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Congress: कैंसर की बड़ी सर्जरी से गुजर रही कांग्रेस, मोदी-योगी ब्रांड राजनीति के बीच संभलने की कोशिश

Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Sun, 25 Jan 2026 07:05 PM IST
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सार

पार्टी की इस योजना पर अभी से प्रश्न खड़े होने शुरू हो गए हैं। यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय और महासचिव की संस्तुति के आधार पर पार्टी ने लगभग दस महीने पहले 20-21 मार्च 2025 को प्रदेश के सभी 75 जिलों और अन्य शहरी निकायों के लिए 133 पदाधिकारियों की नियुक्ति की थी।

Congress Undergoing major surgery tries to recover amid Modi Yogi brand politics Muslim Rahul Gandhi Kharge
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे - फोटो : PTI
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विस्तार
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राहुल गांधी ने एक बार कहा था कि वे बार-बार सरकार की नाकामियों को उजागर करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि जनता पर उसका कोई असर ही नहीं होता। राहुल को इसकी जानकारी भले ही न हो, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर कांग्रेस के पुराने दिग्गज नेता भी मानते हैं कि इसका कारण पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का जमीन से कटा होना है। निचले स्तर पर पार्टी के अंदर और देश-समाज के भीतर क्या चल रहा है, शीर्ष नेतृत्व को इसके विषय में कोई जानकारी नहीं होती। इस कारण समस्याओं से निपटने के लिए सही जमीनी रणनीति नहीं बनती जिसके कारण उसका कोई असर भी नहीं होता। कांग्रेस का 'संगठन सृजन अभियान' इसी कमजोर कड़ी को मजबूत करने की कोशिश है जिससे पार्टी को अगले यूपी चुनाव, 2029 के आम चुनाव और इससे भी आगे भविष्य की राजनीति के लिए तैयार किया जा सके। लेकिन क्या ऐसा होगा?

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कांग्रेस की केंद्रीय इकाई ने 24 जनवरी को यूपी के 75 जिलों के लिए 75 ऑब्जर्वर नियुक्त किए हैं। ये ऑब्जर्वर यूपी के अपने जिलों में जाकर कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगे और पार्टी की विचारधारा और सामाजिक-राजनीतिक जीवन में सक्रियता के आधार पर ऐसे लोगों का चयन करेंगे जो जिले में पार्टी का काम आगे बढ़ा सकें। 
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ये ऑब्जर्वर सीधे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को रिपोर्ट करेंगे जिससे नेतृत्व को जमीनी स्थिति का पता रहे और जमीनी रिपोर्ट के आधार पर रणनीति बनाई जा सके। पार्टी की तरफ से राज्यसभा भेजे जाने वाले और लोकसभा-विधानसभाओं में टिकट पाने वालों के नामों का चयन होने में भी इनकी राय महत्त्वपूर्ण रहेगी।         

लेकिन क्या पार्टी की यह रणनीति सफल रहेगी? 
पार्टी की इस योजना पर अभी से प्रश्न खड़े होने शुरू हो गए हैं। यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय और महासचिव की संस्तुति के आधार पर पार्टी ने लगभग दस महीने पहले 20-21 मार्च 2025 को प्रदेश के सभी 75 जिलों और अन्य शहरी निकायों के लिए 133 पदाधिकारियों की नियुक्ति की थी। यह टीम कोई महत्त्वपूर्ण कार्य कर भी नहीं पाई, लेकिन इसके पहले ही उसे पूरी तरह भंग कर नए जिलाध्यक्षों और शहर अध्यक्षों की नियुक्ति की तैयारी कर ली गई है। 

क्या प्रदेश अध्यक्ष नए जिलाध्यक्षों से काम ले पाएंगे?
इसके बाद पार्टी संगठन में इस बात की सुगबुगाहट शुरू हो गई है कि क्या शीर्ष नेतृत्व को अपने प्रदेश अध्यक्ष और महासचिव पर भरोसा नहीं है? यदि यह बदलाव करना था तो अजय राय की संस्तुति पर नए पदाधिकारियों की नियुक्ति क्यों की गई? यदि ये नए जिलाध्यक्ष ऑब्जर्वर की संस्तुति पर सीधे केंद्रीय इकाई से नियुक्त होंगे, वे केंद्रीय नेतृत्व के प्रति ही जवाबदेह होंगे तो प्रदेश अध्यक्ष उनसे काम कैसे ले पाएंगे? क्या इससे हर प्रदेश के हर जिले में प्रदेश अध्यक्ष से अलग नए पॉवर सेंटर नहीं बन जाएंगे? इस तरह पार्टी आपसी सामंजस्य के बिना कैसे मजबूत होगी?

