फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Charity, education, healthcare fronts emerging as new channels for terror funding: Agencies

चैरिटी और शिक्षा के नाम पर बढ़े संगठन: क्या इनकी आड़ में हो रही आतंकी फंडिंग; खुफिया एजेंसियों ने क्या कहा?

Sat, 08 Aug 2026 01:43 PM IST
निर्मल कांत आईएएनएस, नई दिल्ली।
आईएएनएस, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Sat, 08 Aug 2026 01:43 PM IST
सार

धर्मार्थ, शिक्षा, धर्म और स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर बने कुछ संगठनों को लेकर भारतीय एजेंसियों ने चिंता जताई है। क्या इनकी आड़ में आतंक की फंडिंग हो रही है? जानें, कैसे पहुंचाया जा रहा पैसा और क्यों मुश्किल है इसका पता लगाना।

विज्ञापन
Charity, education, healthcare fronts emerging as new channels for terror funding: Agencies
आतंकी फंडिंग (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

धर्मार्थ (चैरिटी), शिक्षा, धर्म और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े संगठनों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। भारतीय एजेंसियों ने पाया कि इनमें से सभी संगठन उस काम के लिए नहीं बनाए गए हैं, जिसका वे दावा करते हैं।
विज्ञापन


असल में, इनमें से कई संगठन केवल दिखावे के लिए बनाए गए हैं। इनका इस्तेमाल गलत तरीके से हासिल किए गए पैसे को जमा करने के लिए किया जाता है। बाद में इसी पैसे का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने या देश के अलग-अलग हिस्सों में मुश्किल पैदा करने के लिए किया जाता है।
विज्ञापन


अधिकारी ने क्या कहा?
एक अधिकारी ने बताया कि देश के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान चलाया रहा है। इसी वजह से ऐसे दिखावटी संगठनों की संख्या अचानक बढ़ती दिख रही है। अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान जैसे देश इसमें सबसे आगे हैं। पाकिस्तान की नीति भारत को धीरे-धीरे कमजोर करने और अलग-अलग जगहों पर परेशानी पैदा करने की रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


अधिकारी ने बताया कि इस काम की जिम्मेदारी संभाल रहे पाकिस्तानी लोग अपने देश के संसाधनों का इस्तेमाल नहीं करते। वे विदेश में काम कर रहे अपने एजेंटों से संपर्क करते हैं। इन एजेंटों को भारत में मौजूद अपने साथियों से संपर्क करने और ऐसे दिखावटी संगठन बनाने के लिए कहा जाता है।

पैसे का पता लगाना क्यों मुश्किल?
  • खुफिया ब्यूरो के एक अधिकारी ने कहा कि ये संगठन आसानी से शक के दायरे में नहीं आते, क्योंकि वे खुले तौर पर कुछ ऐसा नहीं करते, जिससे उन पर शक हो।
  • उन्होंने बताया कि बाद में उनकी गतिविधियों का पता लगाया जा सकता है। लेकिन असली परेशानी उनके पैसे का पता लगाने में होती है।
  • उन्होंने बताया कि पैसा भारत में बैंकिंग व्यवस्था जैसे वैध रास्तों के जरिये लाया जाता है।
  • अधिकारी ने बताया कि आमतौर पर रकम छोटी-छोटी होती है, क्योंकि भेजने वालों को बैंक के सामने इस लेनदेन का कारण बताना पड़ता है।
  • उन्होंने बताया कि भारतीय बैंकों में पैसा आने के बाद उसे निकाल लिया जाता है। इसके बाद यह पैसा ऐसे संगठनों तक पहुंचाया जाता है।

हवाला से कैसे पहुंचता है पैसा?
उन्होंने बताया कि पैसा भारत लाने का दूसरा तरीका आज भी बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसे हवाला कहा जाता है। ऐसे लोग अब भी हवाला को भारत में पैसा लाने और फिर उसे इन संगठनों तक पहुंचाने का सबसे सुरक्षित तरीका मानते हैं।

एक अन्य अधिकारी ने बताया कि इस तरीके को केरल में काफी सफलता मिली है। इन राज्यों के बड़ी संख्या में लोग खाड़ी देशों में काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर लोग अपने परिवारों को पैसे भेजने के लिए बैंकिंग व्यवस्था के बजाय हवाला का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें यह तरीका सस्ता और सुरक्षित लगता है।

अधिकारी ने बताया कि खाड़ी देशों में काम करने वाले लोगों के जरिये पैसा भारत भेजा जाता है। उन्हें एजेंट अलग से पैसा देते हैं और कहते हैं कि इसे भी अपने घर भेजे जाने वाले पैसे के साथ भारत भेज दें। भारत में एजेंट उनके परिवार से वह पैसा ले लेते हैं। इसके बाद यही पैसा इन संगठनों तक पहुंचाया जाता है।

जांच एजेंसियों के सामने क्या है चुनौती?
एक अधिकारी ने कहा कि ऐसे लेनदेन का पता लगाना ज्यादा मुश्किल होता है, क्योंकि इनकी संख्या बहुत ज्यादा होती है। संगठनों और उनकी गतिविधियों का पता लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। असली चुनौती पैसे के आने-जाने का पता लगाने में होती है।

पिछले 10 वर्षों में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और खुफिया ब्यूरो ने ऐसे संगठनों को खत्म करने के लिए लगातार काम किया है। कई संगठनों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई है। लेकिन समस्या यह है कि कुछ समय रुकने के बाद नए संगठन सामने आ जाते हैं।

इन सभी जांच के दौरान खास तौर पर ईडी के लिए पैसे के स्रोत और उसके आगे जाने के रास्ते का पता लगाना सबसे बड़ी चुनौती रहा है। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे संगठन देश के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं हैं। हर राज्य में इनकी संख्या भले ही कम हो। लेकिन इनका फैलाव पूरे देश में है। यही वजह है कि इन पर कार्रवाई करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

जाकिर नाइक के संगठन से कैसे हुए प्रेरित?
इन सभी संगठनों और इनके साथ जुड़े लोगों ने (कट्टरपंथी इस्लामी उपदेशक) जाकिर नाइक की ओर से बनाए गए इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन (आईआरएफ) से प्रेरणा ली है। आईआरएफ शुरुआती संगठनों में से एक था, जिसने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के नाम पर चैरिटी के पैसे इकट्ठा करने के लिए संगठन बनाया था। हालांकि, आईआरएफ में आने वाले ज्यादातर पैसे का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा को फैलाने के लिए किया गया।


ये भी पढ़ें: सिद्धिविनायक चढ़ावा मामला: फडणवीस का अधिकारियों को आदेश- पांच साल के रिकॉर्ड की जांच करें; क्या है पूरा विवाद?

एक अधिकारी ने कहा कि नए संगठन भले ही आईआरएफ जितने बड़े स्तर पर काम न करते हों। लेकिन इनकी बहुत ज्यादा संख्या ही सबसे बड़ी चुनौती है। कुछ संगठन लंबे समय तक काम करते हैं, जबकि कुछ अस्थायी तौर पर बनाए जाते हैं। ऐसे संगठन प्राकृतिक आपदा, दंगे या विरोध-प्रदर्शन के समय सामने आते हैं। ये संगठन थोड़े समय तक काम करते हैं और राहत देने के नाम पर देश के अंदर से पैसे इकट्ठा करते हैं। 

अधिकारी ने बताया कि मामला खत्म होने के बाद ये संगठन बंद हो जाते हैं। इसके बाद इकट्ठा किए गए पैसे को आतंकवादी संगठनों या देश में परेशानी पैदा करने का काम करने वाले दूसरे लोगों तक पहुंचाया जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed