Explainer: सोनम-मुस्कान से सिया तक हत्या का रास्ता क्यों चुन रहा युवा, क्या रिश्ते को खत्म करना इतना मुश्किल?
पुणे के कारोबारी केतन अग्रवाल हत्याकांड, इंदौर के राजा रघुवंशी हत्याकांड, मेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड और श्रद्धा वॉलकर हत्याकांड जैसे मामलों ने रिश्तों और भरोसे को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आखिर कुछ लोग रिश्ता खत्म करने के बजाय हत्या जैसा रास्ता क्यों चुन रहे हैं? इस सवाल को समझने के लिए अमर उजाला ने विशेषज्ञों से बात की। आइए विस्तार से जानते हैं।
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पुणे के कारोबारी केतन अग्रवाल के हत्या का आरोप उनकी मंगेतर सिया और उसके प्रेमी चेतन पर है। केतन का परिवार दोनों आरोपियों की फांसी की मांग कर रहा है। ये कोई पहला मामला नहीं है जब मंगेतर या पत्नी या पति पर इस तरह का आरोप लगा हो। इससे पहले भी इंदौर के राजा रघुवंशी हत्याकांड में आरोप हनीमून पर गई पत्नी पर लगा तो मेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड में आरोप पत्नी मुस्कान पर लगा। वहीं, श्रद्धा वॉलकर हत्याकांड के वक्त भी आरोप प्रेमी आफताब पर लगा।
इस तरह के मामले कई सवाल खड़े करते हैं। सवाल रिश्ते को खत्म करने के तरीके पर भी होता है। सवाल समाजिक व्यवस्था पर भी भी होता है। सवाल ये भी होता है कि क्या सीधे नहीं बोलना इतना मुश्किल हो चुका है कि ऐसे खौफनाक कदम उठाए जा रहे हैं। क्या यह सिर्फ प्यार, धोखा और बेवफाई की कहानी है या फिर इसके पीछे अस्वीकार किए जाने का डर, भावनाओं पर नियंत्रण की कमी, बढ़ता स्वार्थ, मानसिक दबाव और रिश्तों को संभालने की घटती क्षमता जैसी गहरी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक वजहें छिपी हैं? इन्हीं सवालों के जवाबों को ढूंढने के लिए अमर उजाला ने भोपाल की मनोचिकित्सक व मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. समीक्षा साहू और मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी से बात की है। आइए जानते हैं कि उन्होंने क्या-क्या वजह बताई है।
सबसे पहले जानें पुणे का केतन हत्याकांड क्या है?
महाराष्ट्र के पुणे में कारोबारी केतन अग्रवाल की मौत को पहले एक ट्रेकिंग हादसा माना गया था, लेकिन पुलिस जांच में यह हत्या का मामला निकला। पता चला कि केतन की मंगेतर सिया गोयल ने अपने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर लोहागढ़ किले की खाई में धक्का देकर उनकी हत्या की साजिश रची थी। 18 जून 2026 को ट्रेकिंग के दौरान केतन करीब 300-400 फीट गहरी खाई में गिर गए, जिससे उनकी मौत हो गई थी। आरोप है कि सिया ने केतन को मारने का पहला प्लान फेल होने के बाद दूसरे प्रयास में इस हत्याकांड को अंजाम दिया। इसके विफल होने पर उसके पास तीसरा प्लान भी तैयार था।
समाज में क्यों बढ़ रहे हैं ऐसे मामाले?
डॉ. समीक्षा साहू ऐसे मामलों के बढ़ने को लेकर कहती हैं कि एक कांसेप्ट होता है सोशल लर्निंग थ्योरी। यह अल्बर्ट बंडूरा ने आज से कई साल पहले दी थी। उसमें यह बताया गया कि व्यक्ति समाज में, जो भी चीजें चलती हैं, उसको देख के उस चीजों को फॉलो करते हैं। हम आजकल जब देख रहे हैं कि समाज के अंदर रेगुलर बेसिस पे नेगेटिव न्यूज बहुत ज्यादा ही आने लगी है और वह बहुत ज्यादा हाईलाइट भी हो जाती हैं।
लोगों के मन में किसी की हत्या चोरी या कोई गलत काम करने जैसे चीजें सबसे पहले आती हैं। किसी भी समस्या के समाधान के रूप में क्योंकि वही हर जगह दिख रही होती हैं। व्यक्ति को लगता है कि शायद यह फटाफट हो जाएगा और हम इस परेशानी से बाहर आ पाएंगे। उन्हें लगता है कि जब बाकि लोग भी ऐसा करते हैं तो हम भी कर सकते हैं।
वहीं, डॉ. सत्यकांत कहते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि व्यक्ति के मन में ये विचार आता कैसे है? जिसमें एक इंसान दूसरे इंसान के अस्तित्व को समस्या के रूप में देखने लगता है। इसमें ऐसा होता है कि हमारी इच्छा, महत्वकांक्षा धीरे-धीरे इतनी महत्वपूर्ण हो जाती हैं कि दूसरे इंसान का होना या ना होना महत्वहीन हो जाता है। मनोविज्ञान में इस प्रक्रिया को बोलते हैं मोरल डिसएंगेजमेंट यानी नैतिक अलगाव। जहां व्यक्ति अपने लक्ष्य को इतना जरूरी मान लेता है कि दूसरे की पीड़ा या उसके जीवन का कोई मूल्य नहीं रहता है।
इस तरह के मामले लगातार आने का समाज पर क्या असर हो रहा है?
