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'बॉस स्कैम': चीन-पाकिस्तान से जुड़े नेटवर्क का खुलासा, 1071 करोड़ रुपये के साइबर ठगी में मास्टरमाइंड गिरफ्तार
Tue, 18 Aug 2026 05:23 PM IST
Pavan
पीटीआई, अहमदाबाद
पीटीआई, अहमदाबाद
Published by: Pavan
Updated Tue, 18 Aug 2026 05:23 PM IST
सार
अहमदाबाद साइबर पुलिस ने चीन, पाकिस्तान और हांगकांग से जुड़े साइबर नेटवर्क का खुलासा किया है। ‘बॉस स्कैम’ में कंपनी के अधिकारियों की पहचान बनाकर 1.5 करोड़ की ठगी हुई, जिसमें 1.13 करोड़ बरामद किए गए। वहीं गुजरात सीआईडी ने 1090 मामलों में 1071.5 करोड़ की साइबर ठगी से जुड़े असम के आरोपी रफीकुल आलम को गिरफ्तार किया है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
साइबर ठगी करने वाले अपराधियों ने कंपनियों के अधिकारियों और कर्मचारियों को निशाना बनाने के लिए ठगी का नया तरीका खोज लिया है। इसे 'बॉस स्कैम' या सीईओ इंपर्सोनेशन फ्रॉड कहा जा रहा है। इसमें ठग कंपनी के मालिक, सीईओ या निदेशक बनकर कर्मचारियों को पैसे ट्रांसफर करने का निर्देश देते हैं। अहमदाबाद साइबर क्राइम ब्रांच ने ऐसे ही एक मामले की जांच करते हुए चीन, पाकिस्तान, भारत और हांगकांग तक फैले साइबर नेटवर्क का पता लगाया है। इसी जांच के दौरान पश्चिम बंगाल से दो ऐसे आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जो कथित तौर पर साइबर ठगों को फर्जी सिम, मोबाइल नंबर और व्हाट्सऐप अकाउंट उपलब्ध कराते थे। पुलिस ने दावा किया है कि इनके जरिए करीब 4,500 सिम कार्ड साइबर अपराधियों तक पहुंचाए गए और देश के 26 राज्यों में इनसे जुड़े करीब 252 साइबर अपराध के मामले सामने आए हैं।
व्हाट्सएप पर भेजी जिप फाइल, फिर कंपनी के मालिक बनकर ठगी
अहमदाबाद के एक कारोबारी से इसी तरीके से 1.5 करोड़ रुपये की ठगी की गई। पुलिस के अनुसार, 23 जून को कारोबारी के मोबाइल नंबर पर व्हाट्सऐप के जरिए एक जिप फाइल भेजी गई। इसमें कंपनी के बैंक खाते में 'असामान्य लेनदेन' होने की बात कही गई और आरबीआई के रिस्क कंट्रोल विभाग की ओर से कार्रवाई की चेतावनी दी गई। ठगों ने पहले खुद को आरबीआई अधिकारी बताया। इसके बाद उन्होंने कंपनी के मालिक की पहचान का इस्तेमाल किया और कंपनी के अकाउंटेंट को निर्देश दिया कि वह बताए गए बैंक खाते में 1.5 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर दे। ठगी का पता चलने के बाद पीड़ित ने साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत की। पुलिस के अनुसार, कार्रवाई के बाद ठगी गई रकम में से 1.13 करोड़ रुपये बरामद कर लिए गए।
ऐसे काम करता है 'बॉस स्कैम'
पुलिस के मुताबिक, ठग कंपनी के अधिकारियों को व्हाट्सऐप पर जिप फाइल भेजते हैं। इसमें कथित तौर पर .exe और .dll फाइलें होती हैं। अगर कोई कर्मचारी इन्हें खोल देता है तो उसके सिस्टम या व्हाट्सऐप सेशन पर साइबर अपराधियों का नियंत्रण हो सकता है। इसके बाद ठग कंपनी के सीईओ, मालिक या निदेशक बनकर कर्मचारियों से संपर्क करते हैं। वे तत्काल भुगतान करने, किसी खाते में पैसे भेजने या गोपनीय जानकारी साझा करने का निर्देश देते हैं। कर्मचारी इसे कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी का आदेश समझकर पैसे ट्रांसफर कर सकता है। पुलिस के अनुसार, इस मामले में इस्तेमाल मालवेयर के चीन से जुड़े साइबर अपराधियों द्वारा विकसित किए जाने की आशंका है। इसे भारतीय लोगों को निशाना बनाने के लिए इस्लामाबाद स्थित कॉल सेंटर के जरिए इस्तेमाल किए जाने की बात भी जांच में सामने आई है। बैंक खातों तक पहुंच के लिए चीन आधारित वीपीएन सेवा के इस्तेमाल की भी जानकारी मिली है। शुरुआती जांच में साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर के तार चीन, भारत, पाकिस्तान और हांगकांग से जुड़े मिले हैं।
