Explainer: कितनी फास्ट होती है फास्ट ट्रैक कोर्ट, देश में ऐसी कितनी अदालतें, ये कैसे करती हैं काम?
पेपर लीक और परीक्षाओं में गड़बड़ी को लेकर जारी विवाद के बीच सरकार ने ऐसे मामलों में जल्द और कड़ी सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का फैसला किया है। ऐसे में सवाल है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट वास्तव में कितनी तेजी से मामलों का निपटारा करते हैं, देश में ऐसी कितनी अदालतें हैं। पढ़ें पूरा एक्सप्लेनर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
देश में पेपर लीक और परीक्षाओं में गड़बड़ी का मुद्दा इस वक्त चर्चा में है। नीट यूजी पेपर लीक को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई दिनों से विरोध प्रदर्शन चल रहा है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि पेपर लीक में शामिल लोगों को जल्द और कड़ी सजा दिलाने के लिए सरकार ने फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का फैसला किया है। इसके बाद दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में सार्वजनिक परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष रूप से एक फास्ट ट्रैक कोर्ट बनेगा।
ऐसे में सवाल है कि आखिर फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होते हैं? इन्हें कौन बनाता और चलाता है? देश में कितने फास्ट ट्रैक कोर्ट काम कर रहे हैं? फास्ट ट्रैक कोर्ट और फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में क्या अंतर है और इनमें मामलों की स्थिति क्या है? क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट सच में फास्ट हैं? आइए समझते हैं...
सबसे पहले जानिए, ताजा मामला क्या है?
दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में एक विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया गया है। यह कोर्ट सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 के तहत आने वाले अपराधों और उनसे जुड़े दूसरे मामलों की सुनवाई करेगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने तीस हजारी कोर्ट के मध्यस्थता केंद्र की जज इंचार्ज अनु ग्रोवर बालिगा का तबादला राउज एवेन्यू कोर्ट में किया है। उन्हें यहां विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) (सीबीआई) के तौर पर नियुक्त किया गया है। यह अदालत विशेष रूप से नामित फास्ट ट्रैक कोर्ट के तौर पर काम करेगी।
दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल अरुण भारद्वाज की ओर से जारी आदेश के मुताबिक, यह न्यायिक अधिकारी राउज एवेन्यू कोर्ट के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश-सह-विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) (सीबीआई) के नियंत्रण में काम करेंगी।
इस फैसले के एक दिन बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने औरंगाबाद और नागपुर में दो विशेष अदालतें नामित कर दी हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविंद्र वी घुगे ने औरंगाबाद में जज एस.वी. पवार और नागपुर में जज गुलशन कोल्टे की अदालत को इन मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत के रूप में नामित किया है।
दरअसल, केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट से सुनवाई के लिए कम से कम दो प्रमुख जिलों में विशेष अदालतें नामित करने का अनुरोध किया था। केंद्र ने इन अदालतों में अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को जिम्मेदारी देने का भी आग्रह किया था। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 के मुताबिक, इसके तहत आने वाले मामलों की सुनवाई तीन महीने के भीतर पूरी की जानी है।
आखिर फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होते हैं?
फास्ट ट्रैक कोर्ट यानी एफटीसी ऐसी अदालतें हैं, जिन्हें कुछ खास तरह के मामलों की तेजी से सुनवाई और निपटारे के उद्देश्य से बनाया जाता है। कानून मंत्रालय के मुताबिक, फास्ट ट्रैक कोर्ट केंद्र सरकार सीधे स्थापित नहीं करती। इन्हें राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपनी जरूरत और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर संबंधित हाईकोर्ट से सलाह करके बनाते हैं। यानी किसी राज्य को कितने फास्ट ट्रैक कोर्ट की जरूरत है, इसका फैसला उसकी जरूरत, संसाधन और संबंधित हाईकोर्ट के साथ विचार-विमर्श के आधार पर होता है।
कितने फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की हुई थी सिफारिश?
- 14वें वित्त आयोग ने 2015 से 2020 के बीच देश में 1,800 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की सिफारिश की थी।
- इन अदालतों को खास तौर पर जघन्य अपराधों के साथ महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों और गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों से जुड़े मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए बनाने की सिफारिश की गई थी।
- इसके अलावा पांच साल से ज्यादा समय से लंबित संपत्ति से जुड़े मामलों को भी इनमें शामिल किया गया था।
इन फास्ट ट्रैक कोर्ट का पैसा कौन देता है?
कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के लोकसभा में दी हुई जानकारी के अनुसार, सामान्य फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रशासन संबंधित हाईकोर्ट के पास होता है और इनका खर्च राज्य या केंद्र शासित प्रदेश उठाते हैं। इन अदालतों को स्थापित करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को कोई वित्तीय सहायता नहीं दी जाती है।
केंद्र सरकार ने हाल के समय में इन सामान्य फास्ट ट्रैक कोर्ट का कोई थर्ड-पार्टी मूल्यांकन भी नहीं कराया है। साथ ही केंद्र सरकार के पास फिलहाल किसी केंद्र प्रायोजित योजना के तहत इन सामान्य फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
फिर फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट क्या हैं?
