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Foreign Exchange: अमेरिका-ईरान जंग के बीच प्रवासी भारतीयों ने भेजे 16 अरब डॉलर, विदेशी मुद्रा में बड़ा उछाल

Wed, 01 Jul 2026 09:15 AM IST
Pavan अजीत खरे, अमर उजाला, नई दिल्ली
अजीत खरे, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Pavan Updated Wed, 01 Jul 2026 09:15 AM IST
सार

अमेरिका-ईरान तनाव और खाड़ी क्षेत्र में भू-राजनीतिक संकट के बावजूद प्रवासी भारतीयों ने भारत को रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भेजी। अप्रैल 2026 में प्रेषण बढ़कर 16 अरब डॉलर पहुंच गया, जो अप्रैल 2025 के 9.4 अरब डॉलर से काफी अधिक है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, 2025-26 में कुल प्रवासी प्रेषण 155.1 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। रिपोर्ट में कहा गया कि संकट के समय प्रवासी भारतीय अपने परिवारों और देश की मदद के लिए अधिक धन भेजते हैं।

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Foreign Exchange: NRI remitted $16 billion amidst US-Iran tensions; major surge in foreign currency reserves
जंग के दौर में देश का साथ - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अमेरिका और ईरान जंग के बावजूद प्रवासी भारतीयों ने विदेशी मुद्रा भेजने में खूब दरियादिली दिखाई। जंग शुरू होने के एक महीने बाद यानी अप्रैल में इन्होंने 16 अरब अमेरिकी डॉलर भारत भेजे। वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। माना जा रहा था कि जंग का असर खाड़ी देशों पर पड़ने के कारण वहां कार्यरत भारतीयों की तरफ से धन भेजने की रफ्तार प्रभावित हो, पर यह आशंकाएं निर्मूल साबित होती दिख रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनावों के कारण खाड़ी देशों से आने वाले धन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंकाओं के विपरीत विदेशी मुद्रा प्राप्तियां मजबूत हैं। यह अप्रैल में 16.0 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जबकि अप्रैल 2025 में यह 9.4 अरब अमेरिकी डॉलर था।
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प्रवासी भारतीयों की तरफ से भेजे जाने वाली रकम में हो रहा इजाफा
वित्त वर्ष 2025-26 में प्रवासी प्रेषण बढ़कर 155.1 अरब अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह 135.4 अरब अमेरिकी डॉलर था। इस प्रकार इसमें वर्ष-दर-वर्ष 14.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस कारण सकल घरेलू उत्पाद में प्रवासी द्वारा भेजी गई रकम का हिस्सा 2024-25 के 3.6 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 4.0 प्रतिशत हो गया।
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संकट के समय बनते हैं मददगार
प्रवासी भारतीयों के अपने देश धन भेजने के कारणों में परोपकार की भावना भी काम करती रही है। असल में परोपकार प्रेरणा के कारण जब मूल देश कठिन परिस्थितियों का सामना करता है तो प्रवासी अपने परिवारों की सहायता के लिए अधिक धन भेजते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि लुकास और स्टार्क (1985) ने इस व्यवहार का सैद्धांतिक प्रतिपादन किया था। कोविड-19 समेत पिछले संकटों के अनुभव भी दर्शाते हैं कि आर्थिक गिरावट के बावजूद मूल देश की कठिनाइयों के समय प्रवासी प्रेषण में वृद्धि हुई, जिससे परोपकार-आधारित इस सिद्धांत की पुष्टि होती है।
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इसके अलावा प्रवासी प्रेषण का प्रवाह मेजबान देशों में रोजगार की स्थिति और मजदूरी स्तर पर आधारित होता है, न कि वित्तीय बाजारों के संकेतों या निवेशकों की धारणा पर। पोर्टफोलियो निवेश या ऋण वित्तपोषण के विपरीत प्रवासी प्रेषण प्रवासी श्रमिकों के रोजगार और परिवारों की आय जैसी अपेक्षाकृत स्थायी परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं, जो भू-राजनीतिक घटनाओं या वित्तीय बाजारों के उतार-चढ़ाव से तुरंत प्रभावित नहीं होतीं।
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