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Hindi News ›   India News ›   Explainer: How Have People Preserved Bodies After Death? From Mummies to Cryonics, What Is the History?

एक्सप्लेनर: मौत के बाद शरीर को सुरक्षित रखने के कैसे-कैसे तरीके, ममी से क्रायोनिक्स तक का क्या है इतिहास?

Wed, 30 Sep 2026 04:36 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Wed, 30 Sep 2026 04:36 PM IST
सार

मौत के बाद क्या शरीर को वर्षों तक बचाकर रखा जा सकता है? मुंबई का एक मामला इस सवाल को फिर चर्चा में ले आया, लेकिन इंसान सदियों से इसका जवाब खोजता रहा है। मिस्र की ममी से लेकर आज के क्रायोनिक्स तक, शरीर को मृत्यु के बाद सुरक्षित रखने के तरीके लगातार बदलते रहे हैं। आइए विस्तार से जानते हैं।

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Explainer: How Have People Preserved Bodies After Death? From Mummies to Cryonics, What Is the History?
मौत के बाद शरीर बचाने के तरीके - फोटो : egymonuments

विस्तार

मुंबई के मालाड में एक 78 वर्षीय बुजुर्ग का शव करीब चार साल तक फ्रीजर में रखा रहा। परिवार उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखना चाहता था। हालांकि शरीर को सुरक्षित रखने की यह कोशिश नई नहीं है। दुनिया में अलग-अलग सभ्यताओं और समुदायों ने हजारों साल पहले भी मृत शरीर को बचाए रखने के तरीके अपनाए थे। आइए जानते हैं। 

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मुंबई के मामले में क्या हुआ?

मालाड में 78 वर्षीय व्यक्ति की जून 2022 में हार्ट अटैक से मौत हुई थी। वह कैंसर से पीड़ित थे। उनकी मौत को डॉक्टर ने प्राकृतिक बताया था और परिवार के पास डेथ सर्टिफिकेट भी था। इसके बाद उनका शव एक फ्रीजर में रखा गया और करीब चार साल तक वहीं रहा।

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मामला तब सामने आया जब उस डे-केयर सेंटर को खाली कराने और पुनर्विकास की प्रक्रिया शुरू हुई जहां ये फ्रीजर रखा था। पुलिस ने वहां जांच की तो फ्रीजर में शव मिला। शुरुआती जांच में पुलिस को मौत के पीछे किसी आपराधिक साजिश या गड़बड़ी के संकेत नहीं मिले।
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परिवार ने पुलिस को बताया कि वह शव को लंबे समय तक सुरक्षित रखना चाहता था। इसके लिए अमेरिका की एक संस्था से संपर्क भी किया गया था। योजना थी कि जरूरी पैसे और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव को अमेरिका भेजा जाए।

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मिस्र की ममी - फोटो : egymonuments

कहां-कहां शव संरक्षित रखने का पुराना इतिहास?

मिस्रवासियों की मान्यता थी कि मृत्यु के बाद भी जीवन का एक दूसरा चरण होता है। इसी विश्वास के कारण मृत शरीर को सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण माना गया। मिस्र में कृत्रिम ममीकरण की तकनीक समय के साथ विकसित हुई और इसमें शरीर को सुखाने, तेल व रेजिन लगाने और कपड़े में लपेटने जैसी प्रक्रियाएं शामिल हुईं। ब्रिटिश म्यूजियम के अनुसार, लगभग 2700 ईसा पूर्व तक मिस्रवासी शरीर के अंग निकालने और प्राकृतिक नमक यानी नाट्रॉन से शरीर सुखाने जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे थे। 

मिस्र में किसकी ममी बनाई जाती थी?

शुरुआत में ममीकरण मुख्य रूप से शासकों और समाज के ऊंचे वर्ग से जुड़ा था, लेकिन समय के साथ यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए भी उपलब्ध हो गई जो इसका खर्च उठा सकते थे। यानी ममीकरण धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ सामाजिक हैसियत और आर्थिक क्षमता से भी जुड़ा था।