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10 हजार से ज्यादा डिवाइस को खतरे से बचाया
अहमदाबाद साइबर क्राइम ब्रांच और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के तकनीकी विश्लेषण के आधार पर पुलिस ने कार्रवाई की। पुलिस का कहना है कि इस अभियान के दौरान 10,000 से अधिक संक्रमित या संभावित रूप से प्रभावित डिवाइस को सुरक्षित किया गया। इससे भविष्य में करोड़ों रुपये की संभावित ठगी को रोका जा सका। साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे मालवेयर की पहचान कर उसे सहयोग पोर्टल के जरिए ब्लॉक करने की कार्रवाई भी की जा रही है।
फर्जी सिम और OTP बेचने वाले दो आरोपी गिरफ्तार
जांच के दौरान पश्चिम बंगाल के रहने वाले इमरान अली पियादा और इंजाम्मुल मोल्ला को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के अनुसार, पियादा टेलीकॉम कंपनियों का POS एजेंट था और ग्राहकों के बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल कर सिम कार्ड हासिल करता था। इसके बाद वह इन नंबरों को डमी सिम पर एक्टिवेट कर साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराता था। वह व्हाट्सएप अकाउंट एक्टिवेट करने के लिए जरूरी ओटीपी भी उपलब्ध कराता था। पुलिस के मुताबिक, पियादा ने करीब पांच साल में ई-कॉमर्स और ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े करीब 21,000 ओटीपी बेचे और इससे 21 लाख रुपये से ज्यादा कमाए। इसके अलावा उसने व्हाट्सएप अकाउंट एक्टिवेशन से जुड़े करीब 900 ओटीपी बेचकर 2.25 लाख रुपये से ज्यादा कमाए। दूसरा आरोपी इंजाम्मुल मोल्ला कथित तौर पर साइबर ठगों के साथ समन्वय करता था और मोबाइल नंबर, डमी सिम तथा व्हाट्सएप आधारित संचार व्यवस्था उपलब्ध कराने में मदद करता था। पुलिस ने दोनों के पास से सात मोबाइल फोन और एक राउटर बरामद किया है। जब्त सामान की कीमत करीब 19,500 रुपये बताई गई है।
'साइबरक्राइम इज ए सर्विस' का बढ़ता खतरा
पुलिस की जांच में साइबर अपराध के एक नए मॉडल का भी पता चला है, जिसे 'साइबरक्राइम इज ए सर्विस' कहा जा रहा है। इसमें साइबर अपराध करने वाले गिरोह खुद हर काम नहीं करते, बल्कि अलग-अलग लोगों से सिम कार्ड, ओटीपी, बैंक खाते, व्हाट्सएप अकाउंट, मालवेयर और दूसरी डिजिटल सुविधाएं खरीदते हैं। पुलिस के मुताबिक, व्हाट्सएप जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ऐसी डिजिटल सुविधाओं की खरीद-बिक्री के लिए समूह और नेटवर्क सक्रिय हैं। इससे किसी व्यक्ति या गिरोह के लिए साइबर ठगी करना आसान हो जाता है।
दूसरी कार्रवाई में 1,071 करोड़ की साइबर ठगी का खुलासा
इसी बीच गुजरात सीआईडी की साइबर सेल ने असम के बरपेटा से 25 वर्षीय रफीकुल आलम को गिरफ्तार किया है। पुलिस का दावा है कि वह देशभर में हुई 1,090 साइबर ठगी की घटनाओं में शामिल था और इन मामलों में कुल रकम करीब 1,071.5 करोड़ रुपये है। जांच में उसे कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोह का मास्टरमाइंड बताया गया है। पुलिस के अनुसार, वह साइबर ठगी से हासिल रकम को देशभर के बैंक खातों में भेजता था और बाद में उसे क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर चीन भेजता था।
