फॉलोअप करने पड़ते हैं। उपचार के दौरान भी मरीजों को अगर कोई दिक्कत आ जाए तो उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत भी पड़ती है। इससे उपचार का खर्च काफी बढ़ जाता है। अगर सरकार की ओर से स्वास्थ्य बीमा और रियायती दरों पर दवाओं की उपलब्धता करवाई जाए तो गरीब और मध्यम वर्ग को आर्थिक संकट से बचाया जा सकता है। -डॉ. पीसी नेगी, पूर्व विभागाध्यक्ष, कार्डियोलॉजी विभाग, आईजीएमसी।