रेगिस्तान ने भी शरीर को बचाने में मदद की
मिस्र का बेहद शुष्क वातावरण शरीर को प्राकृतिक रूप से सुरक्षित रखने में मदद कर सकता था। सूखी रेत शरीर से नमी खींच लेती थी, जिससे सड़ने की प्रक्रिया धीमी हो जाती थी। लेकिन जब शवों को कब्रों और बंद दफन कक्षों में रखा जाने लगा, तब वही प्राकृतिक सुखाने वाली परिस्थितियां हमेशा उपलब्ध नहीं रहती थीं। ऐसे में शरीर को कृत्रिम तरीके से सुखाने और सुरक्षित रखने की प्रक्रिया विकसित हुई।

ममी बनाने में क्या किया जाता था?
शरीर से ज्यादातर आंतरिक अंग निकाले जाते थे और उन्हें अलग से सुरक्षित रखा जाता था। इन्हें कई मामलों में कैनोपिक जार में रखा जाता था। शरीर को प्राकृतिक नमक नाट्रॉन से सुखाया जाता था। इसके बाद उस पर तेल और रेजिन लगाए जाते थे और उसे लिनन की पट्टियों में कसकर लपेट दिया जाता था।

पूरी प्रक्रिया कई चरणों में होती थी और पारंपरिक ममीकरण में लगभग 70 दिन तक लग सकते थे। ममी पर लिनन की कई परतें लपेटी जाती थीं और उनके बीच धार्मिक मान्यताओं से जुड़े ताबीज भी रखे जाते थे।

चिनचोरो की ममी मिस्र से भी पुरानी

मृत शरीर को कृत्रिम तरीके से सुरक्षित रखने की कहानी सिर्फ मिस्र तक सीमित नहीं थी। आज के उत्तरी चिली में अटाकामा रेगिस्तान के तटीय इलाके में चिनचोरो संस्कृति के लोग रहते थे। ये समुद्री शिकारी-संग्रहकर्ता समुदाय था और करीब 7400 से 2840 साल पहले, यानी लगभग 5450 से 890 ईसा पूर्व तक इस क्षेत्र में रहा। चिनचोरो संस्कृति से जुड़े शवों को दुनिया के सबसे पुराने ज्ञात कृत्रिम रूप से ममी बनाए गए मानव शवों में माना जाता है।

शरीर को कैसे ममी बनाया जाता था?
चिनचोरो लोगों ने ममीकरण की तकनीक को लंबे समय में कई बार बदला। उनकी कुछ प्रक्रियाओं में मृत शरीर को अलग-अलग हिस्सों में खोलना और फिर उन्हें दोबारा जोड़कर ममी तैयार करना शामिल था। यानी शरीर को सिर्फ बाहर से लपेटने के बजाय उसके साथ व्यवस्थित तरीके से काम किया जाता था।

इनकी ममियों को संरक्षित रखने में अटाकामा रेगिस्तान का बेहद शुष्क वातावरण भी महत्वपूर्ण था। यहां कृत्रिम रूप से बनाई गई ममियों के साथ कुछ शव ऐसे भी मिले हैं जो प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण सुरक्षित रहे।

चिनचोरो संस्कृति से जुड़े फाल्देओ नॉर्ते डेल मोरो दे एरिका, कोलोन 10 और देसेम्बोकादुरा दे कामारोनेस जैसे पुरातात्विक स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं।

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शव संरक्षण के तरीके - फोटो : अमर उजाला

धुएं में सुखाकर भी सुरक्षित रखते थे शव

दक्षिणी चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया में भी हजारों साल पहले शवों को सुरक्षित रखने का एक अलग तरीका अपनाया जाता था। 'अर्लिएस्ट एविडेंस ऑफ स्मोक-ड्राइड ममीफिकेशन: मोर दैन 10,000 इयर्स एगो इन सदर्न चाइना एंड साउथईस्ट एशिया' के अध्ययन में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, पेकिंग यूनिवर्सिटी, जापान और अन्य संस्थानों के शोधकर्ता शामिल थे।

शोधकर्ताओं ने दक्षिणी चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के 11 पुरातात्विक स्थलों से मिले 54 प्राचीन शवों के अवशेषों का अध्ययन किया। हड्डियों की स्थिति, उन पर मिले निशानों और उनमें हुए बदलावों की जांच के आधार पर शोधकर्ताओं ने शवों को धुएं में सुखाकर सुरक्षित रखने के संकेत खोजे।

कैसे रखा जाता था शव?
इस प्रक्रिया में शव को सीधे आग में नहीं जलाया जाता था। शरीर को अक्सर सिकुड़ी हुई अवस्था में रखकर बांधा जाता था। इसके बाद शव को आग से निकलने वाली गर्मी और धुएं के संपर्क में लंबे समय तक रखा जाता था।

