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'फैसलों का सही-गलत आकलन बाद में होता है': सलमान खुर्शीद ने कहा- बाबरी मस्जिद पर रणनीतिक संयम शायद गलती थी
Wed, 05 Aug 2026 08:12 AM IST
Pavan
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Wed, 05 Aug 2026 08:12 AM IST
सार
सलमान खुर्शीद ने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस हो या 2002 के गुजरात दंगे, हर घटना के पीछे कई कारण, प्रशासनिक विफलताएं और दूरगामी प्रभाव होते हैं, जिनका मूल्यांकन समय बीतने के बाद अधिक स्पष्ट रूप से किया जा सकता है।
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सलमान खुर्शीद, वरिष्ठ कांग्रेस नेता
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा है कि सत्ता में रहते हुए कई बार सरकारों को ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिन्हें उस समय सही माना जाता है, लेकिन बाद में पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि वे फैसले बेहतर हो सकते थे। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय अपनाया गया रणनीतिक संयम ऐसा ही एक फैसला था, जो बाद में संभवतः गलती साबित हुआ। सलमान खुर्शीद मंगलवार को वकील और लेखक जावेद गाया की पुस्तक 'हार्टलैंड राइजिंग: द मेकिंग ऑफ मेजॉरिटेरियन इंडिया' के लोकार्पण कार्यक्रम में बोल रहे थे। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ वकील मालविका राजकोटिया ने किया।
बाबरी मस्जिद की शरीर के फोड़े से की तुलना
जब उनसे पूछा गया कि 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने 'रणनीतिक संयम' क्यों अपनाया, तो खुर्शीद ने कहा कि उस घटना को शरीर पर निकले फोड़े की तरह समझा जा सकता है। उन्होंने कहा, 'अगर आप केवल फोड़े पर ध्यान देंगे तो वह बहुत दर्दनाक और बदसूरत दिखाई देगा। लेकिन समय के साथ शरीर उससे उबर भी जाता है। पीछे मुड़कर देखने पर हमें अपनी संभावित गलतियां दिखाई देती हैं'।
यह भी पढ़ें- Seven Years After Article 370: जम्मू-कश्मीर में सात साल बाद कैसे हैं हालात, अनुच्छेद 370 हटने से क्या बदला?
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'रणनीतिक संयम ने शायद बड़ी समस्या को जन्म दे दिया'
सलमान खुर्शीद ने कहा कि उस समय कुछ लोगों का मानना था कि संयम बरतने से हालात और ज्यादा नहीं बिगड़ेंगे। उन्हें डर था कि अगर सख्त कदम उठाए गए तो स्थिति और विस्फोटक हो सकती है। उन्होंने कहा, 'उस समय ऐसा महसूस किया गया कि रणनीतिक संयम ही सही रास्ता है। लेकिन बाद में यह भी महसूस हुआ कि यही संयम शायद उस ताकत को खुलकर सामने आने का मौका दे गया, जिसे रोकना जरूरी था'। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस हो या 2002 के गुजरात दंगे, हर घटना के पीछे कई कारण, प्रशासनिक विफलताएं और दूरगामी प्रभाव होते हैं, जिनका मूल्यांकन समय बीतने के बाद अधिक स्पष्ट रूप से किया जा सकता है।
विभाजन का भी दिया उदाहरण
खुर्शीद ने कहा कि आज भी लोग जवाहरलाल नेहरू को भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। उन्होंने कहा कि आज सवाल उठाया जा सकता है कि विभाजन क्यों स्वीकार किया गया, क्यों नहीं गृहयुद्ध का जोखिम उठाकर विभाजन से इनकार किया गया। उन्होंने कहा, 'ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब पीछे मुड़कर देना आसान होता है। लेकिन जब आप सत्ता में होते हैं और हालात तेजी से बदल रहे होते हैं, तब आपको उसी समय उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर फैसला लेना पड़ता है। बाद में लग सकता है कि उससे बेहतर निर्णय लिया जा सकता था'।
उत्तर प्रदेश को बताया बदलाव की कुंजी