केंद्रीय नेतृत्व तक नहीं पहुंचती बात, बिकते हैं टिकट- रजिया सुल्तान 
उत्तर प्रदेश कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग की पूर्व उपाध्यक्ष रजिया सुल्तान ने अमर उजाला से कहा कि कांग्रेस की सबसे बड़ी कमी यह है कि यहां निचले स्तर पर जमीनी काम करने वाले कार्यकर्ताओं को कोई महत्त्व नहीं मिलता। जो निचले स्तर पर जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ता हैं, उनकी असली-जमीनी  बात राहुल गांधी तक पहुंचती ही नहीं है। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार की कई नीतियों के खिलाफ जनता में आक्रोश है, जनता कांग्रेस से जुड़ना भी चाहती है, लेकिन बिचौलियों की भूमिका के कारण जनता से जुड़ाव रखने वाले असली नेता सामने नहीं आ पाते। लिहाजा पार्टी लगातार कमजोर होती जा रही है। 

रजिया सुल्तान ने कहा कि 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में खुले तौर पर ऐसे लोगों को टिकट बेचा गया था जो जमीन पर कहीं सक्रिय नहीं थे। उनके पास ऐसे कार्यकर्ताओं के कॉल रिकॉर्ड मौजूद हैं जो बता रहे हैं कि प्रदेश के स्तर पर किस तरह असली कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर टिकट बेच दिए गए थे। उनका बड़ा सवाल है कि क्या संगठन सृजन अभियान से पार्टी के अंदर मौजूद इस तरह के काम करने वालों से छुटकारा पाया जा सकेगा। यदि ऐसा न हुआ तो इस पूरी कवायद का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। 

'नसीमुद्दीन-शकील अहमद के आरोपों को खारिज नहीं कर सकती पार्टी'
कांग्रेस ने जिस दिन ऑब्जर्वर की सूची जारी की, उसी दिन पार्टी को तगड़ा झटका लगा। पार्टी के वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उनके साथ कांग्रेस से इस्तीफा देने वालों में पूर्व विधायक, संगठन में शीर्ष पदों पर काम कर चुके वरिष्ठ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं सहित 73 लोग शामिल थे। नसीमुद्दीन ने पार्टी छोड़ते समय केवल यही कहा कि आज की कांग्रेस भाजपा-आरएसएस से मुकाबला करने में सक्षम नहीं है। बड़ा प्रश्न है कि यदि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को ही यह भरोसा नहीं है कि पार्टी मजबूत हो सकती है तो नए नेता पार्टी को कैसे मजबूत कर पाएंगे।

सोनिया गांधी के बहुत करीब रह चुके कांग्रेस के पूर्व नेता शकील अहमद ने आरोप लगाया है कि राहुल गांधी से मिलने के लिए उनके कार्यालय में नाम देना पड़ता है। लेकिन लंबे समय तक कोई जवाब नहीं आता। यदि राहुल गांधी शकील अहमद जैसे टॉप कांग्रेस नेताओं की बातों को गंभीरता से नहीं ले पाते तो यह उम्मीद कैसे की जाए कि वे नए जिलाध्यक्षों की सलाहों को बहुत गंभीरता से लेंगे। यदि शीर्ष स्तर पर इसी तरह की कार्य संस्कृति बनी रही तो कांग्रेस कैसे मजबूत होगी?

पार्टी कार्यकर्ताओं की सुनी जाएगी बात, फिर जनता की आवाज बनेगी पार्टी- कांग्रेस 
कांग्रेस के प्रवक्ता अनुज अत्रे ने अमर उजाला से कहा कि यह आरोप सही नहीं है कि पार्टी कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनती। लेकिन संगठन सृजन अभियान से इसी तरह का तंत्र खड़ा करने की कोशिश की जा रही है जो बिना किसी लाग-लपेट के जमीनी फीडबैक शीर्ष नेतृत्व को पहुंचा सकें। उन्होंने कहा कि एक राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर वे बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि कोई पार्टी किस क्षेत्र में कितनी मजबूत है और किसे कितनी सफलता मिल सकती है। लेकिन भाजपा जिन क्षेत्रों में कमजोर है, वहां भी उसे सफलता मिलना बताता है कि कहीं न कहीं पूरी व्यवस्था में गड़बड़ी है। नई टीम से इस कमी को दूर करने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने कहा कि पार्टी के अंदर चल रहे इस बड़े बदलाव के आधार पर अगले यूपी चुनाव और आम चुनाव में वे भाजपा को कड़ी टक्कर देने में सफल रहेंगे। 

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