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उपलब्धि: कैंसर के इलाज की नई तकनीक विकसित, मजबूत होगी प्रतिरक्षण प्रणाली
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: लव गौर
Updated Thu, 25 Dec 2025 05:23 AM IST
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सार
वर्तमान में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख इम्यूनोथेरेपी दवाएं पीडी-1 और पीडी-एल1 नामक प्रोटीनों के बीच होने वाली क्रिया को रोकने पर आधारित हैं। इन दवाओं से कुछ मरीजों में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे मरीज भी हैं जिन पर यह उपचार असर नहीं दिखा पाता। वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसे वैकल्पिक रास्ते की तलाश में थे, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली को और व्यापक तरीके से सक्रिय किया जा सके।
प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
कैंसर के इलाज को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में वैज्ञानिकों को एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है। अमेरिका के एमआईटी और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक नई इम्यूनोथेरेपी तकनीक विकसित की है, जिसे एबीलेक कहा गया है। यह तकनीक कैंसर कोशिकाओं द्वारा प्रतिरक्षा प्रणाली पर लगाए गए एक अहम ब्रेक को हटाकर शरीर की प्राकृतिक रक्षा व्यवस्था को दोबारा सक्रिय करती है। यह खोज इसलिए खास मानी जा रही है क्योंकि मौजूदा इम्यूनोथेरेपी हर मरीज में समान रूप से कारगर साबित नहीं हो पा रही है।
मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का मूल काम वायरस, बैक्टीरिया और असामान्य कोशिकाओं की पहचान कर उन्हें नष्ट करना है। लेकिन कैंसर कोशिकाएं इस प्रणाली को चकमा देने में माहिर होती हैं। वे अपनी सतह पर ऐसे जैव-रासायनिक संकेत विकसित कर लेती हैं, जो प्रतिरक्षा कोशिकाओं को यह संदेश देते हैं कि वे अपने हैं और उन पर हमला नहीं किया जाना चाहिए। इसी कारण कई बार इम्यून सिस्टम कैंसर को पहचान तो लेता है, लेकिन उसे नष्ट करने में विफल रहता है। वर्तमान में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख इम्यूनोथेरेपी दवाएं पीडी-1 और पीडी-एल1 नामक प्रोटीनों के बीच होने वाली क्रिया को रोकने पर आधारित हैं। इन दवाओं से कुछ मरीजों में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे मरीज भी हैं जिन पर यह उपचार असर नहीं दिखा पाता। वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसे वैकल्पिक रास्ते की तलाश में थे, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली को और व्यापक तरीके से सक्रिय किया जा सके।
सियालिक एसिड और सिग्लेक कैंसर की जैविक ढाल
नेचर बायोटेक्नोलॉजी में प्रकाशित इस शोध में वैज्ञानिकों ने एक अलग प्रतिरक्षा-रोधक तंत्र की पहचान की। कैंसर कोशिकाओं की सतह पर मौजूद शर्करा अणुओं, जिन्हें ग्लाइकेन कहा जाता है, में सियालिक एसिड विशेष भूमिका निभाता है। यह सियालिक एसिड प्रतिरक्षा कोशिकाओं की सतह पर मौजूद सिग्लेक रिसेप्टर से जुड़ जाता है। जैसे ही यह जुड़ाव होता है, प्रतिरक्षा कोशिकाओं को हमला न करने का संकेत मिल जाता है और कैंसर कोशिकाएं सुरक्षित बच निकलती हैं। यह प्रक्रिया भी पीडी-1–पीडी-एल1 की तरह ही एक शक्तिशाली इम्यून ब्रेक का काम करती है।
ये भी पढ़ें: Health: कैंसर के लिए इलाज के लिए दवा के साथ बातचीत जरूरी, मानसिक शक्ति भी है बड़ा हथियार
परीक्षणों से मिले उत्साहजनक नतीजे
प्रयोगशाला स्तर पर किए गए कोशिका परीक्षणों में एबीलेक के इस्तेमाल से प्रतिरक्षा कोशिकाओं की कैंसर-नाशक क्षमता में स्पष्ट बढ़ोतरी देखी गई। इसके बाद मानव जैसे प्रतिरक्षा रिसेप्टर वाले चूहों पर परीक्षण किए गए। इन अध्ययनों में पाया गया कि एबीलेक देने से फेफड़ों में कैंसर के फैलाव यानी मेटास्टेसिस, में उल्लेखनीय कमी आई। कई मामलों में इसके नतीजे पारंपरिक कैंसर दवाओं से बेहतर रहे।
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मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का मूल काम वायरस, बैक्टीरिया और असामान्य कोशिकाओं की पहचान कर उन्हें नष्ट करना है। लेकिन कैंसर कोशिकाएं इस प्रणाली को चकमा देने में माहिर होती हैं। वे अपनी सतह पर ऐसे जैव-रासायनिक संकेत विकसित कर लेती हैं, जो प्रतिरक्षा कोशिकाओं को यह संदेश देते हैं कि वे अपने हैं और उन पर हमला नहीं किया जाना चाहिए। इसी कारण कई बार इम्यून सिस्टम कैंसर को पहचान तो लेता है, लेकिन उसे नष्ट करने में विफल रहता है। वर्तमान में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख इम्यूनोथेरेपी दवाएं पीडी-1 और पीडी-एल1 नामक प्रोटीनों के बीच होने वाली क्रिया को रोकने पर आधारित हैं। इन दवाओं से कुछ मरीजों में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे मरीज भी हैं जिन पर यह उपचार असर नहीं दिखा पाता। वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसे वैकल्पिक रास्ते की तलाश में थे, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली को और व्यापक तरीके से सक्रिय किया जा सके।
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सियालिक एसिड और सिग्लेक कैंसर की जैविक ढाल
नेचर बायोटेक्नोलॉजी में प्रकाशित इस शोध में वैज्ञानिकों ने एक अलग प्रतिरक्षा-रोधक तंत्र की पहचान की। कैंसर कोशिकाओं की सतह पर मौजूद शर्करा अणुओं, जिन्हें ग्लाइकेन कहा जाता है, में सियालिक एसिड विशेष भूमिका निभाता है। यह सियालिक एसिड प्रतिरक्षा कोशिकाओं की सतह पर मौजूद सिग्लेक रिसेप्टर से जुड़ जाता है। जैसे ही यह जुड़ाव होता है, प्रतिरक्षा कोशिकाओं को हमला न करने का संकेत मिल जाता है और कैंसर कोशिकाएं सुरक्षित बच निकलती हैं। यह प्रक्रिया भी पीडी-1–पीडी-एल1 की तरह ही एक शक्तिशाली इम्यून ब्रेक का काम करती है।
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परीक्षणों से मिले उत्साहजनक नतीजे
प्रयोगशाला स्तर पर किए गए कोशिका परीक्षणों में एबीलेक के इस्तेमाल से प्रतिरक्षा कोशिकाओं की कैंसर-नाशक क्षमता में स्पष्ट बढ़ोतरी देखी गई। इसके बाद मानव जैसे प्रतिरक्षा रिसेप्टर वाले चूहों पर परीक्षण किए गए। इन अध्ययनों में पाया गया कि एबीलेक देने से फेफड़ों में कैंसर के फैलाव यानी मेटास्टेसिस, में उल्लेखनीय कमी आई। कई मामलों में इसके नतीजे पारंपरिक कैंसर दवाओं से बेहतर रहे।

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