उदयपुर हत्याकांड: ठोस राजनीतिक प्रस्ताव न लाकर चूक गई बीजेपी! स्नेह यात्रा का दांव अल्पसंख्यकों को लुभाने में कितना होगा कारगर?
क्या हैदराबाद कार्यकारिणी से इस तरह की हिंसक घटनाओं के विरोध में कड़ा राजनीतिक प्रस्ताव न पास कर पार्टी चूक गई या वह स्नेह यात्रा को ही इस तरह की घटनाओं का जवाब मानती है। उसके इस कदम के राजनीतिक संदेश क्या हैं?
विस्तार
बीजेपी की हैदराबाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक (2-3 जुलाई) ऐसे माहौल में हुई जब पूरे देश में कन्हैयालाल हत्याकांड पर लोगों का आक्रोश आसमान पर था। लोग कन्हैयालाल के हत्यारों के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन कर रहे थे और उन्हें कठोर सजा दिए जाने की मांग कर रहे थे। इस गंभीर माहौल में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आयोजित होने के कारण माना जा रहा था कि पार्टी इस दौरान इस गंभीर मुद्दे पर न केवल चर्चा कर सकती है, बल्कि इस तरह की सांप्रदायिक, हिंसक और तनाव फैलाने वाली घटनाओं के खिलाफ प्रस्ताव पास कर सकती है। लेकिन पार्टी ने ऐसा कुछ नहीं किया। उलटे उसने ‘स्नेह यात्रा’ निकालकर समाज के सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ने का राजनीतिक संदेश भी दे दिया। क्या हैदराबाद कार्यकारिणी से इस तरह की हिंसक घटनाओं के विरोध में कड़ा राजनीतिक प्रस्ताव न पास कर पार्टी चूक गई या वह स्नेह यात्रा को ही इस तरह की घटनाओं का जवाब मानती है। उसके इस कदम के राजनीतिक संदेश क्या हैं?
भाजपा के एक कार्यकर्ता ने अमर उजाला से कहा कि उदयपुर हत्याकांड पर जिस तरह जनता का आक्रोश सामने आ रहा है, उसे देखकर लग रहा था कि पार्टी राष्ट्रीय कार्यकारिणी से इस तरह की घटनाओं के खिलाफ कड़ा संदेश देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे उनके जैसे लाखों कार्यकर्ताओं को भारी निराशा हुई है। कार्यकर्ता के मुताबिक, आज मतदाता भाजपा को केवल इसलिए वोट नहीं दे रहा है क्योंकि उसके शासनकाल में विकास के बहुत ज्यादा कार्य हुए हैं, बल्कि वह उसे वोट इसलिए दे रहा है क्योंकि उसे लगता है कि सरकार संवेदनशील मामलों पर कठोर कार्रवाई कर रही है।
कार्यकर्ता के मुताबिक, पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के इलाकों में छिपे आतंकियों के खिलाफ की गई सर्जिकल स्ट्राइक के कारण ही जनता ने भाजपा को 2014 से भी ज्यादा प्रचंड बहुमत के साथ 2019 में सत्ता में बिठाया। इसी तरह उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के दुबारा सत्ता में आने के पीछे उनका असामाजिक तत्वों पर कठोर कार्रवाई करना ही था। केंद्र ने कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई कर आम जनता का भरोसा जीता है कि वह सुरक्षा के साथ कभी समझौता नहीं करेगी और अराजक तत्वों पर कठोर कार्रवाई करेगी।
यदि हैदराबाद बैठक से उदयपुर और अमरावती में हुई घटनाओं की कठोर निंदा की गई होती और आगे इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कठोर कदम उठाने, नए कानून लाकर इस तरह की घटनाओं के आरोपियों को रिकॉर्ड समय में सजा दिलाने का प्रस्ताव पास करती तो इसका एक बेहतर संदेश जा सकता था। इस कार्यकर्ता को लगता है कि पार्टी ने जनता का भरोसा जीतने का एक बड़े अवसर को गंवा दिया है।