1758 बैंक खातों में भेजी जाती थी रकम
पुलिस के अनुसार, रफीकुल आलम ने ठगी की रकम को देशभर के 1,758 बैंक खातों में ट्रांसफर करने में भूमिका निभाई। रकम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर अलग-अलग खातों में भेजा जाता था, ताकि वित्तीय निगरानी एजेंसियों की नजर से बचा जा सके। जांच में उसके मोबाइल फोन से 23 क्रिप्टो वॉलेट मिले हैं। इन वॉलेट में करीब 16 करोड़ रुपये का लेनदेन सामने आया है। पुलिस के मुताबिक, इससे चीन स्थित साइबर अपराधियों से उसके संपर्क की पुष्टि होती है। वह व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए चीन में मौजूद अपराधियों से संपर्क में था। इन बातचीत में कथित तौर पर बैंक खातों की जानकारी, यूजर आईडी, पासवर्ड, क्रिप्टो वॉलेट और ठगी का तरीका साझा किया जाता था।
'डिजिटल अरेस्ट' के नाम पर भी करोड़ों की ठगी
रफीकुल की गिरफ्तारी की जांच के दौरान गुजरात सीआईडी के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने डिजिटल अरेस्ट के कई मामलों को भी रोका। एक बुजुर्ग को महाराष्ट्र पुलिस और सुप्रीम कोर्ट के फर्जी पत्र दिखाकर धमकाया गया था। ठगों ने उस पर बच्चों के अश्लील वीडियो के मामले में फंसाने की धमकी देकर 20 लाख रुपये मांगे थे। इसी तरह सूरत के एक बुजुर्ग को ईडी की कार्रवाई का डर दिखाकर 60 लाख रुपये मांगे गए। ठगों के दबाव में वह रकम जुटाने के लिए पहले फ्लैट बेचने की कोशिश करने लगा। जब फ्लैट नहीं बिका तो उसने 20 लाख रुपये में अपनी दुकान बेच दी। सीआईडी के अनुसार, ऐसे मामलों में समय रहते हस्तक्षेप कर 10 लोगों को डिजिटल ठगी का शिकार होने से बचाया गया। इनमें गुजरात के पांच, ओडिशा के तीन और छत्तीसगढ़ तथा महाराष्ट्र का एक-एक व्यक्ति शामिल था।
कंपनियों और आम लोगों के लिए पुलिस की चेतावनी
साइबर पुलिस ने कंपनियों और आम लोगों को ऐसे मामलों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। किसी अनजान व्यक्ति या नंबर से व्हाट्सएप पर आई ZIP, .exe, .dll या .apk फाइल को खोलने से बचें। किसी सीईओ, कंपनी मालिक, आरबीआई अधिकारी, पुलिस, ईडी या किसी अन्य सरकारी अधिकारी के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने का निर्देश मिले तो पहले स्वतंत्र माध्यम से उसकी पुष्टि करें। पुलिस के अनुसार, किसी भी संदिग्ध साइबर ठगी की स्थिति में तुरंत 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर शिकायत करना जरूरी है। ठगी के बाद जितनी जल्दी शिकायत की जाएगी, पैसे को रोकने या वापस हासिल करने की संभावना उतनी ही बढ़ सकती है।
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व्हाट्सएप पर भेजी जिप फाइल, फिर कंपनी के मालिक बनकर ठगी
अहमदाबाद के एक कारोबारी से इसी तरीके से 1.5 करोड़ रुपये की ठगी की गई। पुलिस के अनुसार, 23 जून को कारोबारी के मोबाइल नंबर पर व्हाट्सऐप के जरिए एक जिप फाइल भेजी गई। इसमें कंपनी के बैंक खाते में 'असामान्य लेनदेन' होने की बात कही गई और आरबीआई के रिस्क कंट्रोल विभाग की ओर से कार्रवाई की चेतावनी दी गई। ठगों ने पहले खुद को आरबीआई अधिकारी बताया। इसके बाद उन्होंने कंपनी के मालिक की पहचान का इस्तेमाल किया और कंपनी के अकाउंटेंट को निर्देश दिया कि वह बताए गए बैंक खाते में 1.5 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर दे। ठगी का पता चलने के बाद पीड़ित ने साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत की। पुलिस के अनुसार, कार्रवाई के बाद ठगी गई रकम में से 1.13 करोड़ रुपये बरामद कर लिए गए।
