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बलूचिस्तान: लंबी जंग खिंची तो बिखर जाएगी पाकिस्तानी फौज, कुल तीन अंदरूनी मोर्चों पर फंसी PAK सेना
सार
बलूचिस्तान में बढ़ते अलगाववादी आंदोलन और 11 अगस्त को घोषित 'स्वतंत्रता दिवस' के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान का आंतरिक संघर्ष लंबा खिंचता है, तो बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके जैसे कई मोर्चों पर दबाव से पाकिस्तानी सेना की स्थिति कमजोर हो सकती है।
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लंबी जंग खिंची तो बिखर जाएगी पाकिस्तानी फौज
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
लंबे समय से पाकिस्तान से आजादी की मांग कर रहे बलूच राष्ट्रवादियों ने पिछले दिनों बलूचिस्तान का स्वतंत्रता दिवस 11 अगस्त घोषित कर दिया है। संगठन ने पाकिस्तान के इस सबसे बड़े सूबे की पूर्ण आजादी का दावा करते हुए संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से एक स्वतंत्र व संप्रभु देश के रूप में औपचारिक मान्यता की अपील की है और इसके लिए वैश्विक अभियान भी शुरू कर दिया है। अमर उजाला ने इस घटनाक्रम पर रक्षा और विदेश मामलों के विशेषज्ञों से बातचीत की। उनका मानना है कि यदि यह अंदरूनी लड़ाई लंबी खिंची, तो चौतरफा दबाव से जूझ रही पाकिस्तानी फौज ताश के पत्तों की तरह ढह सकती है। उनकी राय में अफगानिस्तान से तनाव, डूरंड लाइन का विवाद और पीओके समेत तमाम मोर्चों पर अंदरूनी बगावत पाकिस्तान के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है।
तीन मोर्चों पर बगावत
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल ध्रुव कटोच के मुताबिक पाकिस्तान की सेना इस समय तीन मोर्चों- बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके)- पर भारी सरदर्द झेल रही है। उन्होंने कहा कि दुश्मन देश से लड़ते वक्त जवानों में जज्बा होता है, वह अपनी जान देने के लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन यहां लड़ाई दुश्मन के साथ नहीं, अंदरूनी है। अपने ही देश में लड़ते हुए रोजाना सैनिकों की मौतें झेलना बेहद मुश्किल काम है। इससे सेना में बगावत की स्थिति पैदा हो सकती है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी सेना इस चौतरफा गृहयुद्ध से 1-2 साल तो लड़ सकती है, लेकिन लंबे समय तक स्थिति को नियंत्रित नहीं कर पाएगी। सेना के लिए मनोबल बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। कटोच ने कहा कि अगर अमेरिका बलूचिस्तान का समर्थन करता है तो चीन वहां पूरी तरह ब्लॉक हो जाएगा, ग्वादर अमेरिका को मिल जाएगा और बलूचिस्तान को आजादी मिल जाएगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के हित फिलहाल पाकिस्तान से भी जुड़े हैं।
औपनिवेशिक शोषण
विदेश मामलों के जानकार कमर आगा का कहना है कि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को हमेशा एक उपनिवेश की तरह ट्रीट किया और जबरन कब्जा बनाए रखा। गैस और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद बलूच जनता गरीब बनी रही। वहां स्कूल, कॉलेज और बुनियादी ढांचा नहीं बनाया गया। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे ने बलूचियों की समस्याओं को और बढ़ा दिया, जिससे असंतोष चरम पर पहुंचा। यदि इस्लामाबाद ने इसे ताकत से दबाने की कोशिश की, तो उग्रवाद और अशांति और तेजी से फैलेगी। उन्होंने कहा कि भारत को बलूचिस्तान की मदद करनी चाहिए। हालांकि भारत फिलहाल बलूचिस्तान की आजादी का समर्थन नहीं करेगा, वह वेट एंड वॉच की नीति अपनाएगा।
