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India China Tension: लद्दाख में चीन की पेचीदगियों पर क्या कर रहा भारत और कब तक LAC के पास सीना ताने खड़े रहेंगे सैनिक?

Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Thu, 09 Jun 2022 07:13 AM IST
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सार

चीन से आ रहे संकेतों और ताजा स्थिति को देखकर ही उन्होंने 7 जून (मंगलवार) को एक बार फिर दोहराया कि हमारी सीमाओं की सुरक्षा जरूरी है और हम यथास्थिति में एकतरफा तरीके से बदलाव करने के प्रयास को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। एक तथ्य और है कि लद्दाख में चीन के साथ अप्रैल 2020 से पैदा हुए गतिरोध के समाधान के 15 दौर की सैन्य कमांडरों की वार्ता भी हो चुकी है।

India China Tension: What is India doing on China complications in Ladakh and for how long will the indian soldiers be standing near the LAC
पैंगोंग क्षेत्र - फोटो : Indian Army
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विस्तार

लद्दाख में चीन लगातार भारत के लिए चुनौतियां खड़ी कर रहा है। अमेरिका के एशिया-प्रशांत क्षेत्र को देखने वाले सेना के शीर्ष जनरल चार्ल्स ए फ्लायन ने भी सैटेलाइट की तस्वीरों के आधार पर आगाह किया है। फ्लायन के इस आंखे खोलने वाले बयान पर सेना मुख्यालय फिलहाल कुछ नहीं कहना चाहता। सेना के एक एक शीर्ष अधिकारी के मुताबिक, हम किसी भी चुनौती से निबटने के लिए तैयार हैं। हमारी सेनाएं महफूज हैं। विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी ने चीन की लद्दाख में कोशिशों पर कहा कि हमारे विदेश मंत्री लगातार बयान दे रहे हैं। इसके बाद कुछ और कहने की गुंजाइश नहीं है।

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विदेश मंत्री ने संभाल रखा है मोर्चा
चीन की लद्दाख में कोशिशों को लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फोरम पर अपनी बात कहते हैं। अपने समकक्ष और विदेश मंत्री के साथ-साथ चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार वांग यी से भी लगातार अपना पक्ष रख रहे हैं। हालांकि इस मुद्दे पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ नहीं बोलते। एस जयशंकर जुलाई 2020 से लगातार चीन से अपील कर रहे हैं कि उसे वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास एकतरफा कार्रवाई और अवधारणा बदलने के प्रयासों से बाज आना चाहिए। पैंगोंग झील और अन्य क्षेत्रों से चीन को अपनी सेना को अप्रैल 2020 से पहले वाली स्थिति में ले जाना चाहिए। 
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चीन से आ रहे संकेतों और ताजा स्थिति को देखकर ही उन्होंने 7 जून (मंगलवार) को एक बार फिर दोहराया कि हमारी सीमाओं की सुरक्षा जरूरी है और हम यथास्थिति में एकतरफा तरीके से बदलाव करने के प्रयास को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। एक तथ्य और है कि लद्दाख में चीन के साथ अप्रैल 2020 से पैदा हुए गतिरोध के समाधान के 15 दौर की सैन्य कमांडरों की वार्ता भी हो चुकी है।

तो क्या कर रहा है भारत?
रक्षा मंत्रालय और सेना मुख्यालय के अनुसार हम किसी भी चुनौती से निबटने के लिए तैयार हैं। लद्दाख के इस क्षेत्र में भारत ने 2020 में सैन्य झड़प और चीन की तैयारी के जवाब में 50 हजार से अधिक सैनिकों की तैयारी कर रखी है। किसी भी स्थिति से निबटने के लिए भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना ने हर स्तर का आपरेशनल प्लान तैयार रखा है। सैनिकों को लॉजिस्टिक सपोर्ट से लेकर अन्य सुविधाओं को सरकार ने उच्च स्तर की संवेदनशीलता के साथ लिया है। सैन्य तैयारी, भारत के कब्जे वाले क्षेत्र में निरंतर निगरानी, पेट्रोलिंग और सैनिकों का मनोबल बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। इसके अलावा भारत और चीन दोनों इस बात पर सहमत हैं कि दोनों तरफ के सैन्य बल एक दूसरे को उकसाने वाली कोई कार्रवाई नहीं करेंगे। यथास्थिति का सम्मान करेंगे और सैन्य टकराव से बचेंगे। भारत अपने पड़ोसी, बाहुबली देश चीन को बिना उकसाए और उसकी हर गतिविधि पर नजर रखकर इसी स्थिति का संवेदनशीलता के साथ पालन कर रहा है।

