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ब्रिक्स: चीन की कथनी-करनी का होगा कूटनीतिक परीक्षण; 22-23 जून को दिल्ली दौरे पर चीन के विदेश मंत्री वांग यी
आशुतोष भाटिया, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Fri, 19 Jun 2026 07:55 AM IST
सार
ब्रिक्स देशों के एनएसए की 16वीं बैठक 22-23 जून को भारत में होगी। बैठक में सुरक्षा, आतंकवाद और तकनीकी खतरों पर चर्चा होगी। इसमें अजीत डोभाल और चीन के वांग यी शामिल होंगे। भारत सीमा विवाद पर सख्त रुख रखते हुए डैपसांग और डेमचोक से चीनी सैनिकों की वापसी का मुद्दा उठा सकता है।
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चीनी विदेश मंत्री वांग यी और भारतीय एनएसए अजित डोभाल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत 22 और 23 जून को ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) की 16वीं बैठक की मेजबानी करेगा। इस अहम बैठक में सदस्य देशों के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी क्षेत्रीय व वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों, आतंकरोधी सहयोग और उभरती प्रौद्योगिकियों से जुड़े खतरों पर विचार करेंगे। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल इस बैठक की अध्यक्षता करेंगे, जबकि चीन का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री व राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के उच्च प्रतिनिधि वांग यी करेंगे।
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यह बैठक कई भू-राजनीतिक चुनौतियों और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच होने जा रही है। डोभाल के बुलावे पर वांग यी का दिल्ली आना इसका स्पष्ट संकेत है कि सीमा पर जारी लंबे गतिरोध के बावजूद दोनों देश संवाद के धागे को टूटने नहीं देना चाहते। पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर दोनों ओर से सैन्य तैनाती बनी हुई है। हालांकि कूटनीतिक व सैन्य वार्ताओं के जरिये दोनों देशों ने कुछ विवादित बिंदुओं से सैनिकों को आंशिक रूप से पीछे हटाया है, लेकिन पूर्ण सैन्य वापसी और गश्त के अधिकारों को लेकर गतिरोध बरकरार है।
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भारत का रुख सख्त
इस कूटनीतिक बिसात पर भारत का रुख हमेशा से बेहद स्पष्ट और सख्त रहा है। भारत यह कह चुका है कि सीमा पर पूर्ण शांति और स्थिरता बहाल हुए बिना संबंधों को सामान्य नहीं माना जा सकता। इसके पूरे आसार हैं कि भारत इस बैठक में चीनी पक्ष के सामने डैपसांग और डेमचोक जैसे रणनीतिक क्षेत्रों से चीनी सैनिकों की पूर्ण वापसी का मुद्दा उठाए। यह मुलाकात चीन की कथनी और करनी की प्रामाणिकता परखने का जरिया बनेगी।
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चीन की कूटनीतिक मजबूरी
बीजिंग की रणनीति हमेशा से सीमा विवाद को एक तरफ रखकर व्यापारिक व बहुपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने की रही है। चीन यह दिखाना चाहता है कि सीमा पर मतभेदों के बावजूद दोनों बड़ी एशियाई ताकतें ब्रिक्स जैसे मंचों पर साथ काम कर सकती हैं। वांग यी की यात्रा के पीछे चीन की भूराजनीतिक मजबूरियां भी हैं। पश्चिम के साथ बढ़ते व्यापार युद्ध और अमेरिका की घेराबंदी के बीच, चीन ब्रिक्स को एक मजबूत पश्चिम-विरोधी ब्लॉक के रूप में दिखाना चाहता है। इसके लिए उसे भारत के सहयोग की जरूरत है। हालांकि भारत यह अच्छी तरह समझता है और चीन को यह रियायत नहीं देना चाहता कि सीमा पर अतिक्रमण भी चलता रहे और मंचों पर हाथ भी मिलाए जाएं।
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यह बैठक कई भू-राजनीतिक चुनौतियों और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच होने जा रही है। डोभाल के बुलावे पर वांग यी का दिल्ली आना इसका स्पष्ट संकेत है कि सीमा पर जारी लंबे गतिरोध के बावजूद दोनों देश संवाद के धागे को टूटने नहीं देना चाहते। पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर दोनों ओर से सैन्य तैनाती बनी हुई है। हालांकि कूटनीतिक व सैन्य वार्ताओं के जरिये दोनों देशों ने कुछ विवादित बिंदुओं से सैनिकों को आंशिक रूप से पीछे हटाया है, लेकिन पूर्ण सैन्य वापसी और गश्त के अधिकारों को लेकर गतिरोध बरकरार है।
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भारत का रुख सख्त
इस कूटनीतिक बिसात पर भारत का रुख हमेशा से बेहद स्पष्ट और सख्त रहा है। भारत यह कह चुका है कि सीमा पर पूर्ण शांति और स्थिरता बहाल हुए बिना संबंधों को सामान्य नहीं माना जा सकता। इसके पूरे आसार हैं कि भारत इस बैठक में चीनी पक्ष के सामने डैपसांग और डेमचोक जैसे रणनीतिक क्षेत्रों से चीनी सैनिकों की पूर्ण वापसी का मुद्दा उठाए। यह मुलाकात चीन की कथनी और करनी की प्रामाणिकता परखने का जरिया बनेगी।
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