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Dirac Medal: भारतीय प्रोफेसर दीपक धर को मिला प्रतिष्ठित डिराक मेडल, सांख्यिकीय भौतिकी में योगदान के लिए सम्मान

Sun, 09 Aug 2026 09:45 PM IST
Devesh Tripathi एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Devesh Tripathi Updated Sun, 09 Aug 2026 09:45 PM IST
सार

भारतीय वैज्ञानिक दीपक धर को सैद्धांतिक भौतिकी में उनके लंबे योगदान के लिए 2026 के डिराक मेडल से सम्मानित किया गया है। सांख्यिकीय यांत्रिकी के क्षेत्र में उनके शोध ने जटिल प्रणालियों और सामूहिक व्यवहार को समझने में अहम भूमिका निभाई। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से शुरू हुई उनकी वैज्ञानिक यात्रा इलाहाबाद विश्वविद्यालय, आईआईटी कानपुर और कैलटेक तक पहुंची, जहां उन्होंने रिचर्ड फाइनमैन के साथ काम किया था।

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भारतीय प्रोफेसर दीपक धर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

भारतीय सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी और आईआईएनएसए के प्रतिष्ठित प्रोफेसर दीपक धर को 2026 के डिराक मेडल के लिए चुना गया है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स (आईसीटीपी) की ओर से दिया जाने वाला यह पुरस्कार सैद्धांतिक भौतिकी की दुनिया के प्रतिष्ठित सम्मानों में शामिल है। इस साल धर के साथ तीन अन्य वैज्ञानिकों को भी सांख्यिकीय यांत्रिकी में उल्लेखनीय योगदान के लिए इस सम्मान से नवाजा गया है।
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सांख्यिकीय यांत्रिकी में अहम काम
डिराक मेडल उन वैज्ञानिकों के योगदान को मान्यता देता है, जिन्होंने भौतिकी के जटिल सवालों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सांख्यिकीय यांत्रिकी के जरिए बड़ी संख्या में मौजूद कणों वाले सिस्टम के सामूहिक व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। इसका इस्तेमाल केवल भौतिकी तक सीमित नहीं है। जटिल नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वित्तीय बाजारों जैसे क्षेत्रों को समझने में भी इसके सिद्धांत उपयोगी हैं।
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दीपक धर लंबे समय से सैद्धांतिक भौतिकी और जटिल भौतिक प्रणालियों पर शोध करते रहे हैं। वह बंगलूरू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल साइंसेज से भी जुड़े रहे हैं। कई दशकों के उनके शोध ने सांख्यिकीय भौतिकी के क्षेत्र को समृद्ध किया है।
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प्रतापगढ़ से शुरू हुआ विज्ञान का सफर
दीपक धर का जन्म 1951 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में हुआ था। उनका बचपन ऐसे माहौल में बीता, जहां विज्ञान के प्रति उनकी रुचि धीरे-धीरे मजबूत हुई। उनकी मां चाहती थीं कि वह भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाएं, लेकिन उनके पिता ने उनकी वैज्ञानिक जिज्ञासा को प्रोत्साहित किया। धर ने एक पुराने साक्षात्कार में बताया था कि उनके पिता घर पर विज्ञान से जुड़ी पत्रिकाएं लाया करते थे। इनमें 'अंडरस्टैंडिंग साइंस' नाम की पत्रिका ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। विज्ञान के प्रति यही शुरुआती आकर्षण आगे चलकर उनके करियर की दिशा बना।

उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की और इसके बाद आईआईटी कानपुर से एमएससी की। उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका के कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी पहुंचे। वहां उन्हें रिचर्ड फाइनमैन फेलोशिप मिली। कैलटेक में उन्होंने प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी रिचर्ड फाइनमैन के साथ काम किया और उनके टीचिंग असिस्टेंट भी रहे। वर्ष 1978 में उन्होंने पीएचडी पूरी की।

विदेश में अवसर के बावजूद भारत लौटे
पीएचडी के बाद धर ने अमेरिका में आगे करियर बनाने के बजाय भारत वापस आने का फैसला किया। वह मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च से जुड़े। इसके बाद उन्होंने आईआईएसईआर पुणे में भी करीब आठ वर्षों तक प्रोफेसर के रूप में काम किया।

टीआईएफआर में उन्होंने औपचारिक मेंटर के बिना काम शुरू किया, लेकिन वहां मौजूद सैद्धांतिक भौतिकविदों के मजबूत समूह से उन्हें शोध का बेहतर माहौल मिला। आगे के वर्षों में उन्होंने सांख्यिकीय भौतिकी और जटिल प्रणालियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर शोध किया।

'धर बर्निंग एल्गोरिदम' ने दिलाई पहचान
दीपक धर के प्रमुख वैज्ञानिक योगदानों में 'धर बर्निंग एल्गोरिदम' का नाम लिया जाता है। सैंडपाइल मॉडल पर किए गए उनके काम से जुड़ा यह एल्गोरिदम सेल्फ-ऑर्गनाइज्ड क्रिटिकलिटी और जटिल प्रणालियों के अध्ययन में महत्वपूर्ण माना जाता है।

सांख्यिकीय भौतिकी के क्षेत्र में उनके लंबे शोध और योगदान ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय में अलग पहचान दिलाई। उनके काम का प्रभाव केवल अकादमिक शोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने बड़ी संख्या में छात्रों और युवा वैज्ञानिकों को भी मार्गदर्शन दिया।

बोल्ट्जमैन मेडल और पद्म भूषण से भी सम्मानित
डिराक मेडल धर के लंबे वैज्ञानिक करियर में मिलने वाला पहला बड़ा सम्मान नहीं है। वर्ष 2022 में वह बोल्ट्जमैन मेडल पाने वाले पहले भारतीय बने थे। यह सम्मान सांख्यिकीय भौतिकी के क्षेत्र में बेहद प्रतिष्ठित माना जाता है। इसके बाद 2023 में भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया। इन सम्मानों के अलावा भी उनके शोध और वैज्ञानिक योगदान को विभिन्न स्तरों पर पहचान मिलती रही है।

1985 में शुरू हुआ था डिराक मेडल
आईसीटीपी का डिराक मेडल महान भौतिक विज्ञानी पॉल डिराक की स्मृति में दिया जाता है। इसकी शुरुआत 1985 में हुई थी। यह सम्मान सैद्धांतिक भौतिकी और गणित के क्षेत्र में असाधारण योगदान देने वाले वैज्ञानिकों को प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार से अब तक कई जाने-माने वैज्ञानिक जुड़े रहे हैं, जिनमें स्टीफन हॉकिंग भी शामिल हैं।


डिराक मेडल की एक खास शर्त यह है कि नोबेल, फील्ड्स या वुल्फ पुरस्कार जीत चुके वैज्ञानिकों को यह सम्मान नहीं दिया जाता। हालांकि, इसके कई विजेताओं को बाद में इन प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
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