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Jammu-Kasmir: आतंकियों की मददगार 'अभेद्य' चीनी तकनीक की सेना ने निकाली हवा, आतंकी नेटवर्क में ऐसे लगाई सेंध!

Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Sat, 05 Oct 2024 05:13 PM IST
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सार
सेना लंबे समय से आतंकवादियों ग्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले चीन के बनाए अल्ट्रा हैंडसेट को एनक्रिप्टेड करने की कोशिश कर रही थी और काफी हद तक सेना को इसे क्रेक करने में कामयाबी भी मिली है।
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Army neutralizes impenetrable Chinese technology that helps terrorists in Jammu-Kashmir
सेना की कामयाबी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार
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जम्मू-कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा चुनावों के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच तीन चरणों में वोट डाले गए। राहत की बात ये रही कि चुनाव के तीनों चरण शांतिपूर्वक बीते। इसके लिए सुरक्षा बलों की तारीफ करनी होगी, जिन्होंने चुनावी माहौल के दौरान आतंकवाद पर लगाम कसने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। वहीं जम्मू में भी जहां पिछले कुछ समय से आतंकी वारदातों में लगातार बढ़ोतरी हो रही थी, सुरक्षा बलों की चौकसी के चलते कई आतंकियों को मुठभेड़ों में मार गिराया गया, वहीं घाटी में भी शांति रही। सैन्य सूत्रों का कहना है कि सुरक्षा बलों की इस कामयाबी के पीछे बड़ी वजह आतंकियों के नेटवर्क में बड़ी 'सेंध' है। आतंकवादी कम्युनिकेशन के लिए जिस 'अभेद्य' चीनी तकनीक का इस्तेमाल कर रहे थे, सुरक्षा बलों ने उसका भी तोड़ निकाला और जिसके बाद लगातार कई मुठभेड़ों में आतंकियों को ठिकाने लगा दिया। 



आंतकियों का पूरा नेटवर्क ध्वस्त!
कश्मीर घाटी में तैनात सेना के वरिष्ठ सूत्रों ने अमर उजाला को बताया कि सुरक्षा बलों की बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। सेना लंबे समय से आतंकवादियों ग्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले चीन के बनाए अल्ट्रा हैंडसेट को एनक्रिप्टेड करने की कोशिश कर रही थी और काफी हद तक सेना को इसे क्रेक करने में कामयाबी भी मिली है। इस बार आतंकी आम वॉकी टॉकी या सेलफोन का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे। बल्कि वे कम्युनिकेशन के लिए चीन के बने अल्ट्रा हैंडसेट का यूज कर रहे हैं, जो इन्क्रिप्टेड हैं और उसका तोड़ अभी तक सिक्योरिटी एजेंसियों के पास नहीं था। लेकिन अब काफी हद तक सुरक्षा बलों को इसका कोड क्रेक करने में कामयाबी हासिल हुई है। उन्होंने बताया कि हाल ही में जो कई आतंकी अलग-अलग मुठभेड़ों में मार गिराए गए हैं, उसकी सफलता के पीछे यही सबसे बड़ी वजह है। सुरक्षा बलों ने आंतकियों का पूरा नेटवर्क ध्वस्त कर दिया है।  


आतंकियों को ट्रेस करना हो रहा था मुश्किल 
सैन्य सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान चीन के साथ मिलकर अपनी फौज के साथ-साथ आतंकी संगठन को भी नई-नई तकनीक मुहैया करवा उन्हें भारत में घुसपैठ करवा रहा था। हाल के कुछ दिनों में जम्मू में हुए आतंकी हमले के बाद जो कम्युनिकेशन सेट मिले, वे न सिर्फ इनक्रिप्टेड थे बल्कि उन्हें ट्रेस करना भी मुश्किल हो रहा था। सीमा पार बैठे आतंकियों के आका औऱ पाकिस्तानी सेना चीन में बने कम्युनिकेशन सेट अल्ट्रा सेट से आतंकियों को दिशा-निर्देश दे रहे थे। सूत्रों का कहना है कि दरअसल ये कम्युनिकेशन सेट चीन ने पाकिस्तानी सेना के लिए भेजे थे। लेकिन पाकिस्तानी सेना ने इन्हें आतंकियों को थमा दिया, क्योंकि वे जानते थे कि आम वाकी-टॉकी हैंडसेट को भारतीय सेना आसानी से ट्रेस कर लेगी और आतंकी मारे जाएंगे। इसलिए उन्होंने आतंकियों को ये अल्ट्रासेट दिए थे। अल्ट्रासेट को सैटेलाइट फोन के अलावा रेडियो सेट की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है। 