सामान्य फास्ट ट्रैक कोर्ट राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा संबंधित हाईकोर्ट से सलाह करके बनाए जाते हैं और इनका खर्च भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश उठाते हैं। वहीं फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट के लिए केंद्र सरकार अलग से एक केंद्र प्रायोजित योजना चला रही है।
आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2018 के बाद केंद्र सरकार ने अक्तूबर 2019 में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट स्थापित करने की योजना शुरू की थी। इन अदालतों को दुष्कर्म और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े लंबित मामलों की समयबद्ध सुनवाई और निपटारे के लिए बनाया गया। इनमें विशेष पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं।
देश में कितने फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट?
इस योजना के तहत 790 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट स्थापित करने का प्रावधान किया गया था। 30 अप्रैल 2026 तक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 775 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट काम कर रहे थे। इनमें 398 विशेष पॉक्सो अदालतें थीं।
एफटीएससी का खर्च कौन उठाता है?
सामान्य फास्ट ट्रैक कोर्ट के उलट फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट केंद्र प्रायोजित योजना के तहत चलते हैं। इसके तहत केंद्र और राज्यों के बीच खर्च बांटा जाता है। सामान्य तौर पर केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी 60:40 होती है, जबकि निर्धारित राज्यों के मामले में यह अनुपात 90:10 होता है। इस योजना के तहत प्रत्येक फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में एक न्यायिक अधिकारी और सात सहायक कर्मचारियों के वेतन का खर्च कवर किया जाता है। इसके 1,259.51 करोड़ रुपये जारी कर चुकी है।
कितने फास्ट हैं ये कोर्ट?
लोकसभा में 2025 में कानून मंत्री की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट से जुड़े मामलों में तेजी से न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन अदालतों में मामलों के निपटारे की दर 96.28 फीसदी रही है। 2024 में एफटीएससी में 88,902 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 85,595 मामलों का निपटारा किया गया। सरकार ने इस योजना को 2026 तक बढ़ाया है। इसके लिए निर्भया फंड के तहत 1,952.23 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान किया गया है। औसतन एक एफटीएससी ने हर महीने करीब 9.5 मामलों का निपटारा किया, जबकि इसके मुकाबले सामान्य अदालत ने हर महीने औसतन 3.3 मामले निपटाए।
इन अदालतों में मामलों के निपटारे में देरी क्यों होती है?
कानून मंत्रालय के मुताबिक, मामलों के निपटारे में देरी की कोई एक वजह नहीं होती। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें पर्याप्त बुनियादी ढांचे की उपलब्धता, मामले से जुड़े तथ्यों की जटिलता, जांच की गुणवत्ता, सबूतों की प्रकृति, वकीलों और जांच एजेंसियों का सहयोग, कानूनी प्रतिनिधित्व, फॉरेंसिक सहायता, गवाह और मुकदमे से जुड़े पक्षों का सहयोग तथा नियमों और प्रक्रियाओं का सही तरीके से पालन शामिल है।
क्या ज्यादा दोषसिद्धि का मतलब कोर्ट बेहतर काम कर रहा है?
केंद्र सरकार सामान्य फास्ट ट्रैक कोर्ट में दोषसिद्धि दर का अलग से डेटा नहीं रखती है। सरकार के मुताबिक, दोषसिद्धि दर केवल अदालत के प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करती। जांच की गुणवत्ता, मामले की जटिलता, सबूतों की प्रकृति और गुणवत्ता, जांच एजेंसियों, वकीलों, फॉरेंसिक लैब और गवाहों जैसे कई पक्षों की भूमिका होती है। इसलिए केवल दोषसिद्धि दर के आधार पर किसी अदालत के प्रदर्शन को नहीं आंका जा सकता। अदालत का काम कानून के मुताबिक न्याय देना है और इसमें सबूतों के आधार पर किसी आरोपी को बरी करना भी शामिल हो सकता है।
केंद्र सरकार कब बना सकती है फास्ट ट्रैक कोर्ट?
भारतीय संवैधानिक विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने बताया कि यह विषय समवर्ती सूची में आता है, ऐसे मामलों में केंद्र सरकार कानून बना सकती है, जैसे लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम बनाया था। फिलहाल प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी है और इसे लेकर बिल बनाने की बात की जा रही है। संसद में इसे लेकर बिल लाया जाएगा और उसके पारित होने के बाद इससे संबंधित कानून बन जाएगा।
दरअसल, भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में समवर्ती सूची दी गई है। इसमें 52 ऐसे विषय हैं, जिन पर केंद्र और राज्य दोनों सरकारें कानून बना सकती हैं। अगर किसी विषय पर केंद्र और राज्य के बनाए कानून आपस में टकराते हैं, तो आमतौर पर केंद्र सरकार का बनाया कानून लागू होता है।