स्नेह यात्रा मोदी की छवि चमकाने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष ने अमर उजाला से कहा कि यदि भाजपा की राजनीति को गहराई से देखें तो पता चलता है कि उसके शीर्ष नेता संवेदनशील मामलों पर कभी टिप्पणी नहीं करते। इसका एक कारण यह हो सकता है कि उन्हें इस तरह के विवाद में अपना राजनीतिक लाभ दिखाई पड़ता है। इस तरह के विवाद जितना ज्यादा बढ़ेंगे, मतदाताओं का ध्रुवीकरण उतना ही ज्यादा होगा और यह अंततः उनके पक्ष में जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि मॉब लिंचिंग जैसे मामलों में भी प्रधानमंत्री ने केवल तब दखल दिया जब उन पर बहुत ज्यादा दबाव बढ़ा।
भाजपा की प्रस्तावित स्नेह यात्रा को उन्होंने प्रधानमंत्री की छवि चमकाने की पीआर एक्सरसाइज बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के अभियान चलाकर केवल राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री की छवि चमकाने की कोशिश की जाती है जिसका राजनीतिक लाभ उठाया जा सके। उन्होंने कहा कि यदि केंद्र सरकार अल्पसंख्यकों को अपने साथ जोड़ने के लिए इतनी ज्यादा गंभीर होती तो उनके खिलाफ लगातार हो रहे हमलों पर वह ज्यादा सक्रिय नजर आती। लेकिन इस तरह का कोई ठोस कार्य न होने से समझा जा सकता है कि स्नेह यात्रा केवल छवि चमकाने की कोशिश हैं, इससे अधिक कुछ नहीं।
आशुतोष ने कहा कि हैदराबाद की कार्यकारिणी में यदि भाजपा उदयपुर कांड पर चर्चा करती तो स्वाभाविक तौर पर नूपुर शर्मा कांड की भी चर्चा होती क्योंकि दोनों घटनाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में उदयपुर कांड पर कोई राजनीतिक प्रस्ताव पेश न कर, या इस पर कोई चर्चा न कर भाजपा ने खुद को बचाने का एक सुरक्षित रास्ता निकाल लिया है।
पीएम मोदी की लंबी रणनीति की झलक है स्नेह यात्रा
- वहीं, राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय का मानना है कि भाजपा की प्रस्तावित स्नेह यात्राएं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरगामी रणनीति का प्रमाण हैं। आज की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए माना जा सकता है कि 2024 में सत्ता में वापसी के लिए नरेंद्र मोदी के सामने कोई चुनौती नहीं है। अमित शाह स्वयं दावे के साथ कह रहे हैं कि वे अगले 30-40 साल सत्ता में रहने के लिए आए हैं। लेकिन इसके बाद भी वे अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं तो केवल इसलिए जिससे वे समाज के सभी वर्गों को अपने साथ लेने का बड़ा संदेश दे सकें।
- 2014, 2019 के आम चुनावों और यूपी विधानसभा चुनाव के बाद के कई सर्वे में यह स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा मुस्लिम मतदाताओं के बीच भी अपनी पकड़ बना रही है। मुस्लिम मतदाताओं का यह समर्थन उसे तब मिला है जबकि तमाम राजनीतिक दलों के द्वारा मुस्लिमों के मन में उसके लिए जानबूझकर दूरी पैदा की गई है। ऐसे में भाजपा की स्नेह यात्रा समाज के एक बड़े वर्ग को अपने साथ साधने की कोशिश है और इसका इस अर्थ में स्वागत किया जाना चाहिए कि देश की 20 करोड़ से अधिक आबादी को केवल धार्मिक आधार पर अलग-थलग करने से भारतीय लोकतंत्र कभी मजबूत नहीं हो सकता।