इन खास हैंडसेट्स को पिछले साल 17-18 जुलाई की रात को जम्मू क्षेत्र के पुंछ जिले के सुरनकोट के सिंदराह टॉप क्षेत्र में हुई मुठभेड़ के बाद और इस साल 26 अप्रैल को उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले के सोपोर के चेक मोहल्ला नौपोरा क्षेत्र में मुठभेड़ में मारे आतंकियों से ये हैंडसेट बरामद किए गए थे। सुरनकोट मुठभेड़ में चार और सोपोर में दो विदेशी आतंकवादी मारे गए थे। इसके अलावा ये हैंडसेट पीर पंजाल क्षेत्र के दक्षिण में भी आतंकियों से बरामद हुए थे। 

अल्ट्रा सेट का पता लगाने के लिए एरिया मैपिंग 
सूत्रों ने बताया कि यह हैंडसेट रेडियो तरंगों की मदद से बिल्कुल सेलफोन की तरह काम करते हैं। लेकिन इनमें जीएसएम या सीडीएमए जैसी मोबाइल टेक्नोलॉजी नहीं होती है, बल्कि ये सीमा पार पाकिस्तान में बने कंट्रोल सेंटर से जुड़े होते हैं। पाकिस्तान में मास्टर सर्वर तक कनेक्ट करने के लिए चीनी सैटेलाइटों का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं खास बात यह होती है कि दो अल्ट्रासेट सीधे एक-दूसरे से कनेक्ट नहीं हो सकते, बल्कि मास्टर सर्वर से ही कनेक्ट हो सकते हैं। सूत्रों ने बताया कि अल्ट्रा हैंडसेट इतने अत्याधुनिक हैं कि ये आम मोबाइल की तरह काम नहीं करते हैं। इसलिए ये रडार की पकड़ में भी नहीं आते हैं। वहीं इसकी खूबी यह भी है कि कम्युनिकेशन सिस्टम ऑन होने पर न कोई सिग्नलों का पता चलता है, बल्कि लोकेशन भी पता नहीं चलती। पहले सिक्योरिटी एजेंसियां आतंकवादियों के कम्युनिकेशन को डीकोड कर उनके मंसूबों का पता लगा लेती थीं। लेकिन अल्ट्रासेट के चलते यह संभव नहीं हो पा रहा था। सूत्रों का कहना है कि अगर आतंकी अल्ट्रासेट को ऑन रखते हैं, और उसका इस्तेमाल कर रहे हैं, तो लोकेशन का पता लगाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अल्ट्रा सेट का पता लगाने के लिए एरिया मैपिंग भी की गई औऱ पता लगाया गया कि अल्ट्रा सेट कहां एक्टिव है। 

चीनी बाइदू जीपीएस का होता है इस्तेमाल
सैन्य सूत्रों ने बताया कि अल्ट्रासेट सैटेलाइट से कनेक्टेड हैं। इससे मैसेजिंग भी की जा सकती है। हर सेट का अलग कोड होता है। अगर आतंकियों के दो ग्रुप हैं और दोनों के पास इस तरह के सेट हैं तब भी एक ग्रुप दूसरे ग्रुप से कॉन्टैक्ट नहीं कर सकता। बिना कोड के अल्ट्रासेट सिस्टम बेकार है। लेकिन पाकिस्तान में मास्टर सर्वर होने की वजह से पाकिस्तानी सेना आसानी से न केवल आतंकियों की बातचीत को ट्रैक कर सकती है, बल्कि गाइड भी कर सकती है। क्योंकि इस सैटेलाइट का कोड उसके पास ही है। वहीं पाकिस्तान और चीन अमेरिकी सैटेलाइट का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि वे चीनी बाइदू जीपीएस का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन चीन के साथ भारत का सूचनाओं के आदान-प्रदान को लेकर कोई समझौता तो नहीं है। इसके अलावा आतंकी एक और तरीका कम्यूनिकेशन के लिए यूज कर रहे हैं। वे अपने आकाओं से कॉन्टैक्ट के लिए जहां अल्ट्रासेट का यूज करते हैं, तो वहीं वे पनाहगारों के मोबाइल सेट का इस्तेमाल करते हैं और दूसरे ओजीडब्ल्यू से संपर्क साधते हैं। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियां हर मोबाइल को ट्रैक पर नहीं रख सकती, जिसका आतंकी फायदा उठाते हैं। सूत्रों का कहना है कि आतंकवादी सैमसंग फोन और आईकॉम रेडियो सेट के माध्यम से वाई एसएमएस का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।

