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करगिल के अमर जवान को नमन: बलिदान दिवस पर BSF ने गणेश घोष को किया याद, बंगाल में उमड़ा देशभक्ति का सैलाब
Sat, 11 Jul 2026 11:09 PM IST
राकेश कुमार
अमर उजाला ब्यूरो, कोलकाता।
अमर उजाला ब्यूरो, कोलकाता।
Published by: राकेश कुमार
Updated Sat, 11 Jul 2026 11:09 PM IST
सार
पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के नूनगंज गांव में कारगिल बलिदानी कांस्टेबल गणेश चंद्र घोष को बीएसएफ की 194वीं बटालियन ने श्रद्धांजलि दी। पांच जुलाई 1999 को शहीद हुए जवान के परिवार को सम्मानित किया गया और ग्रामीणों व अधिकारियों ने देश सेवा के लिए उनके सर्वोच्च बलिदान को याद किया।
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बलिदानी कांस्टेबल गणेश चंद्र घोष को नमन
- फोटो : @अमर उजाला
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विस्तार
कारगिल युद्ध के वीरों को याद करने की परंपरा आज भी जारी है। उनके सर्वोच्च बलिदान को सम्मान देने के लिए एक विशेष कार्यक्रम हुआ। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की 194वीं बटालियन ने इस समारोह का आयोजन किया। यह कार्यक्रम पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के नूनगंज गांव में आयोजित किया गया। यहां मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण देने वाले कांस्टेबल गणेश चंद्र घोष को श्रद्धांजलि दी गई।
कारगिल युद्ध के दौरान पांच जुलाई 1999 को गणेश चंद्र घोष बलिदान हुए थे। वह देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी याद में हुए इस समारोह में सुरक्षा बलों के अधिकारियों और जवानों ने भाग लिया। साथ ही स्थानीय जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में ग्रामीण भी वहां पहुंचे।
वीर जवान के साहस को सलाम
समारोह की शुरुआत 194वीं बटालियन के कमांडेंट एम.वी.एस. मुगुंथन के भाषण से हुई। उन्होंने बलिदानी गणेश चंद्र घोष के साहस और कर्तव्यनिष्ठा को याद किया। उन्होंने देश के प्रति शहीद के निस्वार्थ समर्पण की सराहना की। कमांडेंट ने कहा कि ऐसे वीर जवानों के कारण ही देश की सीमाएं सुरक्षित हैं। हमारी आने वाली पीढ़ियों को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
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उन्होंने कहा कि कारगिल युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। इस युद्ध में देश के जवानों ने बहुत कठिन परिस्थितियों का सामना किया। उन्होंने अत्यंत विषम हालात में भी अदम्य साहस का परिचय दिया। कांस्टेबल गणेश चंद्र घोष भी उन्हीं वीरों में शामिल थे। उन्होंने राष्ट्र की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। समारोह के दौरान बीएसएफ के अधिकारियों और जवानों ने बलिदानियों की प्रतिमा पर पुष्पचक्र और पुष्पांजलि अर्पित की। पूरा माहौल देशभक्ति और सम्मान की भावना से भर गया।
यह भी पढ़ें: 'संघीय ढांचे को खतरा नहीं': पैनल प्रमुख चौधरी का 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर बड़ा दावा, क्या बदलेगी व्यवस्था?
