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Article 370 Abrogation: मोदी-शाह के इस मास्टर स्ट्रोक को देखते रह गए थे चीन और पाकिस्तान, नहीं लगी मिशन की भनक

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 05 Aug 2020 09:00 PM IST
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सार

गृह मंत्री अमित शाह और एनएसए अजीत डोभाल कश्मीर का दौरा कर वापस लौट आए। कश्मीर में दस हजार से ज्यादा अतिरिक्त सुरक्षा बल पहुंच गए। यह सब होने के बावजूद इस मिशन की सूचना किसी भी गलियारे से बाहर नहीं आ सकी...

Article 370 Abrogation: Pakistan and Chinese spy agencies failed to know that PM Modi and Shah is planning to removal Article 370 in jammu and kashmir
NSA Ajit Doval in kashmir - फोटो : ANI (File)
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विस्तार

अनुच्छेद-370 खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा लगाए गए मास्टर स्ट्रोक को चीन व पाकिस्तान देखते रह गए थे। खास बात यह रही कि इन दोनों देशों की खुफिया एजेंसियां मोदी सरकार के मास्टर स्ट्रोक का अंदाजा नहीं लगा सकीं। केवल यही नहीं, केंद्र सरकार में कई बड़े मंत्रियों और कई नौकरशाहों को भी मिशन 'अनुच्छेद 370' की भनक नहीं लगने दी।
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एक कहानी के बाद दूसरी कहानी बनाई गई, लेकिन अनुच्छेद खत्म करने का जिक्र कभी नहीं हुआ। अमित शाह और एनएसए अजीत डोभाल कश्मीर का दौरा कर वापस लौट आए। कश्मीर में दस हजार से ज्यादा अतिरिक्त सुरक्षा बल पहुंच गए। यह सब होने के बावजूद इस मिशन की सूचना किसी भी गलियारे से बाहर नहीं आ सकी।

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गत वर्ष केंद्रीय गृह मंत्रालय में तैनात रहे और इस मामले से जुड़े रहे एक आईपीएस के मुताबिक, यह कोई छोटा काम नहीं था। दूसरे मुल्कों, खासतौर पर हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तानी और चीन तो पहले से ही कश्मीर से जुड़े मामलों में खास रुचि लेते रहे हैं। इनकी सीक्रेट एजेंसियां भी अपने स्तर पर काम कर रही थीं। यह बात सही है कि इस मिशन को पूरा होने से पहले दुनिया के सामने नहीं आने दिया गया।

यहां तक कि अतिरिक्त फोर्स जब कश्मीर घाटी में भेजी गई, तो उनके कमांडरों को नहीं मालूम था कि क्या होने जा रहा है। सभी के लिए एक ही मैसेज था, आतंकवाद की कमर तोड़नी है और अमरनाथ यात्रा को सुरक्षित तरीके से संपन्न कराना है। गृहमंत्री अमित शाह ने कश्मीर का दौरा भी किया था।

बाद में अजीत डोभाल भी वहां पहुंचे। यहां तक भी किसी को मिशन का पता नहीं चला। इसके बाद कश्मीर से हल्की-फुल्की खबरें बाहर आनी शुरू हुईं। हालांकि उनमें कोई सटीक जानकारी नहीं थी। सब लोग सवाल के लहजे में पूछ रहे थे कि कश्मीर में क्या होने वाला है। इसके बाद अमरनाथ यात्रा के रूट पर हथियार व आईईडी बरामद हो गईं।

इसने सरकार का काम और ज्यादा आसान बना दिया। अब सभी के दिमाग में यह बात बैठ गई कि आतंकवाद को लेकर सरकार कोई बड़ी कार्रवाई करेगी। हो सकता है कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसा कुछ हो।

