गुजरात चुनाव 2022 : डायमंड सिटी में भाजपा को टक्कर देने की चुनौती, सूरत की ग्राउंड रिपोर्ट में ये हैं मुद्दे
कांग्रेस ने 2017 में जब पिछले दो दशक में सबसे बेहतर प्रदर्शन किया था, तब भी सूरत उसके लिए सूखा ही साबित हुआ था। उसे केवल एक पर ही सफलता मिली थी। 2021 निकाय चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला।
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मूल रूप से यूपी के बरेली निवासी नरेंद्र साबू अब यहीं के हो गए हैं और सूरत मर्केंटाइल एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। बताते हैं कि 2017 में यहां दो मुख्य मुद्दे थे। पहला, जीएसटी। इससे व्यापारियों में नाराजगी थी। दूसरा, पाटीदार आंदोलन। अब इस आंदोलन के प्रमुख कर्ताधर्ता भाजपा के साथ हैं। अब ये दोनों फैक्टर ज्यादा अहम नहीं हैं। महंगाई व बेरोजगारी की जरूर लोगों के बीच चर्चा है। पर, मोदी गुजरात के गौरव हैं। सभी तरह के मुद्दे उनके सामने गौण हो जाते हैं। उनका दावा है कि भाजपा राज्य में पिछले चुनाव से बेहतर करेगी। कांग्रेस और कमजोर होगी जबकि आप विधानसभा में दस्तक दे सकती है।
तय होगा राज्य का नया सियासी भविष्य
अमरौली में मिले जेठाभाई अहीर व रमेश भाई कहते हैं, आप बिजली बिल, स्कूल फीस, मुफ्त इलाज जैसे मुद्दों पर बात कर रही है जो गरीब व निम्न मध्यवर्ग को लुभा रहे हैं। यही वजह है कि सूरत की कई सीटों पर कांग्रेस की जगह आप, भाजपा को सीधी चुनौती दे रही है। सौराष्ट्र में कई सीटों पर ताकत लगाए हुए है। चौरियासी में मिले ध्रुविन कहते हैं कि यह चुनाव गुजरात के सियासी भविष्य की दिशा तय करने वाला होगा।
भाजपा अब भी मजबूत है, लेकिन देखना होगा कि कांग्रेस की क्या स्थिति रहती है। आप ने 8-10 सीटें व 9-10 फीसदी वोट भी पा लिए तो अगले चुनाव में वह लड़ाई में आ जाएगी। राज्य के गृह मंत्री हर्ष संघवी कहते हैं, युवा भाजपा के साथ हैं और वह मजबूत है। विपक्ष में पहले कांग्रेस थी, जिसकी जगह आप लेने की कोशिश कर रही है। क्या फर्क पड़ता है विपक्ष के वोट कहां जाते हैं। मोदी के वोट भाजपा में ही जाएंगे।
चार विधानसभा सीटों पर सरगर्मी सबसे ज्यादा
सूरत के चार विधानसभा क्षेत्र हॉट सीट के तौर देखे जा रहे हैं। आप ने यहां भाजपा के खिलाफ पाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पास) से जुड़े प्रमुख चेहरों को मैदान में उतारा है। इनमें गुजरात आप के संयोजक गोपाल इटालिया, अल्पेश कथीरिया, राम धड़ुक और धार्मिक मालवीय हैं, जो भाजपा के गढ़ कटारगाम, वराछा, कामरेज और ओलपाड विधानसभा क्षेत्रों के पूर्व पास नेता हैं। सभी सीटों पर त्रिकोणीय लड़ाई नजर आ रही है।
- वाराछा : पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और मौजूदा भाजपा विधायक कुमार कनानी, सूरत नगर निगम में कांग्रेस के पूर्व नेता प्रतिपक्ष प्रफुल्ल तोगड़िया और आप के अल्पेश कथीरिया में मुकाबला है। यहां 1.98 लाख मतदाता हैं, जिनमें से पाटीदार ज्यादा हैं। यहां के लोग कहते हैं कि अल्पेश और धार्मिक मालवीय ने 2021 में पाटीदार बहुल इलाकों से आप के 27 उम्मीदवारों की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ये पहले कांग्रेस में थे। तवज्जो न मिला तो आप में चले गए थे। इस बार ये तगड़ी चुनौती दे रहे हैं।
- कटारगाम : करीब 2.77 लाख मतदाताओं में पाटीदारों का दबदबा है। आप के गोपाल इटालिया भाजपा के मौजूदा विधायक और शहरी विकास राज्य मंत्री विनोद मोरड़िया को चुनौती दे रहे हैं। सूरत निवासी इटालिया पूर्व पुलिस कार्मिक हैं। इटालिया ने चर्चित पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के साथ मिलकर गुजरात में पाटीदार आरक्षण के लिए आंदोलन खड़ा कर पहचान बनाई।
- ओलपाठ : पाटीदार आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे आप नेता धार्मिक मालवीय कृषि व ऊर्जा राज्य मंत्री मुकेश पटेल को चुनौती दे रहे हैं। यहां से कांग्रेस ने एक प्रमुख किसान नेता दर्शन नाइक को उतारा है। यहां बड़ी संख्या में पाटीदार आबादी है।