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पुलिस के मुताबिक, ठग कंपनी के अधिकारियों को व्हाट्सऐप पर जिप फाइल भेजते हैं। इसमें कथित तौर पर .exe और .dll फाइलें होती हैं। अगर कोई कर्मचारी इन्हें खोल देता है तो उसके सिस्टम या व्हाट्सऐप सेशन पर साइबर अपराधियों का नियंत्रण हो सकता है। इसके बाद ठग कंपनी के सीईओ, मालिक या निदेशक बनकर कर्मचारियों से संपर्क करते हैं। वे तत्काल भुगतान करने, किसी खाते में पैसे भेजने या गोपनीय जानकारी साझा करने का निर्देश देते हैं। कर्मचारी इसे कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी का आदेश समझकर पैसे ट्रांसफर कर सकता है। पुलिस के अनुसार, इस मामले में इस्तेमाल मालवेयर के चीन से जुड़े साइबर अपराधियों द्वारा विकसित किए जाने की आशंका है। इसे भारतीय लोगों को निशाना बनाने के लिए इस्लामाबाद स्थित कॉल सेंटर के जरिए इस्तेमाल किए जाने की बात भी जांच में सामने आई है। बैंक खातों तक पहुंच के लिए चीन आधारित वीपीएन सेवा के इस्तेमाल की भी जानकारी मिली है। शुरुआती जांच में साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर के तार चीन, भारत, पाकिस्तान और हांगकांग से जुड़े मिले हैं।
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अहमदाबाद साइबर क्राइम ब्रांच और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के तकनीकी विश्लेषण के आधार पर पुलिस ने कार्रवाई की। पुलिस का कहना है कि इस अभियान के दौरान 10,000 से अधिक संक्रमित या संभावित रूप से प्रभावित डिवाइस को सुरक्षित किया गया। इससे भविष्य में करोड़ों रुपये की संभावित ठगी को रोका जा सका। साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे मालवेयर की पहचान कर उसे सहयोग पोर्टल के जरिए ब्लॉक करने की कार्रवाई भी की जा रही है।
फर्जी सिम और OTP बेचने वाले दो आरोपी गिरफ्तार
जांच के दौरान पश्चिम बंगाल के रहने वाले इमरान अली पियादा और इंजाम्मुल मोल्ला को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के अनुसार, पियादा टेलीकॉम कंपनियों का POS एजेंट था और ग्राहकों के बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल कर सिम कार्ड हासिल करता था। इसके बाद वह इन नंबरों को डमी सिम पर एक्टिवेट कर साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराता था। वह व्हाट्सएप अकाउंट एक्टिवेट करने के लिए जरूरी ओटीपी भी उपलब्ध कराता था। पुलिस के मुताबिक, पियादा ने करीब पांच साल में ई-कॉमर्स और ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े करीब 21,000 ओटीपी बेचे और इससे 21 लाख रुपये से ज्यादा कमाए। इसके अलावा उसने व्हाट्सएप अकाउंट एक्टिवेशन से जुड़े करीब 900 ओटीपी बेचकर 2.25 लाख रुपये से ज्यादा कमाए। दूसरा आरोपी इंजाम्मुल मोल्ला कथित तौर पर साइबर ठगों के साथ समन्वय करता था और मोबाइल नंबर, डमी सिम तथा व्हाट्सएप आधारित संचार व्यवस्था उपलब्ध कराने में मदद करता था। पुलिस ने दोनों के पास से सात मोबाइल फोन और एक राउटर बरामद किया है। जब्त सामान की कीमत करीब 19,500 रुपये बताई गई है।
'साइबरक्राइम इज ए सर्विस' का बढ़ता खतरा
पुलिस की जांच में साइबर अपराध के एक नए मॉडल का भी पता चला है, जिसे 'साइबरक्राइम इज ए सर्विस' कहा जा रहा है। इसमें साइबर अपराध करने वाले गिरोह खुद हर काम नहीं करते, बल्कि अलग-अलग लोगों से सिम कार्ड, ओटीपी, बैंक खाते, व्हाट्सएप अकाउंट, मालवेयर और दूसरी डिजिटल सुविधाएं खरीदते हैं। पुलिस के मुताबिक, व्हाट्सएप जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ऐसी डिजिटल सुविधाओं की खरीद-बिक्री के लिए समूह और नेटवर्क सक्रिय हैं। इससे किसी व्यक्ति या गिरोह के लिए साइबर ठगी करना आसान हो जाता है।
