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कांग्रेस में कलह: फिर सक्रिय हुआ कांग्रेस के भीतर का विपक्ष, क्या है G-23 और कब-कब आया सुर्खियों में? जानें सबकुछ

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नोएडा Published by: जयदेव सिंह Updated Sat, 12 Mar 2022 04:43 PM IST
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सार
G-23 समूह में कांग्रेस के कई वरिष्ठ असंतुष्ट नेता शामिल हैं। 2020 में जब पहली बार इन नेताओं का समूह चर्चा में आया तब इसमें 23 नेता शामिल थे। इसलिए इन्हें G-23 कहा गया।
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Discord in Congress G23 Leaders Meet Which Leaders are Involved Know All Details
पांच राज्यों में हार के बाद फिर सक्रिय हुए कांग्रेस के असंतुष्ट नेता। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब में सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस के असंतुष्ट नेता फिर चर्चा में हैं। शुक्रवार को गुलाम नबी आजाद के घर हुई एक बैठक में मनीष तिवारी और कपिल सिब्बल शामिल हुए। ये तीनों नेता कांग्रेस के असंतुष्ट समूह G-23 का हिस्सा हैं। कहा जा रहा है कि G-23 समूह एक बार फिर कांग्रेस कार्यसमिति की आपात बैठक बुलाने और पार्टी अध्यक्ष का जल्द से जल्द चुनाव कराने की मांग कर सकता है। 



ये G-23 समूह क्या है? इस समूह में कौन से नेता शामिल हैं? पहली बार ये कब चर्चा में आया था?  कब-कब इस समूह ने कांग्रेस में रहकर कांग्रेस की नीतियों का विरोध किया है? आइये जानते हैं…


G-23 समूह क्या है?
G-23 समूह में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता शामिल हैं। 2020 में जब पहली बार इन नेताओं का समूह चर्चा में आया तब इसमें 23 नेता शामिल थे। इसलिए इन्हें G-23 कहा गया। समूह में शामिल रहे जितिन प्रसाद बाद में भाजपा में शामिल हो गए। वहीं, योगानंद शास्त्री ने भी शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दामन थाम लिया। कुछ नेताओं ने खुद को इस समूह से अलग कर लिया।  

कौन से नेता इस समूह में शामिल हैं?
गुलाम नबी आजाद,कपिल सिब्बल, शशि थरूर, मनीष तिवारी, आनंद शर्मा, पीजे कुरियन, रेणुका चौधरी, मिलिंद देवड़ा, मुकुल वासनिक, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, राजिंदर कौर भट्टल, एम वीरप्पा मोइली, पृथ्वीराज चव्हाण, अजय सिंह, राज बब्बर, अरविंदर सिंह लवली, कौल सिंह ठाकुर, अखिलेश प्रसाद सिंह, कुलदीप शर्मा, संदीप दीक्षित, विवेक तन्खा। जितिन प्रसाद और योगानंद शास्त्री पार्टी छोड़ चुके हैं।

पहली बार ये कब चर्चा में आया था? 
अगस्त 2020 में ये समूह पहली बार चर्चा में आया। उस वक्त इस समूह ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने और संगठन में ऊपर से लेकर नीचे तक बदलाव की मांग की थी। इस पत्र में 23 नेताओं के हस्ताक्षर थे। इसी वजह से इस समूह को G-23 नाम मिला। 

क्या हर चुनाव के बाद ही ये मुखर होता है? 
बीते करीब 19 महीने में कांग्रेस के अंदर का ये प्रेशर ग्रुप अक्सर चुनाव के वक्त ही चर्चा में आया है। अगस्त 2020 में जब इस समूह ने पहली बार सोनिया गांधी को पत्र लिखा। उस वक्त राजस्थान के उप मुख्यमंत्री बगावती तेवर अपनाए हुए थे। वहीं, एक महीने बाद ही बिहार में चुनाव तारीखों का ऐलान होने वाला था। 

मार्च 2021 में इस समूह ने फिर सुर्खियां बटोरीं। जब एक वेबिनार में राहुल गांधी ने इन नेताओं के विरोध का जिक्र किया। वहीं, कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने इन नेताओं को एक खुला खत लिखकर इन पर कई सवाल उठाए। उस वक्त भी पांच राज्यों में चुनाव का ऐलान होना था। इनमें केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, बंगाल और असम में चुनाव होने थे। 

एक बार फिर ये नेता चर्चा में हालांकि, इस बार चुनाव नतीजों के बाद इस समूह ने सक्रियता दिखाई है। इसके अलावा भी गाहे बगाहे ये नेता अपने बयानों और ट्वीट से पार्टी और गांधी परिवार से मुश्किल सवाल पूछते रहते हैं। पंजाब में चुनाव से पहले जारी कलह पर मनीष तिवारी अक्सर बोलते रहते थे। पंजाब से आने वाले मनीष तिवारी को पूरे चुनाव के दौरान कांग्रेस नेतृत्व ने हाशिए पर रखा था। 

थरूर ने भी किया ट्वीट
G-23 में शामिल कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी पार्टी की हार पर ट्वीट किया। उन्होंने कहा कि पार्टी हारी है, पराजित नहीं हुई है। उन्होंने चुनावों में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए भाजपा को बधाई भी दी। उन्होंने ट्वीट किया कि कांग्रेस अभी भी योग्य विरोधी साबित होगी। जैसा मेरे सहयोगी आलिम जावेरी ने कहा, हम हारे हैं लेकिन पराजित नहीं हुए हैं। हमारा विश्वास, मूल्य और हमारी विरासत की भावना बहुत गहरी है और आगे भी बनी रहेंगी। कांग्रेस नेता अजय कुमार ने कहा कि दुखी हैं लेकिन टूटे नहीं हैं। हिले हैं लेकिन बिखरे नहीं। दिल छोटा न करें, धर्मी अकेले और कठिन लड़ाई लड़ते हैं।



कांग्रेस के लिए नतीजे कैसे रहे? 
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों में कांग्रेस का बुरा हाल रहा। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी की मेहनत के बाद कांग्रेस के खाते में महज दो सीट आई। उसके 97 फीसदी उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई। पंजाब में भी कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी। कांग्रेस को यहां 18 सीट मिलीं। पार्टी को उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर से भी काफी उम्मीदें थीं, लेकिन वहां भी कुछ हाथ नहीं लगा।

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