- कामरेज : आप ने पूर्व पास नेता राम धड़ुक को भाजपा के प्रफुल पनसेरिया के खिलाफ मैदान में उतारा है। यहां कांग्रेस से पूर्व पास नेता नीलेश कुंभानी मैदान में हैं। पाटीदार आरक्षण आंदोलन में कुंभानी एक प्रमुख चेहरा थे।
अब सूरत बनेगा हीरों के कारोबार का गढ़
सूरत की डायमंड सिटी के तौर पर पहचान अर्से से है। मगर, हीरे के कारोबार का मुख्य केंद्र अब भी मुंबई स्थित भारत बुर्स है। इसकी वजह से सूरत के हीरा कारोबारियों को मुंबई से कारोबार करना पड़ता है। सूरत डायमंड एसोसिएशन के सचिव दामजी भाई मवानी ने बताया कि खजोद में अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित ऑफिस तैयार है। छह लाख वर्ग फुट क्षेत्र में 2400 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रहा सूरत डायमंड बुर्स हीरों के कारोबार का सबसे बड़ा गढ़ बनने जा रहा है।
सूरत में 16 विधानसभा सीटें
- सूरत में 16 विधानसभा क्षेत्र हैं। 2017 में 15 पर भाजपा व एक पर कांग्रेस जीती थी। 2021 के नगर महापालिका चुनाव में भाजपा ने 130 में 93 सीटें जीतीं। 27 सीटें जीतकर आप कांग्रेस की जगह मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी। भाजपा यहां सभी सीटें जीतने और आप पाले में आए पाटीदार आंदोलन से जुड़े नेताओं के जरिये इस अंचल के प्रभावशाली पाटीदार समाज के बीच उपस्थिति की कोशिश में जुटी है।
- ओल्पाड़, मंगरोल (एसटी), मांडवी (एसटी), कामरेज, सूरत पूरब, सूरत उत्तर, वारछा रोड, करंज, लिम्बियात, उधना, मजूरा, कतरगाम, सूरत पश्चिम, चोरयासी, बारडोली (एससी), महुआ (एसटी) विधानसभा सीट।
भाजपा : गढ़ बचाने की कोशिश
2017 में भाजपा को हर जगह झटका लगा, मगर सूरत ने संभाल लिया। शहर ने भाजपा को 16 में से 15 सीटें दी थीं। इसी शहर से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल आते हैं। वह पड़ोस के नवसारी जिले से सांसद हैं। सूरत से दो सांसद चुने जाते हैं। दोनों भाजपा के हैं। सदर सांसद दर्शना जरदोश केंद्र में राज्यमंत्री भी हैं। सूरत नगर महापालिका पर भी भाजपा का कब्जा है। राज्य मंत्रिमंडल में सर्वाधिक चार मंत्री यहीं से हैं।
- भाजपा ने एंटी इन्कबेंसी से बचने के लिए उधना, कामरेज व चोर्यासी में प्रत्याशी बदल दिया है, जबकि राज्य सरकार में शामिल चारों मंत्रियों, गृह मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हर्ष संघवी (मजुरा), नागरिक उड्डयन मंत्री पूर्णेश मोदी (सूरत पश्चिम) , शहरी विकास राज्यमंत्री विनोद मोराडिया (कतारगाम) व कृषि-ऊर्जा राज्यमंत्री मुकेश पटेल (ओलपाड) को बरकरार रखा है। भाजपा के सामने अपना गढ़ बचाने की चुनौती है।
आप : जीत तुक्का न साबित करने की चुनौती
आप के राज्य प्रमुख गोपाल इटालिया व पार्टी की उम्मीद से जुड़े प्रमुख पाटीदार नेता चुनाव मैदान में हैं। सूरत निकाय चुनाव में पार्टी ने 130 में से 27 सीटें जीती थीं। आप इस विधानसभा चुनाव में यहां से खाता खोलकर यह साबित करना चाहती है कि निकाय चुनाव की सफलता तुक्का नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक सफलता थी।
कांग्रेस : मौजूदगी बनाए रखने की जद्दोजहद
कांग्रेस ने 2017 में जब पिछले दो दशक में सबसे बेहतर प्रदर्शन किया था, तब भी सूरत उसके लिए सूखा ही साबित हुआ था। उसे केवल एक पर ही सफलता मिली थी। 2021 निकाय चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला। जबकि, 2015 में कांग्रेस को 36 सीटों पर जीत मिली थी।
श्रमिक फैक्टर सबसे अहम, कुछ साल से बंटे
यहां हीरे के कारखानों में सौराष्ट्र के श्रमिकों का बोलबाला है। कपड़ा उद्योग में बड़ी संख्या में यूपी-बिहार व महाराष्ट्र के लोग नजर आते हैं। सूरत में कपड़ा कारोबार से जुड़े दयाशंकर भाई बताते हैं कि कारोबारी और कामगार एक दूसरे के पूरक होने के बावजूद कुछ मुद्दों के चलते कुछ सालों से बंटे नजर आ रहे हैं। अन्य उद्योग-धंधों को छोड़ दीजिए तो भी 15 लाख (लगभग सात लाख रत्न कारीगर व 8 लाख से ज्यादा कपड़ा श्रमिक) से ज्यादा कामगार सिर्फ हीरा और कपड़ा उद्योग से जुड़े हुए हैं। ये लगभग सभी सीटों की जीत-हार में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