शहीद के परिजनों का सम्मान
इस अवसर पर शहीद के परिवार को भी सम्मानित किया गया। उनके भाई मंटू घोष और गोपाल चंद्र घोष वहां मौजूद थे। परिवार के अन्य सदस्यों को भी शॉल भेंट कर सम्मान दिया गया। परिवार के सदस्यों ने बीएसएफ और स्थानीय लोगों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि देश और सुरक्षा बल शहीदों को बहुत सम्मान देते हैं। यह सम्मान परिवार के लिए गर्व और संबल का स्रोत है।
इस कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण शामिल हुए। गांव के लोगों ने भी अपने वीर सपूत को याद किया। उन्होंने शहीद के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प लिया। बीएसएफ अधिकारियों ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम केवल श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं होते। ये समाज और युवाओं में राष्ट्र सेवा की भावना जगाते हैं। इससे युवाओं में अनुशासन और बलिदान की भावना मजबूत होती है।
साहस का प्रतीक है कारगिल युद्ध
कारगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 के बीच लड़ा गया था। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कारगिल की ऊंची चोटियों पर कब्जा करने का प्रयास किया था। भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में अभियान चलाया। उन्होंने सफल सैन्य अभियान चलाकर दुश्मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध में देश के सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। हर वर्ष जुलाई में देशभर में कारगिल के वीरों को श्रद्धांजलि दी जाती है। पूरा देश उनके बलिदान को याद करता है।
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कारगिल युद्ध के दौरान पांच जुलाई 1999 को गणेश चंद्र घोष बलिदान हुए थे। वह देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी याद में हुए इस समारोह में सुरक्षा बलों के अधिकारियों और जवानों ने भाग लिया। साथ ही स्थानीय जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में ग्रामीण भी वहां पहुंचे।
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वीर जवान के साहस को सलाम
समारोह की शुरुआत 194वीं बटालियन के कमांडेंट एम.वी.एस. मुगुंथन के भाषण से हुई। उन्होंने बलिदानी गणेश चंद्र घोष के साहस और कर्तव्यनिष्ठा को याद किया। उन्होंने देश के प्रति शहीद के निस्वार्थ समर्पण की सराहना की। कमांडेंट ने कहा कि ऐसे वीर जवानों के कारण ही देश की सीमाएं सुरक्षित हैं। हमारी आने वाली पीढ़ियों को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
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उन्होंने कहा कि कारगिल युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। इस युद्ध में देश के जवानों ने बहुत कठिन परिस्थितियों का सामना किया। उन्होंने अत्यंत विषम हालात में भी अदम्य साहस का परिचय दिया। कांस्टेबल गणेश चंद्र घोष भी उन्हीं वीरों में शामिल थे। उन्होंने राष्ट्र की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। समारोह के दौरान बीएसएफ के अधिकारियों और जवानों ने बलिदानियों की प्रतिमा पर पुष्पचक्र और पुष्पांजलि अर्पित की। पूरा माहौल देशभक्ति और सम्मान की भावना से भर गया।
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शहीद के परिजनों का सम्मान
इस अवसर पर शहीद के परिवार को भी सम्मानित किया गया। उनके भाई मंटू घोष और गोपाल चंद्र घोष वहां मौजूद थे। परिवार के अन्य सदस्यों को भी शॉल भेंट कर सम्मान दिया गया। परिवार के सदस्यों ने बीएसएफ और स्थानीय लोगों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि देश और सुरक्षा बल शहीदों को बहुत सम्मान देते हैं। यह सम्मान परिवार के लिए गर्व और संबल का स्रोत है।
इस कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण शामिल हुए। गांव के लोगों ने भी अपने वीर सपूत को याद किया। उन्होंने शहीद के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प लिया। बीएसएफ अधिकारियों ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम केवल श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं होते। ये समाज और युवाओं में राष्ट्र सेवा की भावना जगाते हैं। इससे युवाओं में अनुशासन और बलिदान की भावना मजबूत होती है।
साहस का प्रतीक है कारगिल युद्ध
कारगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 के बीच लड़ा गया था। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कारगिल की ऊंची चोटियों पर कब्जा करने का प्रयास किया था। भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में अभियान चलाया। उन्होंने सफल सैन्य अभियान चलाकर दुश्मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध में देश के सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। हर वर्ष जुलाई में देशभर में कारगिल के वीरों को श्रद्धांजलि दी जाती है। पूरा देश उनके बलिदान को याद करता है।