धुएं और गर्मी के लगातार संपर्क में रहने से शरीर की नमी कम होती थी और वह धीरे-धीरे सूखने लगता था। शोधकर्ताओं को कई शवों की हड्डियों पर काले निशान और धुएं की कालिख के संकेत मिले। इनसे पता चला कि शव लंबे समय तक आग और धुएं के संपर्क में रहे थे। यानी यहां मकसद शरीर को आग में जलाना नहीं था, बल्कि धुएं और गर्मी की मदद से उसे सुखाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखना था। रिसर्च में इस तरह के ममीकरण के प्रमाण करीब 12 हजार साल पुराने मिले हैं।

बोग बॉडीज: यहां इंसान ने नहीं, दलदल ने बचाए शव

मिस्र और चिनचोरो में जहां लोग जानबूझकर शव को संरक्षित करते थे, उत्तरी यूरोप में कहानी बिल्कुल अलग थी। यहां बोग बॉडीज मिलीं, ऐसे मानव शव जो दलदली इलाकों की प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण लंबे समय तक सुरक्षित रहे।

आयरन एज यानी लौह युग के दौरान उत्तरी यूरोप के दलदलों में मिले इन शवों की त्वचा और शरीर के मुलायम ऊतक कई मामलों में काफी अच्छी स्थिति में मिले। इसकी बड़ी वजह दलदल का ठंडा, अम्लीय और ऑक्सीजन की कमी वाला वातावरण था। ऐसे वातावरण में शरीर को सड़ाने वाले सूक्ष्मजीवों की गतिविधि कम हो जाती है। स्पैगनम काई भी संरक्षण में भूमिका निभा सकती है। कुछ शवों पर चोट और हिंसा के निशान मिले हैं और कुछ मामलों में मानव बलि की संभावना जताई गई है। 

दलदल ने शरीर को कैसे बचाया?
दलदल का वातावरण शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर अलग असर डालता था। त्वचा, बाल और दूसरे मुलायम ऊतक लंबे समय तक सुरक्षित रह सकते थे, जबकि हड्डियों के खनिज अम्लीय वातावरण में घुल सकते थे। इसी वजह से कुछ बोग बॉडीज में शरीर की त्वचा बहुत अच्छी तरह बची मिली, लेकिन हड्डियां कमजोर या कम संरक्षित थीं।

कुछ शवों के पेट और आंतों की सामग्री भी बची मिली। इससे वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर सकते हैं कि व्यक्ति ने मृत्यु से पहले क्या खाया था। इसीलिए बोग बॉडीज को कई बार प्राकृतिक या आकस्मिक ममी कहा जाता है।

पेरू में भी शवों को सुरक्षित रखने का अलग तरीका

दक्षिण अमेरिका के पेरू में चाचापोयास संस्कृति के लोग भी मृत शरीर को खास तरीके से संरक्षित करते थे। यहां शवों को सिर्फ जमीन में दफन करने के बजाय ममी बंडल यानी फ्यूनरल बंडल के रूप में तैयार किया जाता था।

शरीर को कपड़ों में लपेटकर बनाया जाता था 'ममी बंडल'
मृत व्यक्ति के शरीर को अक्सर बैठी या सिकुड़ी हुई अवस्था में रखा जाता था। इसके बाद उसे कपड़े या रेशों की परतों में लपेटा जाता और रस्सियों या रेशों से कसकर बांधा जाता था। इस तरह पूरे शरीर को एक बंडल का रूप दिया जाता था।

इन ममी बंडलों को ऐसे मकबरों और अंतिम संस्कार स्थलों में रखा जाता था, जहां उन्हें नमी से बचाया जा सके। लागुना दे लॉस कोंदोरेस जैसे स्थलों पर ममी बंडल चट्टानों के बीच बने मकबरों में मिले हैं। यहां का वातावरण और शवों को रखने का तरीका इनके संरक्षण में महत्वपूर्ण रहा। 

भारत के ग्यू में मिला प्राकृतिक रूप से संरक्षित भिक्षु

भारत में भी शरीर के प्राकृतिक संरक्षण का एक दिलचस्प उदाहरण मिलता है। हिमाचल प्रदेश के ग्यू गांव में एक बौद्ध भिक्षु का शरीर प्राकृतिक रूप से संरक्षित अवस्था में मिला।