वापस लौटेगी यूनिफॉर्म फोर्स
वहीं जम्मू क्षेत्र में आतंकियों पर लगाम कसने के लिए पूर्वी लद्दाख में तैनात 'यूनिफॉर्म फोर्स' को जम्मू स्थित 16वीं कोर में वापस भेजा जा रहा है। अगले साल मई-जून तक यूनिफॉर्म फोर्स की वापसी हो सकती है। 2020 में गलवां हिंसा के बाद जब भारत और चीन में गतिरोध चरम पर था, तो जम्मू के रियासी में तैनात यूनिफॉर्म फोर्स को काउंटर टेररिज्म की ड्यूटी से हटाकर बतौर बैकअप फोर्स एलएसी पर तैनात कर दिया गया था। वहीं, जैसे ही जम्मू से विशेष आतंकवाद रोधी राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) की यूनिफॉर्म फोर्स को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनात किया गया, तो जम्मू डिविजन में आतंकी हमलों में तेजी देखी गई। जम्मू डिविजन में जिस तरह से आतंकी ताबड़तोड़ आतंकी वारदातों को अंजाम दे रहे थे, उसके बाद से रियासी क्षेत्र में यूनिफॉर्म फोर्स को फिर से तैनात किए जाने की मांग जोरशोर से की जा रही थी। 

मजबूत होगी HUMINT ग्रिड 
सूत्रों ने बताया कि जम्मू क्षेत्र से राष्ट्रीय राइफल्स की यूनिफॉर्म फोर्स को लद्दाख भेजने के बाद इस इलाके में आतंकी वारदातों में एकाएक बढ़ोतरी हो गई। आतंकियों को इस इलाके में पकड़ बनाने का मौका मिला। उस इलाके में कश्मीर घाटी के मुकाबले HUMINT ग्रिड कमजोर हुई, क्योंकि घाटी पर ज्यादा फोकस किया गया। कश्मीर में सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस, मिलिट्री इंटेलिजेंस और अन्य खुफिया एजेंसियों से मिले इनपुट पर काम करती है, जिससे वहां आतंकियों की हिम्मत टूटी है। वहीं, काफी सालों तक शांत रहे जम्मू में HUMINT की बहुत उपेक्षा की गई। ह्यूमन इंटेलिजेंस के लिए सुरक्षा एजेंसियों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, नए सोर्स बनाने पड़ते हैं। लोगों में भरोसा पैदा करना पड़ता है। जम्मू इलाके में जिस तरह की भौगोलिक स्थितियां हैं और वहां जो काम सैनिक कर सकते हैं, वह काम तकनीक से नहीं हो सकता। वहीं, यूनिफॉर्म फोर्स की वापसी से उस इलाके में HUMINT ग्रिड फिर से मजबूत होगी और जम्मू रीजन में आतंकवाद पर लगाम कसने में मदद मिलेगी।  

2024 में घटी आतंकी घटनाएं
वहीं जम्मू-कश्मीर में साल 2014 के मुकाबले 2024 में आतंकी घटनाओं में गिरावट दर्ज की गई है। 2014 में जहां 222 आतंकी वारदातें हुई थीं, तो इस साल अब तक केवल 23 घटनाएं ही हुई हैं, इनमें से 15 जम्मू में और 8 कश्मीर में हुईं। इसके अलावा सुरक्षाबलों और आम लोगों की जानें भी कम गईं। इस साल 27 सितंबर तक जम्मू में 15 आतंकी हमलों और मुठभेड़ों में 11 नागरिकों और 17 सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई है। 2014 में जहां 47 सुरक्षा बलों के जवानों की शहादत हुई, जो इस बार घटकर 25 रह गई है, जिनमें से 17 अकेले जम्मू में शहीद हुए। वहीं आतंकियों की मौत की बात करें, तो 2014 में सुरक्षा बलों ने 45 आतंकवादियों को मार गिराया था, जबकि 2024 में यह संख्या 110 रही। इनमें से 18 विदेशी और 17 स्थानीय आतंकवादियों सहित 35 को कश्मीर में मार गिराया गया, जबकि जम्मू में 10 आतंकवादियों को मौत के घाट उतारा गया।

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