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पति ने लगाया व्यभिचार का आरोप? पहले होगा उसी पर फैसला, फिर मिलेगा गुजारा-भत्ता: सुप्रीम कोर्ट
Fri, 31 Jul 2026 06:51 PM IST
प्रशांत तिवारी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Fri, 31 Jul 2026 06:51 PM IST
सार
अगर पति व्यभिचार का आरोप लगाता है, तो पत्नी को अंतरिम गुजारा-भत्ता देने से पहले अदालत को उस आरोप पर फैसला करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मान लेना सही नहीं होगा कि ऐसे मुद्दे पर निर्णय केवल अंतिम सुनवाई के समय ही लिया जा सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति यह दावा करता है कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है और वह शुरुआती स्तर पर उसके समर्थन में प्रथमदृष्टया साक्ष्य पेश कर देता है, तो अदालत को अंतरिम गुजारा-भत्ता देने से पहले उस आपत्ति पर विचार कर फैसला करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि निजी जासूसों के जरिए सबूत जुटाने के बढ़ते चलन को नियंत्रित करने के लिए कानूनी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है।
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क्या कहा सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने?
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि यदि पति दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) के तहत आवेदन दाखिल करता है और प्रथमदृष्टया साक्ष्यों के आधार पर व्यभिचार के आरोप को स्थापित कर देता है, तभी पत्नी को अंतरिम गुजारा-भत्ता देने पर रोक लगाई जा सकती है। पीठ ने कहा, 'चूंकि धारा 125(4) में यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि पत्नी के व्यभिचार में रहने का आरोप सिद्ध हो जाता है, तो वह न तो अंतरिम और न ही अंतिम गुजारा-भत्ते की हकदार होगी। इसलिए यदि पति धारा 125(4) के तहत आवेदन देकर शुरुआती स्तर पर साक्ष्यों के माध्यम से आरोप को स्थापित कर देता है, तभी अंतरिम गुजारा-भत्ता रोका जा सकता है।'
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यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?
यह फैसला राजस्थान के एक व्यक्ति की अपील पर आया, जिसने राजस्थान हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें व्यभिचार के आधार पर पत्नी को गुजारा-भत्ता देने का विरोध करने वाली उसकी याचिका खारिज कर दी गई थी। रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों की शादी 7 जुलाई 2014 को हुई थी। शादी के कुछ वर्षों बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया। महिला ने पति पर कई आरोप लगाए और पुलिस में शिकायतें भी दर्ज कराईं। बाद में 13 मई 2020 को वह अपने बच्चे और कीमती सामान के साथ ससुराल छोड़कर चली गई।
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पत्नी ने गुजारा-भत्ता क्यों मांगा और पति ने क्या दलील दी?
महिला ने उदयपुर के स्पेशल एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में अंतरिम गुजारा-भत्ता के लिए आवेदन दायर किया। इसके जवाब में पति ने सीआरपीसी की धारा 125(4) के तहत आवेदन देकर कहा कि उसकी पत्नी व्यभिचारपूर्ण संबंधों में रह रही है, इसलिए वह किसी भी प्रकार के अंतरिम गुजारा-भत्ते की हकदार नहीं है। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने उसकी इस आपत्ति को खारिज कर दिया।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति ने पत्नी के कथित व्यभिचार को साबित करने के लिए कई तस्वीरें और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेश किए हैं। अदालत ने कहा कि अंतरिम गुजारा-भत्ता तय करते समय ट्रायल कोर्ट को यह जांचना होगा कि प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रथमदृष्टया व्यभिचार साबित करते हैं या नहीं। साथ ही पत्नी को भी इन साक्ष्यों की सत्यता और वैधता पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है, और अदालत को उन आपत्तियों पर भी विचार करना होगा। पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह कहना गलत था कि पत्नी की मुख्य याचिका पर अंतिम फैसला होने से पहले पति की धारा 125(4) वाली आपत्ति पर निर्णय नहीं लिया जा सकता।
धारा 125(4) में क्या प्रावधान है?
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(4) के अनुसार, यदि कोई पत्नी व्यभिचार में रह रही है, तो वह अपने पति से धारा 125 के तहत गुजारा-भत्ता, अंतरिम गुजारा-भत्ता या मुकदमे के खर्च की मांग नहीं कर सकती।
निजी जासूसों के इस्तेमाल पर अदालत ने क्या टिप्पणी की?
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पति ने पत्नी की तस्वीरें और वीडियो जुटाने के लिए एक निजी जासूस (प्राइवेट डिटेक्टिव) की सेवाएं ली थीं। अदालत ने कहा कि सबूत जुटाने के बदलते तरीकों को देखते हुए ऐसी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था और नियामक ढांचा तैयार किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि कानून, कानून लागू करने वाली एजेंसियां और गोपनीयता (प्राइवेसी) विशेषज्ञ मिलकर ऐसे नियम तैयार करें, जिनसे यह तय हो सके कि निजी जांचकर्ता अपनी पेशेवर सीमाओं का उल्लंघन न करें। यदि किसी व्यक्ति के अधिकारों का हनन होता है, तो उसके लिए प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था भी होनी चाहिए।
सरकार और विधि आयोग को क्या निर्देश दिए गए?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस विषय पर आवश्यक कानूनी ढांचा तैयार करने की जिम्मेदारी विधायिका की है। इसके लिए सरकार अन्य देशों के कानूनों और व्यवस्थाओं का भी अध्ययन कर सकती है। अदालत ने विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड राज्य, कनाडा के ओंटारियो प्रांत, नीदरलैंड और सिंगापुर जैसे देशों एवं क्षेत्रों का उल्लेख किया, जहां निजी जांच से जुड़े नियम पहले से मौजूद हैं।
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अंत में सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
पीठ ने निर्देश दिया कि इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय के सचिव तथा भारत के विधि आयोग के अध्यक्ष को भेजी जाए, ताकि वे इस विषय पर उचित विचार कर आवश्यक कानूनी और नीतिगत कदम उठाने पर निर्णय ले सकें।