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पांच दशक बाद चौथे सदन पहुंचेंगे नीतीश?: कैसे विधानसभा, लोकसभा और विधान परिषद में हुई एंट्री; जानें चुनावी सफर
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Thu, 05 Mar 2026 05:15 PM IST
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सार
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया। इसके साथ ही अब नीतीश की राजनीतिक पारी में एक और उपलब्धि जुड़ने जा रही है। वह अब अपने पांच दशक से ज्यादा लंबे चुनावी करियर में चौथे सदन के लिए दावेदार बन गए हैं।
नीतीश कुमार।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
नीतीश कुमार बिहार में बीते 21 साल से सत्ता का पर्याय बने हुए हैं। साल 2000 में भी नीतीश महज सात दिन के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे। वो वक्त हो या आज का वक्त नीतीश इन 25 वर्षों में कभी भी विधानसभा का चुनाव नहीं लड़े। हर बार विधान परिषद सदस्य के रूप में ही उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि नीतीश कुमार सिर्फ विधान परिषद तक ही सीमित रहे। उन्होंने अपने जीवनकाल में लोकसभा से लेकर विधानसभा तक के चुनाव लड़े और जीत हासिल की। इसके बाद ही वे विधान परिषद का हिस्सा बने। हालांकि, उनका यह सफर इतना भी आसान नहीं रहा है।
नीतीश के विधानसभा चुनाव लड़ने की बात करें तो वो साल 1977 था, जब नीतीश हरनौत विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे थे। पहले ही चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, समय के साथ नीतीश ने न सिर्फ चुनाव जीते, बल्कि हरनौत को अपना अभेद्य किला तक बना लिया। हालांकि, आगे के वर्षों में नीतीश बिना विधानसभा चुनाव लड़े ही मुख्यमंत्री का पद अपने पास रखा।
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नीतीश के विधानसभा चुनाव लड़ने की बात करें तो वो साल 1977 था, जब नीतीश हरनौत विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे थे। पहले ही चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, समय के साथ नीतीश ने न सिर्फ चुनाव जीते, बल्कि हरनौत को अपना अभेद्य किला तक बना लिया। हालांकि, आगे के वर्षों में नीतीश बिना विधानसभा चुनाव लड़े ही मुख्यमंत्री का पद अपने पास रखा।
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10 जून 1977 को हरनौत विधानसभा सीट पर मतदान होना था। इससे चंद रोज पहले बिहार एक ऐसा हत्याकांड हुआ जिसने दो जातियों के बीच दुश्मनी की खाई पैदा कर दी। कहा जाता है कि इस हत्याकांड का असर हरनौत के विधानसभा चुनाव नतीजों पर भी पड़ा। क्योंकि ये घटना हरनौत से चंद किलोमीटर दूर बेलछी गांव में हुई थी।
2011 में आई किताब 'नीतीश कुमार एंड द राइज ऑफ बिहार' में अरुण सिन्हा लिखते हैं कि 1977 के चुनाव में हरनौत के कुर्मी वोटरों ने निर्दलीय उम्मीदवार भोला प्रसाद सिंह के समर्थन करने का एलान कर दिया था। दरअसल, भोला प्रसाद ने क्षेत्र के कई कुर्मियों को बंदूकों के लाइसेंस दिलाने में मदद की थी। इसके अलावा भोला ने इनमें से कई को बिजली दिलाने में भी मदद की। उन्हें कुर्मी संगठनों का नेता भी बनाया गया। 1976 में जब मोहाने नदी में जब बाढ़ आई थी, तब आसपास के गांवों में उन्होंने निजी तौर पर राहत-बचाव कार्य चलवाए थे।
अरुण सिन्हा लिखते हैं, ''कुर्मी समाज नीतीश के इंजीनियर होने की वजह से उन्हें एक बुद्धिमान नेता के तौर पर देखता था और जेपी के आंदोलन से जुड़े होने की वजह से उनका सम्मान भी करता था। लेकिन बेलछी कांड के बाद नीतीश कुमार कभी भी कुर्मी गौरव को लेकर खुले तौर पर कुछ नहीं बोले। वहीं, भोला प्रसाद सिंह लगातार मंचों से महावीर महतो से लेकर बेलछी कांड में शामिल अन्य कुर्मियों के समर्थन में बोलने लगे। इसके बाद कुर्मी समाज भोला प्रसाद के पीछे लामबंद हो गया। कुर्मी समाज के इस समर्थन की बदौलत निर्दलीय खड़े हुए भोला प्रसाद ने कर्पूरी ठाकुर के करीबी माने जाने वाले नीतीश को हरा दिया।'' इस तरह बेलछी कांड की वजह से नीतीश कुमार को अपने पहले ही चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। तब उनकी उम्र महज 26 साल ही थी।