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भारत की रणनीति
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सरीन का मानना है कि बलूचिस्तान में भले ही हथियारबंद संघर्ष चल रहा हो, लेकिन अभी वैश्विक स्तर पर ऐसी कोई एकीकृत राजनीतिक संस्था नहीं है जिसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिले। भारत, इस्राइल या अफगानिस्तान फिलहाल बलूचिस्तान को आजाद देश के रूप में मान्यता देने जैसा कदम नहीं उठाएंगे। भारत इंतजार करने की नीति अपनाएगा। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी कूटनीतिक क्षमता का इस्तेमाल कर वैश्विक मंचों पर बलूचियों के मानवाधिकार हनन का मुद्दा उठाना चाहिए। इस बात पर अंतरराष्ट्रीय आमराय बनानी चाहिए कि बलूचिस्तान में मानवीय हस्तक्षेप की सख्त जरूरत है, आखिर यह बलोच लोगों के मानवाधिकारों का मसला है।
11 अगस्त की तैयारी
बलूच नेताओं ने दुनिया भर में रह रहे बलूच नागरिकों से अपील की है कि वे 11 अगस्त को अपने घरों, बाजारों, दुकानों, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर स्वतंत्र बलूचिस्तान का झंडा फहराएं। इस दिन को राष्ट्रीय एकता के रूप में मनाएं। हालांकि इन घोषणाओं पर पाकिस्तान सरकार सीधा आधिकारिक बयान देने से बच रही है, ताकि इन अलगाववादी दावों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनावश्यक तूल न मिले। इस, घटनाक्रम के बाद वैश्विक मंचों पर बलूच मानवाधिकारों, संसाधनों के दोहन और अलगाववादी संघर्ष पर बहस तेज हो गई है।
चीन की बढ़ेंगी धड़कनें
बलूचिस्तान में संघर्ष का सीधा असर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्वादर बंदरगाह पर पड़ रहा है। बलूच विद्रोही लगातार चीनी परियोजनाओं को निशाना बना रहे हैं। यदि बलूचिस्तान में आंतरिक संघर्ष और गहराया, तो चीन का अरबों डॉलर का निवेश खतरे में पड़ सकता है। बीजिंग के लिए यह स्थिति गले की हड्डी बन सकती है, क्योंकि उसकी क्षेत्रीय आधिपत्य की महत्त्वाकांक्षाएं इसी गलियारे से जुड़ी हुई हैं।
अस्तित्व की लड़ाई
बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के हाथों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और बुद्धिजीवियों का जबरन अपहरण इस संघर्ष की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है। इस असंतोष ने बलूच समाज की हर पीढ़ी को पाकिस्तानी हुक्मरानों के खिलाफ खड़ा कर दिया है। यही कारण है कि यह लड़ाई अब सिर्फ राजनीतिक अधिकारों की न रहकर बलूचों के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है
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तीन मोर्चों पर बगावत
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल ध्रुव कटोच के मुताबिक पाकिस्तान की सेना इस समय तीन मोर्चों- बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके)- पर भारी सरदर्द झेल रही है। उन्होंने कहा कि दुश्मन देश से लड़ते वक्त जवानों में जज्बा होता है, वह अपनी जान देने के लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन यहां लड़ाई दुश्मन के साथ नहीं, अंदरूनी है। अपने ही देश में लड़ते हुए रोजाना सैनिकों की मौतें झेलना बेहद मुश्किल काम है। इससे सेना में बगावत की स्थिति पैदा हो सकती है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी सेना इस चौतरफा गृहयुद्ध से 1-2 साल तो लड़ सकती है, लेकिन लंबे समय तक स्थिति को नियंत्रित नहीं कर पाएगी। सेना के लिए मनोबल बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। कटोच ने कहा कि अगर अमेरिका बलूचिस्तान का समर्थन करता है तो चीन वहां पूरी तरह ब्लॉक हो जाएगा, ग्वादर अमेरिका को मिल जाएगा और बलूचिस्तान को आजादी मिल जाएगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के हित फिलहाल पाकिस्तान से भी जुड़े हैं।