क्या कहते हैं विदेश मामलों के जानकार और राजनयिक
भारत सरकार के विदेश मामलों के पूर्व प्रवक्ता और वरिष्ठ राजनयिक से एक चर्चा के दौरान उनसे पूछा गया कि क्या भारत लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अपने कब्जे वाले क्षेत्र में सैनिकों की तैनाती और जमावड़ा वाली नीति पर ही चलेगा? वरिष्ठ अधिकारी थोड़ा मुस्कराए और फिर हल्के होते हुए बोले कि हमारे सैनिक वहां नहीं तैनात रहेंगे तो चीन के सैनिक गुरूग्राम तक आ सकते हैं। फिर क्या कीजिएगा? दरअसल इस हल्के अंदाज में और सरल भाषा में उन्होंने पूरी सैन्य नीति, विदेश नीति और कूटनीति समझा दी थी। कहने का अर्थ बस इतना कि लद्दाख में चीन के अतिक्रमण में बचा हुआ भू-भाग न जाने के लिए ही भारत ने वहां सैन्य तैनाती की है। भारत इंतजार करो और देखो की रणनीति पर चल रहा है। भारत का कहीं भी मकसद चीन के रुख का आक्रामक सैन्य भाषा में जवाब देना नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार, पूर्व विदेश सचिव शशांक, वायुसेना के पूर्व अधिकारी एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह, पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल बलवीर सिंह संधू, पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल राकेश शर्मा समेत तमाम विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने तो उसी दिन अपना बड़ा नुकसान कर लिया था, जिस दिन भारतीय सैनिकों के कब्जे में आई काला टॉप, हेलमेट टॉप जैसी कैलाश रेंज की पहाडिय़ों को चीन के दबाव पर छोड़ दिया था। अब तो चीन अपनी हेकड़ी दिखा रहा है और हम देख रहे हैं।

क्या कर रहा है चीन?
लद्दाख क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा के उस पार चीन ने काफी मजबूत किलेबंदी की है। लगातार सैन्य तैयारियों को बढ़ा रहा है। उसने सेना के कमांडरों को भी बदला है और अपने निगरानी से लेकर घातक हमले में काम आने वाले ड्रोन की बड़ी संख्या में तैनाती की है। सैन्य लॉजिस्टिक सपोर्ट प्रणाली का बड़े पैमाने पर निर्माण किया। अत्याधुनिक टैंक, तोप, दिन-रात मार करने में सक्षम यूनिट, फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर और सैन्य बेड़ों की तैनाती की है। सड़कों के निर्माण की प्रक्रिया भी चल रही है। अमेरिका के शीर्ष सैन्य कमांडर ने भी चीन की इसी तैयारी को उसकी छिपी मंशा से जोड़कर फिर आगाह किया है। समझा जा रहा है कि भारत के विदेश मंत्रालय के अधिकारी, सेना मुख्यालय, रक्षा मंत्रालय और सुरक्षा तथा खुफिया विभाग को चीन द्वारा की जा रही हरकत की पूरी जानकारी है।

यूक्रेन-रूस  संकट ने भी बांध रखे हैं भारत के हाथ
कूटनीति, विदेश नीति, सैन्य नीति के जानकारों का कहना है कि अफगानिस्तान से अमेरिका की सैन्य वापसी, कोरोना महामारी के संक्रमण, संक्रमण से वैश्विक स्तर पर आर्थिक परिस्थितियों और यूक्रेन में रूस की सेना के घुसने के बाद से अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर जिओपालिटिक्स (भूराजनैतिक स्थिति) काफी बदली है। बताते हैं इस जिओपालिटिक्स में बदलाव का असर भारत-चीन के द्विपक्षीय, क्षेत्रीय रिश्ते पर भी पड़ रहा है। रूस और चीन इस समय काफी करीब हैं और दोनों के समीकरण अमेरिका के अनुकूल नहीं हैं। रूस का साथ देने के कारण भारत और अमेरिका के समीकरणों में भी एक बदलाव की स्थिति महसूस की जा रही है और इससे चीन पर पड़ने वाले दबाव की मात्रा में कुछ गुंजाइश बढ़ी है। ऐसा माना जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार और कारोबार के क्षेत्र में तमाम चुनौतियां झेल रहा चीन भारत से कारोबार और व्यापार तो चाहता है, लेकिन लद्दाख के मुद्दे के समाधान की दिशा में उसके पास या तो हीला हवाली है और या फिर शर्तें। इसके समानांतर भारत के पास रूस का सहयोग और साथ है, लेकिन यह चीन के लिए बाध्यकारी नहीं है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जापान गए थे। क्वॉड सम्मेलन में हिस्सा लेने। वहां अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया के राष्ट्राध्यक्ष भी थे। लेकिन कूटनीति के जानकार मानते हैं अभी क्वॉड से कोई मजबूत संदेश नहीं निकल पाया है। वह कहते हैं कि क्वॉड तो एक लंबी प्रक्रिया है और यूक्रेन में रूस की सेना के घुसने के बाद तमाम परिस्थितियां भी बदली हैं।

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