खुर्शीद ने कहा कि देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश की भूमिका बेहद अहम है। उनका मानना है कि यदि भारत फिर से उस लोकतांत्रिक और बहुलतावादी व्यवस्था की ओर लौटना चाहता है, जिसकी कल्पना देश के संस्थापकों ने की थी, तो इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से ही होगी। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों का मानना है कि यह बदलाव संभव नहीं है, जबकि कुछ का विश्वास है कि यह बदलाव या तो भाजपा के भीतर से आएगा या फिर उत्तर प्रदेश गठबंधन की राजनीति का नया मॉडल पेश करेगा।
अपूर्वानंद ने भी उठाए सवाल
इश कार्यक्रम में मौजूद लेखक और शिक्षाविद अपूर्वानंद ने आजादी के बाद की कांग्रेस सरकारों और विपक्षी दलों की राजनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि समाजवादी और वामपंथी दलों ने सत्ता परिवर्तन के लिए जनसंघ के साथ गठबंधन किया, जिसे उन्होंने लोकतांत्रिक प्रलोभन बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. राम मनोहर लोहिया ने दीनदयाल उपाध्याय के साथ राजनीतिक सहयोग किया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यक्रमों में भी गए। उनका कहना था कि सत्ता हासिल करने की राजनीति में कई दलों ने वैचारिक समझौते किए। अपूर्वानंद ने कहा कि यह सुनिश्चित करना हमेशा जरूरी था कि भारत के मुसलमान खुद को देश का बराबरी का नागरिक महसूस करें। उन्होंने सवाल उठाया कि उस समय के नेताओं ने यह क्यों नहीं सोचा कि उनके फैसलों का मुसलमानों के जीवन पर क्या असर पड़ेगा।
यह भी पढ़ें- ऑपरेशन त्रिशूल: सरकार ने भगोड़ों पर कसा शिकंजा, सात साल में 274 अपराधी भारत लाए; हजारों करोड़ की संपत्ति जब्त
खुर्शीद बोले- यह राष्ट्रीय चरित्र से जुड़ा बड़ा सवाल
अपूर्वानंद की बातों पर प्रतिक्रिया देते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा कि यह समझना कठिन है कि जो नेता सांप्रदायिक नहीं थे, उन्होंने लोकतांत्रिक राजनीति के नाम पर ऐसी परिस्थितियों को क्यों स्वीकार किया। उन्होंने कहा, 'जो कुछ कहा गया, वह सच है। यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र से जुड़ा बहुत बड़ा सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ। वे छोटे सोच वाले लोग नहीं थे, इसलिए यह प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण बना हुआ है'।
किताब में क्या है?
प्रकाशक वेस्टलैंड बुक्स के अनुसार, जावेद गाया की पुस्तक 'हार्टलैंड राइजिंग: द मेकिंग ऑफ मेजॉरिटेरियन इंडिया' में यह बताया गया है कि भारत के विभाजन और उसके बाद हिंदी पट्टी के राजनीतिक उभार ने देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दिशा को किस तरह प्रभावित किया। किताब में यह भी चर्चा की गई है कि इन घटनाओं ने जातीय और सांप्रदायिक विभाजन को कैसे बढ़ाया और बहुलतावाद की जगह किस तरह सीमित होती गई।
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बाबरी मस्जिद की शरीर के फोड़े से की तुलना
जब उनसे पूछा गया कि 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने 'रणनीतिक संयम' क्यों अपनाया, तो खुर्शीद ने कहा कि उस घटना को शरीर पर निकले फोड़े की तरह समझा जा सकता है। उन्होंने कहा, 'अगर आप केवल फोड़े पर ध्यान देंगे तो वह बहुत दर्दनाक और बदसूरत दिखाई देगा। लेकिन समय के साथ शरीर उससे उबर भी जाता है। पीछे मुड़कर देखने पर हमें अपनी संभावित गलतियां दिखाई देती हैं'।
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'रणनीतिक संयम ने शायद बड़ी समस्या को जन्म दे दिया'
सलमान खुर्शीद ने कहा कि उस समय कुछ लोगों का मानना था कि संयम बरतने से हालात और ज्यादा नहीं बिगड़ेंगे। उन्हें डर था कि अगर सख्त कदम उठाए गए तो स्थिति और विस्फोटक हो सकती है। उन्होंने कहा, 'उस समय ऐसा महसूस किया गया कि रणनीतिक संयम ही सही रास्ता है। लेकिन बाद में यह भी महसूस हुआ कि यही संयम शायद उस ताकत को खुलकर सामने आने का मौका दे गया, जिसे रोकना जरूरी था'। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस हो या 2002 के गुजरात दंगे, हर घटना के पीछे कई कारण, प्रशासनिक विफलताएं और दूरगामी प्रभाव होते हैं, जिनका मूल्यांकन समय बीतने के बाद अधिक स्पष्ट रूप से किया जा सकता है।
