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CAPF: शौर्य चक्र विजेताओं सहित पदोन्नति में पिछड़े कैडर अफसर पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, CAPF अधिनियम को चुनौती
सार
केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के करीब तीन हजार अधिकारियों ने सीएपीएफ कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। आइए जानते हैं कि क्या है पूरा मामला और कब इन याचिकाओं पर सुनवाई होगी?
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
स्वतंत्र भारत के विधिक इतिहास में इसे एक अभूतपूर्व घटनाक्रम कहा जाएगा कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के लगभग तीन हजार कैडर अफसरों ने सीएपीएफ (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) अधिनियम, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। इन कैडर अफसरों में शौर्य चक्र विजेताओं के अलावा महिला अधिकारी भी शामिल हैं। सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी के कैडर अधिकारियों द्वारा याचिका लगाने की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। सर्वोच्च अदालत में इन सभी याचिकाओं पर अगस्त के पहले सप्ताह में सुनवाई होने की संभावना है।
सभी केंद्रीय बलों से लग रही याचिकाएं
संसद में कुछ समय पहले पारित हुए सीएपीएफ (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) अधिनियम, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने वाले प्रमुख याचिकाकर्ताओं में बिभोर कुमार सिंह (शौर्य चक्र विजेता) एवं अन्य बनाम भारत सरकार, किशोर सिंह बिष्ट 'पीएमजी' एवं अन्य बनाम भारत सरकार, संजय प्रकाश एवं अन्य बनाम भारत सरकार, भवानी सिंह एवं अन्य बनाम भारत सरकार, अमित कुमार (शौर्य चक्र विजेता) एवं अन्य बनाम भारत सरकार शामिल हैं। इनके अलावा 21 महिला अधिकारी भी याचिकाकर्ता हैं। फिलहाल सीआरपीएफ के लगभग 1400 याचिकाकर्ता, बीएसएफ के 500 से अधिक, आईटीबीपी के 432, सीआईएसएफ के 34 और एसएसबी के 110 कैडर अफसरों की तरफ से याचिकाएं लगाई जा चुकी हैं। पूर्व कैडर अफसरों का कहना है कि याचिकाओं की संख्या 3500 से ज्यादा पहुंचने की संभावना है।
क्यों आई याचिका लगाने की नौबत?
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मई 2025 में संजय प्रकाश एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया गया था। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने सीएपीएफ के ग्रुप 'ए' कार्यपालक संवर्ग को संगठित ग्रुप 'ए' सेवा (ओजीएएस) घोषित करते हुए महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। उनमें आईजी लेवल तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति में चरणबद्ध तरीके से कमी लाना, ताकि संवर्ग अधिकारियों को स्वाभाविक पदोन्नति का अवसर मिल सके। नियमित कैडर समीक्षा हो, नए सेवा नियमों का निर्माण तथा नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (एनएफएफयू) लागू कर दीर्घकालीन पदोन्नति ठहराव को दूर करना शामिल था। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ संसद में 'सीएपीएफ (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) अधिनियम, 2026' पारित करा दिया। इस बाबत पूर्व कैडर अफसरों, मौजूदा अधिकारियों और विपक्षी दलों का पुरजोर विरोध देखने को मिला था। अब कैडर अधिकारियों के सामने सुप्रीम कोर्ट में उक्त विधेयक को चुनौती देने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा था।
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सरकार की रिव्यू पिटीशन भी डिसमिस हो गई