अरुण सिन्हा लिखते हैं, ''कुर्मी समाज नीतीश के इंजीनियर होने की वजह से उन्हें एक बुद्धिमान नेता के तौर पर देखता था और जेपी के आंदोलन से जुड़े होने की वजह से उनका सम्मान भी करता था। लेकिन बेलछी कांड के बाद नीतीश कुमार कभी भी कुर्मी गौरव को लेकर खुले तौर पर कुछ नहीं बोले। वहीं, भोला प्रसाद सिंह लगातार मंचों से महावीर महतो से लेकर बेलछी कांड में शामिल अन्य कुर्मियों के समर्थन में बोलने लगे। इसके बाद कुर्मी समाज भोला प्रसाद के पीछे लामबंद हो गया। कुर्मी समाज के इस समर्थन की बदौलत निर्दलीय खड़े हुए भोला प्रसाद ने कर्पूरी ठाकुर के करीबी माने जाने वाले नीतीश को हरा दिया।'' इस तरह बेलछी कांड की वजह से नीतीश कुमार को अपने पहले ही चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। तब उनकी उम्र महज 26 साल ही थी।
लगातार दूसरी बार हरनौत में हारे नीतीश कुमार
देश में चल रही सियासी उथलपुथल का असर बिहार पर भी पड़ता रहा है। 1977 में जब जनता सरकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई तो उसके बाद बिहार समेत कई राज्यों में नए सिरे से चुनाव हुए थे। इसी तरह 1980 में जब इंदिरा गांधी फिर से केंद्र की सत्ता में आईं तो फिर से बिहार में नए सिरे से चुनाव हुए।
1985: तीसरी कोशिश में नीतीश ने फतह किया हरनौत का किला
1980 के चुनाव के बाद पांच साल में बिहार ने दो मुख्यमंत्री देखे। 1985 में राज्य में फिर से विधानसभा चुनाव कराए गए। हरनौत सीट पर एक बार फिर नीतीश कुमार उतरे। इस बार नीतीश लोकदल के टिकट पर मैदान में थे। लगातार दो असफलता के बाद नीतीश को हरनौत में सफलता मिली। इस जीत के साथ नीतीश पहली बार विधायक बने। 1985 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने कांग्रेस के बृजनंदन प्रसाद सिंह को 21,412 वोट से हराया। नीतीश जरूर जीत गए पर राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस ने एक बार फिर वापसी की।
1989: नीतीश जीते लोकसभा चुनाव, छोड़ी विधानसभा
1989 में लोकसभा चुनाव में जीत के बाद नीतीश ने हरनौत विधानसभा सीट छोड़ दी। 1990 के विधानसभा चुनाव में हरनौत से एक बार फिर निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली। इस बार यहां से बृजनंदन यादव 5,279 वोट से जीते। उन्होंने नीतीश की पार्टी जनता दल के टिकट पर उतरे भोला प्रसाद सिंह को हराया।1995: नीतीश जीते, सीट छोड़ी, पर हरनौत बन गया जदयू का किला
1995 में एक बार फिर से नीतीश कुमार विधानसभा चुनाव में उतरे और इसी सीट से चुनाव लड़ा। वे फिर जीत गए। इस चुनाव से पहले नीतीश कुमार, जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन कर चुके थे। नीतीश और लालू यादव की राहें जुदा हो चुकी थीं। एक बार फिर नई पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे नीतीश ने हरनौत सीट पर दूसरी बार जीत दर्ज की। उन्होंने जनता दल के टिकट पर उतरे विश्व मोहन चौधरी को 12,242 वोट से हराया।लगातार पांच बार यहां से जीत चुका है जदयू
हालांकि, उन्होंने लोकसभा सदस्यता को बरकरार रखने के लिए यह सीट छोड़ दी, लेकिन अब तक नीतीश हरनौत के अपनी पार्टी के लिए किले में तब्दील कर चुके थे। इस चुनाव के बाद हरनौत सीट पर जितने भी विधानसभा चुनाव हुए उसमें नीतीश की ही पार्टी को जीत मिली। 1996 में हुए उपचुनाव में समता पार्टी के अरुण कुमार सिंह और 2000 के विधानसभा चुनाव में भी समता पार्टी के विश्वमोहन चौधरी इस सीट से विजयी रहे।2003 में समता पार्टी जनता दल यूनाइटेड के रूप में सामने आई। इसके बाद से अब तक पांच बार विधानसभा चुनाव हुए हैं। हर बार हरनौत से जदयू को जीत मिली है। फरवरी 2005 और अक्तूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में यहां से जदयू के सुनील कुमार जीते। वहीं, 2010, 2015, 2020 और 2025 में यहां से जदयू के हरिनारायण सिंह ने जीत दर्ज की है। जदयू भी तबसे लेकर अब तक बिहार में सरकार में बनी हुई है।
फिर विधान परिषद पहुंचे नीतीश कुमार
नीतीश कुमार ने आखिरी बार लोकसभा चुनाव 2004 में लड़ा था, जब वे बाढ़ और नालंदा सीट से खड़े हुए। बाढ़ में नीतीश को हार मिली थी, जबकि वे नालंदा से सांसद बने थे। हालांकि, एक साल बाद यानी 2005 में ही उनकी पार्टी जदयू को बड़ी जीत हासिल हुई। इसके साथ ही नीतीश कुमार एक बार फिर लोकसभा से इस्तीफा देकर बिहार की राजनीति में हिस्सा लेने पहुंचे और 2005 के अंतिम चरण में हुए चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बने। हालांकि, तब वे विधायक नहीं थे। विधायक बनने के लिए उन्होंने विधान परिषद का दामन थामा और 2006 की शुरुआत में सदन के सदस्य बने। इसके बाद से नीतीश लगातार विधान परिषद से ही नामांकन दाखिल कर चुनाव जीतते रहे और मुख्यमंत्री पद हासिल करते रहे।संबंधित वीडियो
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