दूसरी कार्रवाई में 1,071 करोड़ की साइबर ठगी का खुलासा
इसी बीच गुजरात सीआईडी की साइबर सेल ने असम के बरपेटा से 25 वर्षीय रफीकुल आलम को गिरफ्तार किया है। पुलिस का दावा है कि वह देशभर में हुई 1,090 साइबर ठगी की घटनाओं में शामिल था और इन मामलों में कुल रकम करीब 1,071.5 करोड़ रुपये है। जांच में उसे कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोह का मास्टरमाइंड बताया गया है। पुलिस के अनुसार, वह साइबर ठगी से हासिल रकम को देशभर के बैंक खातों में भेजता था और बाद में उसे क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर चीन भेजता था।
1758 बैंक खातों में भेजी जाती थी रकम
पुलिस के अनुसार, रफीकुल आलम ने ठगी की रकम को देशभर के 1,758 बैंक खातों में ट्रांसफर करने में भूमिका निभाई। रकम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर अलग-अलग खातों में भेजा जाता था, ताकि वित्तीय निगरानी एजेंसियों की नजर से बचा जा सके। जांच में उसके मोबाइल फोन से 23 क्रिप्टो वॉलेट मिले हैं। इन वॉलेट में करीब 16 करोड़ रुपये का लेनदेन सामने आया है। पुलिस के मुताबिक, इससे चीन स्थित साइबर अपराधियों से उसके संपर्क की पुष्टि होती है। वह व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए चीन में मौजूद अपराधियों से संपर्क में था। इन बातचीत में कथित तौर पर बैंक खातों की जानकारी, यूजर आईडी, पासवर्ड, क्रिप्टो वॉलेट और ठगी का तरीका साझा किया जाता था।
'डिजिटल अरेस्ट' के नाम पर भी करोड़ों की ठगी
रफीकुल की गिरफ्तारी की जांच के दौरान गुजरात सीआईडी के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने डिजिटल अरेस्ट के कई मामलों को भी रोका। एक बुजुर्ग को महाराष्ट्र पुलिस और सुप्रीम कोर्ट के फर्जी पत्र दिखाकर धमकाया गया था। ठगों ने उस पर बच्चों के अश्लील वीडियो के मामले में फंसाने की धमकी देकर 20 लाख रुपये मांगे थे। इसी तरह सूरत के एक बुजुर्ग को ईडी की कार्रवाई का डर दिखाकर 60 लाख रुपये मांगे गए। ठगों के दबाव में वह रकम जुटाने के लिए पहले फ्लैट बेचने की कोशिश करने लगा। जब फ्लैट नहीं बिका तो उसने 20 लाख रुपये में अपनी दुकान बेच दी। सीआईडी के अनुसार, ऐसे मामलों में समय रहते हस्तक्षेप कर 10 लोगों को डिजिटल ठगी का शिकार होने से बचाया गया। इनमें गुजरात के पांच, ओडिशा के तीन और छत्तीसगढ़ तथा महाराष्ट्र का एक-एक व्यक्ति शामिल था।
कंपनियों और आम लोगों के लिए पुलिस की चेतावनी
साइबर पुलिस ने कंपनियों और आम लोगों को ऐसे मामलों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। किसी अनजान व्यक्ति या नंबर से व्हाट्सएप पर आई ZIP, .exe, .dll या .apk फाइल को खोलने से बचें। किसी सीईओ, कंपनी मालिक, आरबीआई अधिकारी, पुलिस, ईडी या किसी अन्य सरकारी अधिकारी के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने का निर्देश मिले तो पहले स्वतंत्र माध्यम से उसकी पुष्टि करें। पुलिस के अनुसार, किसी भी संदिग्ध साइबर ठगी की स्थिति में तुरंत 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर शिकायत करना जरूरी है। ठगी के बाद जितनी जल्दी शिकायत की जाएगी, पैसे को रोकने या वापस हासिल करने की संभावना उतनी ही बढ़ सकती है।