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औपनिवेशिक शोषण
विदेश मामलों के जानकार कमर आगा का कहना है कि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को हमेशा एक उपनिवेश की तरह ट्रीट किया और जबरन कब्जा बनाए रखा। गैस और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद बलूच जनता गरीब बनी रही। वहां स्कूल, कॉलेज और बुनियादी ढांचा नहीं बनाया गया। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे ने बलूचियों की समस्याओं को और बढ़ा दिया, जिससे असंतोष चरम पर पहुंचा। यदि इस्लामाबाद ने इसे ताकत से दबाने की कोशिश की, तो उग्रवाद और अशांति और तेजी से फैलेगी। उन्होंने कहा कि भारत को बलूचिस्तान की मदद करनी चाहिए। हालांकि भारत फिलहाल बलूचिस्तान की आजादी का समर्थन नहीं करेगा, वह वेट एंड वॉच की नीति अपनाएगा।
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भारत की रणनीति
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सरीन का मानना है कि बलूचिस्तान में भले ही हथियारबंद संघर्ष चल रहा हो, लेकिन अभी वैश्विक स्तर पर ऐसी कोई एकीकृत राजनीतिक संस्था नहीं है जिसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिले। भारत, इस्राइल या अफगानिस्तान फिलहाल बलूचिस्तान को आजाद देश के रूप में मान्यता देने जैसा कदम नहीं उठाएंगे। भारत इंतजार करने की नीति अपनाएगा। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी कूटनीतिक क्षमता का इस्तेमाल कर वैश्विक मंचों पर बलूचियों के मानवाधिकार हनन का मुद्दा उठाना चाहिए। इस बात पर अंतरराष्ट्रीय आमराय बनानी चाहिए कि बलूचिस्तान में मानवीय हस्तक्षेप की सख्त जरूरत है, आखिर यह बलोच लोगों के मानवाधिकारों का मसला है।
11 अगस्त की तैयारी
बलूच नेताओं ने दुनिया भर में रह रहे बलूच नागरिकों से अपील की है कि वे 11 अगस्त को अपने घरों, बाजारों, दुकानों, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर स्वतंत्र बलूचिस्तान का झंडा फहराएं। इस दिन को राष्ट्रीय एकता के रूप में मनाएं। हालांकि इन घोषणाओं पर पाकिस्तान सरकार सीधा आधिकारिक बयान देने से बच रही है, ताकि इन अलगाववादी दावों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनावश्यक तूल न मिले। इस, घटनाक्रम के बाद वैश्विक मंचों पर बलूच मानवाधिकारों, संसाधनों के दोहन और अलगाववादी संघर्ष पर बहस तेज हो गई है।
चीन की बढ़ेंगी धड़कनें
बलूचिस्तान में संघर्ष का सीधा असर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्वादर बंदरगाह पर पड़ रहा है। बलूच विद्रोही लगातार चीनी परियोजनाओं को निशाना बना रहे हैं। यदि बलूचिस्तान में आंतरिक संघर्ष और गहराया, तो चीन का अरबों डॉलर का निवेश खतरे में पड़ सकता है। बीजिंग के लिए यह स्थिति गले की हड्डी बन सकती है, क्योंकि उसकी क्षेत्रीय आधिपत्य की महत्त्वाकांक्षाएं इसी गलियारे से जुड़ी हुई हैं।
अस्तित्व की लड़ाई
बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के हाथों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और बुद्धिजीवियों का जबरन अपहरण इस संघर्ष की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है। इस असंतोष ने बलूच समाज की हर पीढ़ी को पाकिस्तानी हुक्मरानों के खिलाफ खड़ा कर दिया है। यही कारण है कि यह लड़ाई अब सिर्फ राजनीतिक अधिकारों की न रहकर बलूचों के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है