बताया जाता है कि यह भिक्षु सांघा तेनजिन थे। उन्होंने भारत-तिब्बत सीमा के पास करीब 3200 से 3657 मीटर की ऊंचाई पर ध्यान किया था। माना जाता है कि उनकी मृत्यु करीब 1500 के दशक में हुई थी। बाद में भूकंप में उनका मकबरा ढह गया और वर्ष 2004 में सड़क निर्माण के दौरान आईटीबीपी को उनका शरीर मिला।

इसके बाद शरीर को ग्यू गांव में कांच के चैंबर में रखा गया। शोधकर्ताओं ने शरीर में बचे नाइट्रोजन के स्तर, दांतों, रेडियोकार्बन डेटिंग और शरीर की स्थिति का अध्ययन किया। शरीर की स्थिति और उपलब्ध शोध के आधार पर यह संभावना भी रखी गई कि भिक्षु ने जापानी सोकुशिनबुत्सु जैसी परंपरा का पालन किया हो।

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आधुनिक तरीका - फोटो : अमर उजाला

आधुनिक युग में मृत शरीर को कैसे संरक्षित किया जाता है?

प्राचीन मिस्र में शरीर को सुखाया गया, चिनचोरो लोगों ने कृत्रिम ममीकरण किया और यूरोप के दलदलों में प्राकृतिक परिस्थितियों ने शवों को बचाए रखा। आधुनिक समय में शरीर को बेहद कम तापमान पर सुरक्षित रखने की कोशिश की जाती है। इसे क्रायोनिक्स कहा जाता है।

क्रायोनिक्स क्या है?
क्रायोनिक्स में किसी व्यक्ति की कानूनी रूप से मृत्यु के बाद उसके शरीर या दिमाग को बेहद कम तापमान पर सुरक्षित रखने की कोशिश की जाती है। इसके पीछे विचार यह है कि भविष्य में चिकित्सा विज्ञान इतना विकसित हो सकता है कि आज शरीर को हुए नुकसान को ठीक करके उस व्यक्ति को दोबारा जीवित करने की कोशिश की जा सके।

शरीर को माइनस 196 डिग्री पर कैसे रखा जाता है?
कानूनी मृत्यु के बाद शरीर को जल्दी से जल्दी ठंडा करने की कोशिश की जाती है। इसके बाद क्रायोप्रोटेक्टेंट नाम के रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। इनका उद्देश्य जमने के दौरान बनने वाले बर्फ के क्रिस्टल से कोशिकाओं को होने वाले नुकसान को कम करना है। इसके बाद शरीर या दिमाग को करीब माइनस 196 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले तरल नाइट्रोजन में रखने की कोशिश की जाती है।

कुछ क्रायोनिक्स प्रक्रियाओं में विट्रिफिकेशन का इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है। इसमें ऊतकों के भीतर बर्फ के क्रिस्टल बनने के बजाय कांच जैसी अवस्था बनाने का लक्ष्य होता है, ताकि कोशिकीय संरचना को होने वाला नुकसान कम किया जा सके।

क्रायोनिक्स का विचार कब आया?
क्रायोनिक्स के विचार को रॉबर्ट एटिंगर की 1962 में प्रकाशित किताब द प्रॉस्पेक्ट ऑफ इम्मॉर्टेलिटी से व्यापक पहचान मिली। इसके समर्थकों का तर्क है कि कानूनी मृत्यु के बाद शरीर को जल्दी ठंडा करके उसकी कोशिकीय संरचनाओं को भविष्य की चिकित्सा के लिए बचाने की कोशिश की जा सकती है।

क्या कोई इंसान क्रायोनिक्स से दोबारा जिंदा हुआ है?
अब तक नहीं। आज तक किसी इंसान को क्रायोनिक्स के जरिए सफलतापूर्वक दोबारा जीवित नहीं किया गया है। इसलिए इसे आज की साबित चिकित्सा पद्धति नहीं माना जाता। यह भविष्य में संभव हो सकने वाली तकनीक की उम्मीद पर आधारित प्रयोगात्मक प्रक्रिया है।

वहीं क्रायोप्रिजर्वेशन में कोशिकाओं, ऊतकों और भ्रूण जैसी जैविक सामग्री को कम तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है। इसका चिकित्सा और वैज्ञानिक शोध में वास्तविक इस्तेमाल होता है।

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