सुप्रीम कोर्ट का 23 मई 2025 का वह फैसला, गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन, कैडर समीक्षा और आईपीएस प्रतिनियुक्ति को समाप्त करने के लिए भर्ती नियमों के पुनर्गठन व संशोधन की मांग वाली कई याचिकाओं पर आया था। सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि देश की सीमाओं पर सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ आंतरिक सुरक्षा कर्तव्यों के निर्वहन के लिए सीएपीएफ की भूमिका महत्वपूर्ण है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को छह माह के भीतर इस फैसले का पालन करना था। इस अवधि के दौरान केंद्र सरकार, रिव्यू पिटीशन में चली गई। पिछले साल 28 अक्तूबर को सर्वोच्च अदालत में जस्टिस सूर्य कांत (अब चीफ जस्टिस) और जस्टिस उज्जल भुइयां की बैंच द्वारा रिव्यू पिटीशन को डिसमिस कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि केंद्रीय बलों में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम किया जाए। दूसरी तरफ गत छह माह में केंद्रीय बलों में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति में तेजी देखने को मिली। 56 से ज्यादा आईपीएस ने सीएपीएफ में प्रतिनियुक्ति पर ज्वाइन किया।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही अवमानना याचिका पर सुनवाई
पूर्व कैडर अफसरों का कहना है कि इस अधिनियम के माध्यम से सीएपीएफ में आईजी तथा उससे ऊपर के पदों पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति को न्यूनतम प्रतिशत के साथ वैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया है। साथ ही, सेवा संबंधी मामलों में गृह मंत्रालय को व्यापक एवं सर्वोपरि अधिकार दिए गए हैं, जिससे सीएपीएफ की स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। लंबे इंतजार से निराश होकर अधिकारियों ने दिसंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की। इस मामले की सुनवाई जारी है। सरकार ने बार-बार निर्णय लागू करने के लिए समय मांगा, किंतु आश्चर्यजनक रूप से उसी दौरान ऐसा विधेयक लेकर आई जिसे अनेक अधिकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय की भावना और निर्देशों के विपरीत बताया। मौजूद केस में सेवारत अधिकारियों के अलावा पूर्व कैडर अफसर भी वकालतनामे पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।
कैडर अफसरों को 15 साल में पहली पदोन्नति नहीं
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद ने कहा, सीआरपीएफ और बीएसएफ के अलावा दूसरे केंद्रीय बलों में पदोन्नति को लेकर हालात खराब होते जा रहे हैं। यूपीएससी की परीक्षा पास कर सेवा में आए ग्राउंड कमांडर यानी सहायक कमांडेंट को 15 साल में पहली पदोन्नति नहीं मिल पा रही। इस रफ्तार से तो वे कमांडेंट के पद से ही रिटायर हो जाएंगे। दो तीन सौ अफसरों में से एक आध ही एडीजी तक पहुंच सकेगा। बीएसएफ और सीआरपीएफ की बात करें तो 2016 से इन बलों में कैडर रिव्यू ही नहीं हुआ है। डीओपीटी का नियम है कि हर पांच वर्ष में कैडर रिव्यू हो। कैडर अफसरों के पास कार्य करने की क्षमता और लंबा अनुभव है, लेकिन पॉलिसी लेवल पर निर्णय लेने में इनका इस्तेमाल बहुत कम है, जबकि बॉर्डर या इंटरनल सिक्योरिटी में इनका बड़ा योगदान है।
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सभी केंद्रीय बलों से लग रही याचिकाएं
संसद में कुछ समय पहले पारित हुए सीएपीएफ (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) अधिनियम, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने वाले प्रमुख याचिकाकर्ताओं में बिभोर कुमार सिंह (शौर्य चक्र विजेता) एवं अन्य बनाम भारत सरकार, किशोर सिंह बिष्ट 'पीएमजी' एवं अन्य बनाम भारत सरकार, संजय प्रकाश एवं अन्य बनाम भारत सरकार, भवानी सिंह एवं अन्य बनाम भारत सरकार, अमित कुमार (शौर्य चक्र विजेता) एवं अन्य बनाम भारत सरकार शामिल हैं। इनके अलावा 21 महिला अधिकारी भी याचिकाकर्ता हैं। फिलहाल सीआरपीएफ के लगभग 1400 याचिकाकर्ता, बीएसएफ के 500 से अधिक, आईटीबीपी के 432, सीआईएसएफ के 34 और एसएसबी के 110 कैडर अफसरों की तरफ से याचिकाएं लगाई जा चुकी हैं। पूर्व कैडर अफसरों का कहना है कि याचिकाओं की संख्या 3500 से ज्यादा पहुंचने की संभावना है।
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क्यों आई याचिका लगाने की नौबत?