डॉ. सत्यकांत कहते हैं कि इन मामलों में सबसे विचलित करने वाली बात है विश्वास का टूटना, अब आप अपने मंगेतर, जीवनसाथी किसी पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। अब लोग सोच रहे हैं कि हम किस पर विश्वास करें और किस पर नहीं करें। इसें बस प्रेम प्रसंग के रूप में नहीं देखना चाहिए। हमारे अंदर सहानुभूति की कमी होती जा रही है। हमारी नैतिकता में कमी आ रही है और खुदगर्जी की चरम सीमा का मिला-जुला रूप ऐसे मामलों में देखा जा सकता है।
बच्चे अपने माता-पिता से अपनी परेशानी न बताकर ऐसा रास्ता क्यों चुनते हैं?
डॉ. समीक्षा कहती हैं कि कई परिवारों में आज भी जाति, धर्म, समाज की इज्जत और लोग क्या कहेंगे जैसी बातों को बहुत महत्व दिया जाता है। ऐसे माहौल में बड़े होने वाले लोग अक्सर अपने मन की बात खुलकर कहने से डरते हैं, जहां परिवार अधिक प्रगतिशील और खुले विचारों वाला होता है, वहां रिश्तों और विवाह को लेकर फैसले लेने की ज्यादा स्वतंत्रता होती है, लेकिन कई परिवारों में शादी को जीवन का अंतिम और अटूट बंधन माना जाता है। ऐसे में रिश्ते टूटने या पसंद के साथी को चुनने को लेकर दबाव बढ़ जाता है, जिससे कुछ लोग गलत फैसले लेने की ओर भी बढ़ जाते हैं।
वहीं, डॉ. सत्यकांत कहते हैं कि भौतिक उन्नयन, पारिवारिक उन्नयन के साथ-साथ नहीं चल रहा, अभी हमारा समाज थोड़ा बहुत ही आगे बढ़ पाया है। भौतिक उन्नयन और पारिवारिक परंपराओं में गैप बहुत ज्यादा है। इसके कारण मानवीय रिश्तों में जो जटिलताएं आ रही हैं, हम आज भी रूढ़िवादी तरीके से चीजों को आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि जमाना बदल चुका है।
क्या इन मामलों को केवल अपराध समझें?
डॉ. सत्यकांत कहते हैं कि इन मामलों को केवल अपराध के रूप में देखने सही नहीं है यह हमारी असहजताओं को वास्तवीकता में ला रहा है, सिया के मामले में लोग असहज क्यों हो रहे हैं कि लड़की ने कैसे मार दिया? लेकिन अपराधी के मन में तो अपने स्वार्थ को पूरा करना था। केवल अपराध की दृष्टि से ना देखकर इसे बदलते हुए परिदृष्य और मानव मन की जटिलताएं और हमारे बनाए हुए मान्यताओं पर चोट के रूप में देखना चाहिए। इस खबर को लोग ऐसे देख रहे हैं कि एक 20 साल की लड़की कैसे हत्यारी निकल गई? उसे तो करोड़पति लड़का मिल रहा था फिर कैसे हत्या कर दी, लेकिन जो अपराध कर रहा था उसके मन में ऐसा कोई विचार नहीं था।
डॉ. समीक्षा कहती हैं कि ऐसे मामलों को किसी लिंग के रूप में नहीं बल्कि ऐसे देखना चाहिए की हर व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है, जो हत्या कर रहा है उसके मन में अपने लिंग को लेकर कोई विचार नहीं आ रहा, उसे तो बस अपनी परेशानी खत्म करनी है।
लोग क्या कहेंगे का डर क्या इतना बड़ा होता है?
डॉ. सत्यकांत कहते हैं कि आज भी हमारे समाज में रिश्ते का टूटना खराब तरीके से देखा जाता है कि अगर रिश्ता टूट रहा है तो यह बुरी चीज है। परिवार समाज हर तरफ से इसे बचाने का दबाव दिया जाता है, इसलिए कई लोग रिश्ता खत्म करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते और दूसरा रास्ता अपनाते हैं।
डॉ. समीक्षा कहती हैं कि औरतों के लिए आज भी फैसले लेना बहुत कठिन है, वो कितनी भी अच्छे परिवार से आती हों, जब बात शादी और रिश्तों की आती है तो वहां उनसे ज्यादातर नहीं पूछा जाता। सिया के मामले में भी यह कारण हो सकता है। उसके बाद अगर शादी भी टूटती भी है तो लड़को से ज्यादा लकड़ियों की बदनामी होती है।
ऐसे मामलों को कौन दे रहा बढ़ावा?
डॉ. समीक्षा और डॉ. सत्यकांत कहते हैं कि फिल्मों में अपराधों को काफी बढ़ा-चढ़ाकर और महिमामंडित करके पेश किया जाता है। पुष्पा, एनिमल जैसी मूवी या वेब सीरीज में विलेन को हीरो की तरह पेश किया जाता है। वो हत्या करते हैं फिर भी विलेन नहीं हैं, उन्हें पुलिस भी नहीं पकड़ती, उनके अपराधों को वाजिब ठहराया जाता है, दर्शक भी ऐसी चीजों को देखकर खुश होते हैं, उनमें जोश आता है। उन्हें लगता है कि वो भी इतनी चतुराई से अपराध या हत्या करेंगे और पकड़े नहीं जाएंगे।