फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   How the Supreme Court's Live-in Relationship Ruling Changes Legal Protection for Women

Explainer: कब लिव-इन में रहने वाली महिलाएं भी कर सकेंगी घरेलू क्रूरता का केस, इस सुप्रीम आदेश से क्या बदलेगा?

Tue, 04 Aug 2026 04:55 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Tue, 04 Aug 2026 04:55 PM IST
सार

क्या बिना शादी के साथ रहने वाली महिलाएं भी घरेलू क्रूरता का केस दर्ज करा सकेंगी? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर अहम कानूनी स्पष्टता दी है। अदालत ने कहा है कि कुछ परिस्थितियों में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी आपराधिक कानून के तहत संरक्षण मिल सकता है। ऐसे में सवाल है कि किन लिव-इन रिश्तों को यह कानूनी सुरक्षा मिलेगी और इस फैसले से महिलाओं के अधिकारों में क्या बदलाव आएगा? आइए विस्तार से जानते हैं।

विज्ञापन
How the Supreme Court's Live-in Relationship Ruling Changes Legal Protection for Women
सुप्रीम कोर्ट का फैसला - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश दिया है। अदालत ने कहा है कि कुछ परिस्थितियों में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को भी घरेलू क्रूरता के मामलों में आपराधिक कानून का संरक्षण मिल सकता है। हालांकि यह सुरक्षा सभी लिव-इन रिश्तों पर लागू नहीं होगी। कोर्ट ने इसके लिए कुछ स्पष्ट शर्तें भी तय की हैं। 

विज्ञापन


ऐसे में सवाल है कि आखिर किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ये कहा? यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है? इससे क्या बदल जाएगा? किन महिलाओं को इसका लाभ मिलेगा? भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अब तक कानून क्या कहते हैं? आइए विस्तार से समझते हैं।

विज्ञापन

क्या है पूरा मामला?

यह मामला कर्नाटक से जुड़ा है। एक महिला ने अपने साथी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत क्रूरता का मामला दर्ज कराया था। आरोपी ने अदालत में कहा कि दोनों की कानूनी शादी नहीं हुई थी, इसलिए उसके खिलाफ धारा 498ए लागू नहीं हो सकती।

विज्ञापन
विज्ञापन


कर्नाटक हाई कोर्ट ने उसकी यह दलील खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर कोई पुरुष किसी महिला को यह विश्वास दिलाता है कि वह उसकी पत्नी है और बाद में उसके साथ क्रूरता करता है, तो वह केवल यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि शादी कानूनी रूप से वैध नहीं थी। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। हालांकि अदालत केवल इस मामले तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने यह भी तय किया कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को भी धारा 498ए का संरक्षण मिल सकता है।

कोर्ट ने कहा कि अगर कोई लिव-इन रिलेशनशिप 'शादी जैसे रिश्ते' की श्रेणी में आती है और दोनों का शादी करने का इरादा (Intent to Marry) हो, तो ऐसी महिला को भी आईपीसी की धारा 498ए (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85) के तहत संरक्षण मिलेगा।

कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 498ए का उद्देश्य महिलाओं को घरेलू क्रूरता और उत्पीड़न से बचाना है। अगर कोई महिला शादी में रहते हुए क्रूरता का शिकार होती है तो उसे कानून संरक्षण देता है। लेकिन अगर वही क्रूरता किसी ऐसे रिश्ते में हो जो व्यवहार में शादी जैसा हो, तो केवल औपचारिक विवाह न होने के आधार पर महिला को संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि क्रूरता यह देखकर घर में प्रवेश नहीं करती कि महिला शादीशुदा है या नहीं। अदालत ने माना कि शादीशुदा और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के बीच यह अंतर करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन होगा।

How the Supreme Court's Live-in Relationship Ruling Changes Legal Protection for Women
सुप्रीम कोर्ट का तर्क - फोटो : Amar Ujala

क्या हर लिव-इन रिलेशनशिप को यह संरक्षण मिलेगा?

नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला हर लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू नहीं होगा। इसके लिए चार शर्तें पूरी होना जरूरी हैं;

  • रिश्ता दो बालिगों के बीच हो।
  • दोनों अपनी इच्छा से साथ रह रहे हों।
  • रिश्ता शादी जैसा हो।
  • दोनों का शादी करने का इरादा हो।

कोर्ट ने कहा कि केवल साथ रहने से कोई रिश्ता अपने आप इस श्रेणी में नहीं आ जाएगा।

दोनों का रिश्ता शादी जैसा हो ये कैसे तय होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अदालत यह देखेगी कि;

  • क्या दोनों लंबे समय तक साथ रहे?
  • क्या वे एक ही घर में पति-पत्नी की तरह रहते थे?
  • क्या घरेलू जिम्मेदारियां साझा करते थे?
  • क्या आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर थे या संसाधन साझा करते थे?
  • क्या समाज में उनकी पहचान पति-पत्नी जैसी थी?
  • क्या दोनों का रिश्ता स्थायी था?

इन तथ्यों के आधार पर अदालत तय करेगी कि रिश्ता वास्तव में शादी जैसा था या नहीं।

शादी करने का इरादा क्यों जरूरी है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज कई लोग अपनी इच्छा से लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं, लेकिन कभी शादी नहीं करना चाहते। ऐसे रिश्तों को शादी के बराबर मानकर सीधे आपराधिक कानून लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए अदालत ने कहा कि केवल वही लिव-इन रिलेशनशिप धारा 498ए के दायरे में आएंगे, जिसमें दोनों का शादी करने का वास्तविक इरादा हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि शुरुआत में इस इरादे को साबित करने की जिम्मेदारी महिला की होगी।

घरेलू हिंसा कानून का तर्क कोर्ट ने क्यों नहीं माना?

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और आरोपी ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को पहले से ही घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा मिलती है, इसलिए धारा 498ए का दायरा बढ़ाने की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम एक सिविल कानून है। इसके तहत महिला को भरण-पोषण, संरक्षण आदेश, रहने का अधिकार और अन्य राहत मिलती है। लेकिन धारा 498ए (अब बीएनएस की धारा 85) एक आपराधिक कानून है, जिसमें आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होती है, जांच होती है और दोष सिद्ध होने पर सजा भी हो सकती है। इसलिए दोनों कानूनों की प्रकृति अलग है और एक कानून दूसरे का विकल्प नहीं हो सकता।

How the Supreme Court's Live-in Relationship Ruling Changes Legal Protection for Women
क्या अंतर? - फोटो : Amar Ujala

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 क्या है?

यह कानून महिलाओं को घरेलू रिश्तों में होने वाली किसी भी प्रकार की हिंसा से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था। इसका उद्देश्य केवल शारीरिक हिंसा रोकना नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक, यौन और आर्थिक उत्पीड़न से भी महिलाओं की रक्षा करना है।

इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह केवल शादीशुदा महिलाओं तक सीमित नहीं है। इसकी धारा 2(f) के अनुसार, यदि कोई महिला किसी पुरुष के साथ शादी जैसे रिश्त में रहती है, तो वह भी इस कानून के तहत संरक्षण पाने की हकदार हो सकती है। यानी अगर अदालत यह मानती है कि लिव-इन रिलेशनशिप शादी जैसी थी, तो महिला इस कानून के तहत राहत मांग सकती है।

इस कानून में घरेलू हिंसा का दायरा काफी व्यापक है। इसमें केवल मारपीट ही नहीं, बल्कि मानसिक प्रताड़ना, गाली-गलौज, अपमान, यौन उत्पीड़न, आर्थिक शोषण, खर्च के लिए पैसे न देना, महिला की संपत्ति पर नियंत्रण करना, घर से निकाल देना और दहेज जैसी अवैध मांगों के लिए प्रताड़ित करना भी शामिल है।