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मई 2025 में संजय प्रकाश एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया गया था। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने सीएपीएफ के ग्रुप 'ए' कार्यपालक संवर्ग को संगठित ग्रुप 'ए' सेवा (ओजीएएस) घोषित करते हुए महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। उनमें आईजी लेवल तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति में चरणबद्ध तरीके से कमी लाना, ताकि संवर्ग अधिकारियों को स्वाभाविक पदोन्नति का अवसर मिल सके। नियमित कैडर समीक्षा हो, नए सेवा नियमों का निर्माण तथा नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (एनएफएफयू) लागू कर दीर्घकालीन पदोन्नति ठहराव को दूर करना शामिल था। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ संसद में 'सीएपीएफ (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) अधिनियम, 2026' पारित करा दिया। इस बाबत पूर्व कैडर अफसरों, मौजूदा अधिकारियों और विपक्षी दलों का पुरजोर विरोध देखने को मिला था। अब कैडर अधिकारियों के सामने सुप्रीम कोर्ट में उक्त विधेयक को चुनौती देने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा था।
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सरकार की रिव्यू पिटीशन भी डिसमिस हो गई
सुप्रीम कोर्ट का 23 मई 2025 का वह फैसला, गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन, कैडर समीक्षा और आईपीएस प्रतिनियुक्ति को समाप्त करने के लिए भर्ती नियमों के पुनर्गठन व संशोधन की मांग वाली कई याचिकाओं पर आया था। सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि देश की सीमाओं पर सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ आंतरिक सुरक्षा कर्तव्यों के निर्वहन के लिए सीएपीएफ की भूमिका महत्वपूर्ण है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को छह माह के भीतर इस फैसले का पालन करना था। इस अवधि के दौरान केंद्र सरकार, रिव्यू पिटीशन में चली गई। पिछले साल 28 अक्तूबर को सर्वोच्च अदालत में जस्टिस सूर्य कांत (अब चीफ जस्टिस) और जस्टिस उज्जल भुइयां की बैंच द्वारा रिव्यू पिटीशन को डिसमिस कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि केंद्रीय बलों में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम किया जाए। दूसरी तरफ गत छह माह में केंद्रीय बलों में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति में तेजी देखने को मिली। 56 से ज्यादा आईपीएस ने सीएपीएफ में प्रतिनियुक्ति पर ज्वाइन किया।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही अवमानना याचिका पर सुनवाई
पूर्व कैडर अफसरों का कहना है कि इस अधिनियम के माध्यम से सीएपीएफ में आईजी तथा उससे ऊपर के पदों पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति को न्यूनतम प्रतिशत के साथ वैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया है। साथ ही, सेवा संबंधी मामलों में गृह मंत्रालय को व्यापक एवं सर्वोपरि अधिकार दिए गए हैं, जिससे सीएपीएफ की स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। लंबे इंतजार से निराश होकर अधिकारियों ने दिसंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की। इस मामले की सुनवाई जारी है। सरकार ने बार-बार निर्णय लागू करने के लिए समय मांगा, किंतु आश्चर्यजनक रूप से उसी दौरान ऐसा विधेयक लेकर आई जिसे अनेक अधिकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय की भावना और निर्देशों के विपरीत बताया। मौजूद केस में सेवारत अधिकारियों के अलावा पूर्व कैडर अफसर भी वकालतनामे पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।
कैडर अफसरों को 15 साल में पहली पदोन्नति नहीं
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद ने कहा, सीआरपीएफ और बीएसएफ के अलावा दूसरे केंद्रीय बलों में पदोन्नति को लेकर हालात खराब होते जा रहे हैं। यूपीएससी की परीक्षा पास कर सेवा में आए ग्राउंड कमांडर यानी सहायक कमांडेंट को 15 साल में पहली पदोन्नति नहीं मिल पा रही। इस रफ्तार से तो वे कमांडेंट के पद से ही रिटायर हो जाएंगे। दो तीन सौ अफसरों में से एक आध ही एडीजी तक पहुंच सकेगा। बीएसएफ और सीआरपीएफ की बात करें तो 2016 से इन बलों में कैडर रिव्यू ही नहीं हुआ है। डीओपीटी का नियम है कि हर पांच वर्ष में कैडर रिव्यू हो। कैडर अफसरों के पास कार्य करने की क्षमता और लंबा अनुभव है, लेकिन पॉलिसी लेवल पर निर्णय लेने में इनका इस्तेमाल बहुत कम है, जबकि बॉर्डर या इंटरनल सिक्योरिटी में इनका बड़ा योगदान है।