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'संघीय ढांचे को खतरा नहीं': पैनल प्रमुख चौधरी का 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर बड़ा दावा, क्या बदलेगी व्यवस्था?
Sat, 11 Jul 2026 10:07 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, पणजी।
पीटीआई, पणजी।
Published by: राकेश कुमार
Updated Sat, 11 Jul 2026 10:07 PM IST
सार
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ को लेकर संसदीय समिति ने बड़ा दावा किया है कि छह पूर्व मुख्य न्यायाधीशों समेत कानूनी दिग्गजों ने इसे पूरी तरह सांविधानिक माना है। इससे देश की अर्थव्यवस्था को सात लाख करोड़ का फायदा होगा और बार-बार आचार संहिता लगने से बाधित होने वाले विकास कार्यों को रफ्तार मिलेगी।
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पीपी चौधरी, जेपीसी पैनल प्रमुख
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
देश में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ पर चर्चा तेज है। संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पी पी चौधरी ने शनिवार को बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि छह पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने समिति को अपनी राय दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि एक साथ चुनाव का प्रस्ताव संविधान के अनुकूल है। इससे संघीय ढांचे या लोकतंत्र को कोई नुकसान नहीं होगा। जेपीसी के दो दिवसीय गोवा दौरे के बाद पीपी चौधरी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने कहा कि समिति ने सभी चिंताओं की गहराई से जांच की है।
क्या विशेषज्ञों की राय से रास्ता साफ हुआ?
चौधरी ने कहा कि समिति के सामने पहला सवाल यही था कि क्या एक साथ चुनाव संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ है? उन्होंने बताया कि छह पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने स्वतंत्र रूप से राय दी। सभी ने कहा कि इससे संघीय ढांचे या संविधान के मूल ढांचे को कोई नुकसान नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों, विधि आयोग के अध्यक्ष और कई सांविधानिक विशेषज्ञों ने भी यही बात कही। विशेषज्ञों के बीच पूरी सहमति है कि एक साथ चुनाव कराना पूरी तरह सांविधानिक है। समिति ने इसके आर्थिक असर को समझने के लिए अर्थशास्त्रियों से भी बात की है।
क्या देश को चुनाव के खर्च से राहत मिलेगी?
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए चौधरी ने बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव कराने से देश की अर्थव्यवस्था में करीब सात लाख करोड़ रुपये जुड़ सकते हैं। इससे चुनाव के कारण होने वाले व्यवधान कम होंगे। शासन में भी बड़ा सुधार होगा। चौधरी ने कहा कि बार-बार चुनाव होने से शिक्षा, पर्यटन और औद्योगिक उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को बार-बार चुनावी ड्यूटी पर लगाया जाता है। इससे बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। गोवा जैसे पर्यटन स्थलों को आचार संहिता के कारण नुकसान होता है। चुनाव के दौरान करीब पांच करोड़ प्रवासी मजदूर आवाजाही करते हैं। इससे उद्योगों में उत्पादन प्रभावित होता है। उद्योगों पर वित्तीय तनाव बढ़ता है, जिससे बैंक क्षेत्र पर भी असर पड़ता है। एक साथ चुनाव होने से सरकारों को पांच साल काम करने का निर्बाध समय मिलेगा। देश हर समय चुनाव मोड में नहीं रहेगा।
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यह भी पढ़ें: बंगाल में ममता को झटके पर झटका: अब अनुब्रत मंडल ने छोड़ा दीदी का साथ, ऋतब्रत बनर्जी ने किया जिला समिति का एलान
इतिहास और इस प्रस्ताव के सात मुख्य बिंदु क्या हैं?
चौधरी ने इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि 1952 से 1967 के बीच लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही होते थे। बाद में विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने, नेतृत्व बदलने, आपातकाल और राष्ट्रपति शासन के कारण यह चक्र टूट गया। आज हर साल पांच से छह राज्यों में चुनाव होते हैं। इससे देश हमेशा चुनाव मोड में रहता है। चुनाव आयोग ने भी 1983 की रिपोर्ट में इसकी सिफारिश की थी। विधि आयोग और कई समितियों ने भी इसे राष्ट्रीय हित में बताया था।
पीपी चौधरी ने कहा कि देश भर से मिले मूल्यवान सुझावों पर रिपोर्ट तैयार करते समय विचार किया जाएगा। इसका उद्देश्य ऐसा कानून बनाना है जो आने वाले दशकों तक देश के हित में काम करे।
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क्या विशेषज्ञों की राय से रास्ता साफ हुआ?
चौधरी ने कहा कि समिति के सामने पहला सवाल यही था कि क्या एक साथ चुनाव संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ है? उन्होंने बताया कि छह पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने स्वतंत्र रूप से राय दी। सभी ने कहा कि इससे संघीय ढांचे या संविधान के मूल ढांचे को कोई नुकसान नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों, विधि आयोग के अध्यक्ष और कई सांविधानिक विशेषज्ञों ने भी यही बात कही। विशेषज्ञों के बीच पूरी सहमति है कि एक साथ चुनाव कराना पूरी तरह सांविधानिक है। समिति ने इसके आर्थिक असर को समझने के लिए अर्थशास्त्रियों से भी बात की है।
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क्या देश को चुनाव के खर्च से राहत मिलेगी?
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए चौधरी ने बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव कराने से देश की अर्थव्यवस्था में करीब सात लाख करोड़ रुपये जुड़ सकते हैं। इससे चुनाव के कारण होने वाले व्यवधान कम होंगे। शासन में भी बड़ा सुधार होगा। चौधरी ने कहा कि बार-बार चुनाव होने से शिक्षा, पर्यटन और औद्योगिक उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को बार-बार चुनावी ड्यूटी पर लगाया जाता है। इससे बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। गोवा जैसे पर्यटन स्थलों को आचार संहिता के कारण नुकसान होता है। चुनाव के दौरान करीब पांच करोड़ प्रवासी मजदूर आवाजाही करते हैं। इससे उद्योगों में उत्पादन प्रभावित होता है। उद्योगों पर वित्तीय तनाव बढ़ता है, जिससे बैंक क्षेत्र पर भी असर पड़ता है। एक साथ चुनाव होने से सरकारों को पांच साल काम करने का निर्बाध समय मिलेगा। देश हर समय चुनाव मोड में नहीं रहेगा।
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इतिहास और इस प्रस्ताव के सात मुख्य बिंदु क्या हैं?
चौधरी ने इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि 1952 से 1967 के बीच लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही होते थे। बाद में विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने, नेतृत्व बदलने, आपातकाल और राष्ट्रपति शासन के कारण यह चक्र टूट गया। आज हर साल पांच से छह राज्यों में चुनाव होते हैं। इससे देश हमेशा चुनाव मोड में रहता है। चुनाव आयोग ने भी 1983 की रिपोर्ट में इसकी सिफारिश की थी। विधि आयोग और कई समितियों ने भी इसे राष्ट्रीय हित में बताया था।
- दिग्गजों का समर्थन: छह पूर्व मुख्य न्यायाधीश और तीन सुप्रीम कोर्ट जज इसके पक्ष में हैं।
- सांविधानिक वैधता: कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह व्यवस्था पूरी तरह से संविधान सम्मत है।
- सात लाख करोड़ का फायदा: एक साथ चुनाव से देश की अर्थव्यवस्था को बड़ा वित्तीय लाभ होगा।
- विकास को गति: सरकारों को बार-बार चुनाव के बजाय पांच साल काम करने का पूरा समय मिलेगा।
- ऐतिहासिक मिसाल: देश में 1952 से 1967 के बीच चुनाव एक साथ ही होते थे।
- देशव्यापी मंथन: जेपीसी ने महाराष्ट्र, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, कर्नाटक, गुजरात और गोवा का दौरा किया है।
- हितधारकों से संवाद: समिति ने मुख्यमंत्रियों, विधानसभा अध्यक्षों, विधायकों, अधिकारियों, नागरिक समाज और मीडिया से सुझाव लिए हैं।
पीपी चौधरी ने कहा कि देश भर से मिले मूल्यवान सुझावों पर रिपोर्ट तैयार करते समय विचार किया जाएगा। इसका उद्देश्य ऐसा कानून बनाना है जो आने वाले दशकों तक देश के हित में काम करे।