अजीत डोभाल कई जगहों पर भी गए, लेकिन मिशन की बात नहीं खुली 

खास बात यह है कि एनएसए अजीत डोभाल भी 24 जुलाई को कश्मीर का दौरा करने पहुंचे थे। उन्होंने अधिकारियों से बातचीत के अलावा कई जगहों का दौरा किया। लोगों ने यही समझा कि आतंकियों के खिलाफ कोई ऑपरेशनल रणनीति बनाई जा रही है। कश्मीर में गिने-चुने लोगों के अलावा किसी को मिशन का पता नहीं था।

आईबी और जम्मू-कश्मीर पुलिस की इंटेलिजेंस विंग से हर इलाके की जानकारी जुटाई गई। कहां कितने स्कूल कालेज हैं, किस इलाके में पत्थराव की घटनाएं होती हैं और क्षेत्रों के प्रभावशाली व्यक्ति, हुर्रियत व अलगाववादी नेताओं की जानकारी, इस तरह की बहुत सी सूचनाएं इंटेलिजेंस एजेंसियों से मांगी गई थी।

जन प्रतिनिधियों के साथ प्रशासन की बैठकें हुईं, लेकिन अनुच्छेद 370 खत्म करने की भनक तब भी किसी को नहीं लग सकी। जैसे ही डोभाल दिल्ली लौटे, घाटी में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के दस हजार जवान तैनात कर दिए गए। अमरनाथ यात्रियों और पर्यटकों को जब यह कहा गया कि वे अपने घर लौट जाएं, तो सरकार में बैठे लोगों, राजनेताओं और आम जनता ने यह मान लिया कि अब आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई होगी।

इस सीक्रेट मिशन के लिए डोभाल ने अपनी पसंदीदा टीम को चुना था 

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ बातचीत कर अजीत डोभाल ने तत्कालीन राज्यपाल सतपाल मलिक एवं उनके सलाहकारों के साथ लंबी बैठक की। इसमें कई नए लोगों को शामिल किया गया। बीवीआर सुब्रमण्यम को जम्मू-कश्मीर का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया। पूर्व आईपीएस के. विजय कुमार को भी अहम जिम्मेदारी दी गई।

डोभाल ने वहां की सिविल सोसायटी के कई लोगों से भी बातचीत की थी। मिशन पूरा होने के दौरान या उसके बाद नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पर पाकिस्तानी आर्मी, आईएसआई और बॉर्डर एक्शन टीम की हरकत को कैसे मुंह तोड़ जवाब देना है, ये सब तैयारी पहले ही कर ली गई थी।

एनएसए के दौरे के एक सप्ताह बाद रॉ सेक्रेट्री सामंत गोयल भी दो दिन के लिए जम्मू-कश्मीर पहुंच गए। बॉर्डर के किस हिस्से पर और घाटी में कहां क्या हो सकता है, यह होमवर्क कर लिया गया। आतंकियों के छिपने के संभावित ठिकानों से लेकर पाकिस्तानी हरकत का पता लगाने के लिए बड़े पैमाने पर फ़ोन इंटरसेप्ट की मदद ली गई। आईबी चीफ अरविंद कुमार ने वहां की सामाजिक परिस्थितियों और आतंकवाद की घटनाओं बाबत एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट तैयार की थी।

केंद्र के विशेष प्रतिनिधि और आईबी के पूर्व चीफ दिनेश्वर शर्मा ने जम्मू-कश्मीर में विभिन्न सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर वहां के माहौल पर जानकारी हासिल की। डीजीपी दिलबाग सिंह को अजीत डोभाल का विश्वस्त माना जाता है, उन्होंने मिशन के बाद घटनाओं को रोकने में अहम भूमिका अदा की है।

पूर्व पुलिस अधिकारी फारुख खान को आईजी के पद से रिटायर होने के बाद राज्यपाल सत्यपाल मलिक का सलाहकार नियुक्त किया गया था। जम्मू-कश्मीर में किस जगह पर दंगा या पत्थरबाज हरकत कर सकते हैं, यह जानकारी इनके पास होती है। किस नेता को कब और कहां नजरबंद करना है, इसके लिए फारुख खान की मदद ली गई।

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