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Ladakh: 'धार्मिक आयोजनों की आड़ में मुद्दों से ध्यान भटका रही सरकार', शाह के लद्दाख दौरे पर बिफरी कांग्रेस
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Riya Dubey
Updated Fri, 01 May 2026 12:20 PM IST
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सार
कांग्रेस ने गृह मंत्री अमित शाह के लद्दाख दौरे पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सरकार धार्मिक आयोजनों के जरिए लोगों का ध्यान भटका रही है और राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची तथा जमीन-रोजगार सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर चुप है।
जयराम रमेश, नेता, कांग्रेस
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लद्दाख दौरे को लेकर कांग्रेस ने शुक्रवार को केंद्र सरकार पर निशाना साधा। पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार धार्मिक आयोजनों के जरिए ध्यान भटका रही है, जबकि लद्दाख के लोगों की बुनियादी मांगों पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया जा रहा है।
कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि गृह मंत्री इस समय पिपरहवा से जुड़े पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनी के गौरव में डूबे हुए हैं, लेकिन लद्दाख के लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांगों, राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षण, और भूमि व रोजगार की सुरक्षा पर पूरी तरह खामोश हैं। उन्होंने कहा कि यह मुद्दे सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि लद्दाख की पहचान, संस्कृति और संसाधनों की सुरक्षा से जुड़े हैं, जिन पर केंद्र सरकार को स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
आजादी के बाद 14 जनवरी 1949 को इन अवशेषों को भारत वापस लाया गया। नेहरू ने इन्हें कोलकाता स्थित महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया को सौंपा। इसके बाद जुलाई 1949 में नेहरू ने चार दिनों का लद्दाख दौरा किया।
इस दौरे के दौरान प्रमुख बौद्ध धर्मगुरु कुशोक बकुला रिनपोछे ने उनसे अनुरोध किया कि इन पवित्र अवशेषों को लद्दाख भी लाया जाए ताकि वहां के लोग भी दर्शन कर सकें। यह मांग बाद में पूरी हुई और मई 1950 में इन अवशेषों को 79 दिनों तक लद्दाख के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शित किया गया। रमेश ने कहा कि इसके बाद इन अवशेषों को यांगून (म्यांमार), कोलंबो (श्रीलंका) और सांची में स्थापित किया गया।
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कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि गृह मंत्री इस समय पिपरहवा से जुड़े पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनी के गौरव में डूबे हुए हैं, लेकिन लद्दाख के लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांगों, राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षण, और भूमि व रोजगार की सुरक्षा पर पूरी तरह खामोश हैं। उन्होंने कहा कि यह मुद्दे सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि लद्दाख की पहचान, संस्कृति और संसाधनों की सुरक्षा से जुड़े हैं, जिन पर केंद्र सरकार को स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
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ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ा मुद्दा
रमेश ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 1949 के लद्दाख दौरे का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय भी बौद्ध पवित्र अवशेषों को लेकर महत्वपूर्ण पहल की गई थी। उन्होंने बताया कि 1851 में ब्रिटिश शासन के दौरान सांची स्तूप से भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्यों सारिपुत्र और महा मोग्गलान के अवशेष निकालकर लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में रखे गए थे।आजादी के बाद 14 जनवरी 1949 को इन अवशेषों को भारत वापस लाया गया। नेहरू ने इन्हें कोलकाता स्थित महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया को सौंपा। इसके बाद जुलाई 1949 में नेहरू ने चार दिनों का लद्दाख दौरा किया।
इस दौरे के दौरान प्रमुख बौद्ध धर्मगुरु कुशोक बकुला रिनपोछे ने उनसे अनुरोध किया कि इन पवित्र अवशेषों को लद्दाख भी लाया जाए ताकि वहां के लोग भी दर्शन कर सकें। यह मांग बाद में पूरी हुई और मई 1950 में इन अवशेषों को 79 दिनों तक लद्दाख के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शित किया गया। रमेश ने कहा कि इसके बाद इन अवशेषों को यांगून (म्यांमार), कोलंबो (श्रीलंका) और सांची में स्थापित किया गया।
कांग्रेस ने क्या पूछे सवाल?
कांग्रेस ने एक दिन पहले भी केंद्र सरकार से पूछा था कि वह लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची के तहत लाने के मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। पार्टी का कहना है कि लद्दाख के लोग लंबे समय से इन मांगों को उठा रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया गया है।अमित शाह का दौरा
गौरतलब है कि अमित शाह गुरुवार को लद्दाख पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने भारत में पहली बार आयोजित भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में हिस्सा लिया।
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