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दिल्ली में सात कॉलोनियों का होगा कायाकल्प: 21000 से ज्यादा नए फ्लैट बनेंगे, सरकार के खजाने पर नहीं पड़ेगा बोझ

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: Nirmal Kant Updated Sat, 07 Mar 2026 10:10 PM IST
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सार

केंद्र सरकार दिल्ली की सात पुरानी सरकारी कॉलोनियों का पुनर्विकास नए स्व-वित्तपोषित मॉडल से कर रही है। इसमें करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल नहीं होगा, बल्कि जमीन के एक छोटे हिस्से के व्यावसायिक उपयोग से परियोजना की लागत निकाली जाएगी। इस योजना के तहत 21 हजार से ज्यादा नए फ्लैट बनेंगे। पढ़िए रिपोर्ट-

Govt redeveloping colonies of employees without spending taxpayer money
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : संवाद
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विस्तार

केंद्र सरकार दिल्ली में अपने कर्मचारियों की सात पुरानी आवासीय कॉलोनियों को फिर से विकसित कर रही है। यह काम एक नए स्व-वित्तपोषित मॉडल के तहत किया जा रहा है। इसमें सरकारी खजाने या करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल नहीं होगा। अधिकारियों ने शनिवार को यह जानकारी दी। 
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अधिकारियों ने बताया कि सरकार ने करदाताओं के पैसे का उपयोग करने के बजाय जमीन के एक छोटे हिस्से को विकसित कर उससे आय जुटाने की योजना बनाई है। यह जमीन कुल परियोजना क्षेत्र का लगभग 69.41 एकड़ यानी करीब 12.9 फीसदी है। इसे व्यावसायिक और आवासीय उपयोग के लिए विकसित कर आय प्राप्त की जाएगी।
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यह परियोजना सरोजिनी नगर, नेताजी नगर, नौरोजी नगर, कस्तूरबा नगर, त्यागराज नगर, श्रीनिवासपुरी और मोहम्मदपुर कॉलोनियों को कवर करती है। ये सभी कॉलोनियां मिलाकर करीब 537 एकड़ क्षेत्र में फैली हुई हैं। इन कॉलोनियों में मौजूद कई सरकारी आवास बहुत पुराने हो चुके हैं। इनमें से लगभग 40 फीसदी इमारतों को रहने के लिए असुरक्षित घोषित किया जा चुका है। इसी दौरान केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 20 हजार से ज्यादा घरों की कमी भी सामने आई है।

पुनर्विकास के तहत पुराने कम ऊंचाई वाले मकानों की जगह आधुनिक बहुमंजिला आवासीय परिसर बनाए जाएंगे। इससे 21 हजार से ज्यादा नए फ्लैट उपलब्ध होंगे। साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचा और सार्वजनिक सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी।

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रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन नए बने 2,722 फ्लैट्स का उद्घाटन करेंगे। साथ ही सरोजिनी नगर, नेताजी नगर, कस्तूरबा नगर और श्रीनिवासपुरी में सामान्य पूल आवासीय योजना के तहत 6,632 नए फ्लैट्स की आधारशिला भी रखेंगे। इस परियोजना की खास बात इसका स्व-वित्तपोषित मॉडल है। सीमित जमीन के व्यावसायिक उपयोग से करीब 35,100 करोड़ रुपये की आय होने का अनुमान है।

इस राशि से लगभग 32,800 करोड़ रुपये की पुनर्विकास लागत पूरी हो जाएगी। अधिकारियों के मुताबिक, इससे सरकारी बजट पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा और सरकार को करीब 2,300 करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ भी मिल सकता है।


 
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