अगर कोई महिला घरेलू हिंसा की शिकार होती है, तो वह अदालत से कई तरह की राहत मांग सकती है, जैसे

  • हिंसा रोकने के लिए संरक्षण आदेश 
  • साझा घर में रहने का अधिकार 
  • भरण-पोषण और आर्थिक सहायता 
  • बच्चों की अस्थायी अभिरक्षा 
  • मानसिक और शारीरिक नुकसान के लिए मुआवजा 

हालांकि, यह एक सिविल कानून है। इसका उद्देश्य महिला को सुरक्षा और राहत उपलब्ध कराना है, न कि आरोपी को सीधे आपराधिक सजा दिलाना।

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 क्या है?

घरेलू हिंसा कानून से अलग, भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 85 एक आपराधिक प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि अगर पति या उसके रिश्तेदार किसी महिला के साथ क्रूरता करते हैं, तो उन्हें तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

धारा 86 में 'क्रूरता' का क्या मतलब है?

धारा 86 यह बताती है कि धारा 85 के तहत क्रूरता किन परिस्थितियों को माना जाएगा। कानून के अनुसार, क्रूरता में शामिल हैं;

  • ऐसा जानबूझकर किया गया व्यवहार जिससे महिला आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाए।
  • ऐसा व्यवहार जिससे महिला के जीवन, स्वास्थ्य या मानसिक और शारीरिक स्थिति को गंभीर नुकसान पहुंचे।
  • दहेज, पैसे, संपत्ति या किसी अन्य मूल्यवान वस्तु की अवैध मांग को लेकर महिला या उसके परिवार को प्रताड़ित करना।
  • दहेज या संपत्ति की मांग पूरी न होने पर महिला को मानसिक या शारीरिक रूप से परेशान करना।

How the Supreme Court's Live-in Relationship Ruling Changes Legal Protection for Women
किन पर होगा लागू? - फोटो : Amar Ujala

क्या यह फैसला सभी कानूनों पर लागू होगा?

नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी यह व्याख्या केवल बीएनएस की धारा 85 तक सीमित रहेगी। इस फैसले का असर विवाह, उत्तराधिकार, संपत्ति या किसी अन्य कानून पर स्वतः नहीं पड़ेगा।

गिरफ्तारी को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य के फैसले में तय दिशा-निर्देशों का पालन किया जाएगा।यानी शिकायत मिलते ही तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी। पुलिस पहले प्रारंभिक जांच करेगी और उसके बाद ही कार्रवाई करेगी।

दरअसल, अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जिन मामलों में अधिकतम सात साल तक की सजा का प्रावधान है, उनमें पुलिस बिना पर्याप्त कारण और प्रारंभिक जांच के तुरंत गिरफ्तारी नहीं करेगी। यह फैसला विशेष रूप से आईपीसी की धारा 498ए के मामलों में अनावश्यक गिरफ्तारियों पर रोक लगाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

How the Supreme Court's Live-in Relationship Ruling Changes Legal Protection for Women
लिव-इन रिलेशनशिप - फोटो : Amar Ujala

भारत में लिव-इन रिलेशनशिप की कानूनी स्थिति क्या है?

भारत में लिव-इन रिलेशनशिप पर कोई अलग केंद्रीय कानून नहीं है। इसकी कानूनी मान्यता मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और कुछ मौजूदा कानूनों से विकसित हुई है।

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कानून क्या कहता है?

सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में कहा है कि दो बालिग अपनी इच्छा से बिना शादी किए साथ रह सकते हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) में अदालत ने कहा कि दो बालिगों का साथ रहना अपराध नहीं है।

क्या लिव-इन पार्टनर को संपत्ति में अधिकार मिलता है?

फिलहाल नहीं। पति-पत्नी की तरह स्वतः उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिलता। इसके लिए वसीयत, संयुक्त स्वामित्व या अन्य कानूनी व्यवस्था जरूरी होती है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed