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Women Reservation: महिलाओं को 30% आरक्षण के लिए BCI का को-ऑप्शन फॉर्मूला, सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी की आस
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Thu, 21 May 2026 05:58 PM IST
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सार
बीसीआई ने स्टेट बार काउंसिलों में महिलाओं को 30% आरक्षण देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पारदर्शी और लोकतांत्रिक फॉर्मूला पेश किया है। 'रनर्स-अप' महिला उम्मीदवारों को को-ऑप्शन कोटा में जगह देकर बीसीआई ने कानूनी बिरादरी में बिना किसी भाई-भतीजावाद के महिला सशक्तिकरण की एक मजबूत और निष्पक्ष बुनियाद रखी है।
बार काउंसिल का आरक्षण प्लान
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
देश के स्टेट बार काउंसिलों में महिला वकीलों की हिस्सेदारी बढ़ाने को लेकर एक बड़ा कदम उठाया गया है। भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। शीर्ष संस्था ने राज्य कानूनी परिषदों में महिलाओं के लिए 30 फीसदी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के मकसद से एक योग्यता-आधारित 'को-ऑप्शन' व्यवस्था को मंजूरी देने की मांग की है। बीसीआई ने कहा कि वह इस 10 प्रतिशत को-ऑप्शन को पूरी तरह पारदर्शी और लोकतांत्रिक रखना चाहती है।
मनोनयन नहीं, रनर्स-अप को मिलेगा मौका
बीसीआई ने शीर्ष अदालत के सामने प्रस्ताव रखा है कि 10 फीसदी को-ऑप्शन को किसी भी तरह की व्यक्तिगत या व्यक्तिपरक नियुक्तियों के जरिए नहीं भरा जाएगा। इसके बजाय, चुनाव लड़ चुकीं उन महिला उम्मीदवारों को चुना जाएगा जिन्होंने चुनाव नहीं जीतने वाली महिलाओं में सबसे अधिक वोट हासिल किए हैं। यह फॉर्मूला प्रत्यक्ष चुनाव के जरिए महिलाओं के लिए आरक्षित 20 प्रतिशत सीटों के पूरक के रूप में काम करेगा। दोनों को मिलाकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय किए गए कुल 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व के आंकड़े को पूरा किया जा सकेगा।
यह भी पढ़ें: SC Updates: महिला वकीलों के प्रतिनिधित्व पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; सिख धार्मिक संपत्तियों पर PIL सुनने से इनकार
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पक्षपात और मनमानी पर लगेगी रोक
बीसीआई के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि बार काउंसिल ने शीर्ष अदालत की ओर से गठित हाई पावर्ड इलेक्शन सुपरवाइजरी कमेटी के सामने हितधारकों के सुझावों पर गंभीरता से विचार किया है। बीसीआई ने अपने आवेदन में जोर देकर कहा कि चुनाव में मामूली अंतर से चूकने वाली 'रनर्स-अप' महिला वकीलों को शामिल करना कोटा पूरा करने का सबसे लोकतांत्रिक तरीका है। यह तरीका मतदाताओं के जनादेश का सम्मान करता है और इसमें किसी भी तरह के पक्षपात या भाई-भतीजावाद का जोखिम नहीं है। यह पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ, पारदर्शी और मनमानेपन से कोसों दूर होगी।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश का पालन
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के दिसंबर 2023 के उस ऐतिहासिक निर्देश के बाद आया है, जिसमें स्टेट बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 30 फीसदी आरक्षण अनिवार्य किया गया था। इसके बाद, इसी साल 13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता वाली हाई-पावर्ड इलेक्शन सुपरवाइजरी कमेटी से इस 10 फीसदी को-ऑप्शन को लागू करने का सटीक तरीका तय करने का अनुरोध किया था। बीसीआई ने कहा है कि यह मामला सिर्फ सीटें भरने का नहीं है, बल्कि कानूनी बिरादरी का अहम हिस्सा रहीं महिला अधिवक्ताओं को उनका वाजिब हक देने का है।
मनोनयन नहीं, रनर्स-अप को मिलेगा मौका
बीसीआई ने शीर्ष अदालत के सामने प्रस्ताव रखा है कि 10 फीसदी को-ऑप्शन को किसी भी तरह की व्यक्तिगत या व्यक्तिपरक नियुक्तियों के जरिए नहीं भरा जाएगा। इसके बजाय, चुनाव लड़ चुकीं उन महिला उम्मीदवारों को चुना जाएगा जिन्होंने चुनाव नहीं जीतने वाली महिलाओं में सबसे अधिक वोट हासिल किए हैं। यह फॉर्मूला प्रत्यक्ष चुनाव के जरिए महिलाओं के लिए आरक्षित 20 प्रतिशत सीटों के पूरक के रूप में काम करेगा। दोनों को मिलाकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय किए गए कुल 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व के आंकड़े को पूरा किया जा सकेगा।
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सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश का पालन
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के दिसंबर 2023 के उस ऐतिहासिक निर्देश के बाद आया है, जिसमें स्टेट बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 30 फीसदी आरक्षण अनिवार्य किया गया था। इसके बाद, इसी साल 13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता वाली हाई-पावर्ड इलेक्शन सुपरवाइजरी कमेटी से इस 10 फीसदी को-ऑप्शन को लागू करने का सटीक तरीका तय करने का अनुरोध किया था। बीसीआई ने कहा है कि यह मामला सिर्फ सीटें भरने का नहीं है, बल्कि कानूनी बिरादरी का अहम हिस्सा रहीं महिला अधिवक्ताओं को उनका वाजिब हक देने का है।