विभाजन का भी दिया उदाहरण
खुर्शीद ने कहा कि आज भी लोग जवाहरलाल नेहरू को भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। उन्होंने कहा कि आज सवाल उठाया जा सकता है कि विभाजन क्यों स्वीकार किया गया, क्यों नहीं गृहयुद्ध का जोखिम उठाकर विभाजन से इनकार किया गया। उन्होंने कहा, 'ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब पीछे मुड़कर देना आसान होता है। लेकिन जब आप सत्ता में होते हैं और हालात तेजी से बदल रहे होते हैं, तब आपको उसी समय उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर फैसला लेना पड़ता है। बाद में लग सकता है कि उससे बेहतर निर्णय लिया जा सकता था'।
उत्तर प्रदेश को बताया बदलाव की कुंजी
खुर्शीद ने कहा कि देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश की भूमिका बेहद अहम है। उनका मानना है कि यदि भारत फिर से उस लोकतांत्रिक और बहुलतावादी व्यवस्था की ओर लौटना चाहता है, जिसकी कल्पना देश के संस्थापकों ने की थी, तो इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से ही होगी। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों का मानना है कि यह बदलाव संभव नहीं है, जबकि कुछ का विश्वास है कि यह बदलाव या तो भाजपा के भीतर से आएगा या फिर उत्तर प्रदेश गठबंधन की राजनीति का नया मॉडल पेश करेगा।
अपूर्वानंद ने भी उठाए सवाल
इश कार्यक्रम में मौजूद लेखक और शिक्षाविद अपूर्वानंद ने आजादी के बाद की कांग्रेस सरकारों और विपक्षी दलों की राजनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि समाजवादी और वामपंथी दलों ने सत्ता परिवर्तन के लिए जनसंघ के साथ गठबंधन किया, जिसे उन्होंने लोकतांत्रिक प्रलोभन बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. राम मनोहर लोहिया ने दीनदयाल उपाध्याय के साथ राजनीतिक सहयोग किया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यक्रमों में भी गए। उनका कहना था कि सत्ता हासिल करने की राजनीति में कई दलों ने वैचारिक समझौते किए। अपूर्वानंद ने कहा कि यह सुनिश्चित करना हमेशा जरूरी था कि भारत के मुसलमान खुद को देश का बराबरी का नागरिक महसूस करें। उन्होंने सवाल उठाया कि उस समय के नेताओं ने यह क्यों नहीं सोचा कि उनके फैसलों का मुसलमानों के जीवन पर क्या असर पड़ेगा।
यह भी पढ़ें- ऑपरेशन त्रिशूल: सरकार ने भगोड़ों पर कसा शिकंजा, सात साल में 274 अपराधी भारत लाए; हजारों करोड़ की संपत्ति जब्त
खुर्शीद बोले- यह राष्ट्रीय चरित्र से जुड़ा बड़ा सवाल
अपूर्वानंद की बातों पर प्रतिक्रिया देते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा कि यह समझना कठिन है कि जो नेता सांप्रदायिक नहीं थे, उन्होंने लोकतांत्रिक राजनीति के नाम पर ऐसी परिस्थितियों को क्यों स्वीकार किया। उन्होंने कहा, 'जो कुछ कहा गया, वह सच है। यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र से जुड़ा बहुत बड़ा सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ। वे छोटे सोच वाले लोग नहीं थे, इसलिए यह प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण बना हुआ है'।
किताब में क्या है?
प्रकाशक वेस्टलैंड बुक्स के अनुसार, जावेद गाया की पुस्तक 'हार्टलैंड राइजिंग: द मेकिंग ऑफ मेजॉरिटेरियन इंडिया' में यह बताया गया है कि भारत के विभाजन और उसके बाद हिंदी पट्टी के राजनीतिक उभार ने देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दिशा को किस तरह प्रभावित किया। किताब में यह भी चर्चा की गई है कि इन घटनाओं ने जातीय और सांप्रदायिक विभाजन को कैसे बढ़ाया और बहुलतावाद की जगह किस तरह सीमित होती गई।