{"_id":"6a4662e4cd5859538e07ead8","slug":"india-japan-defence-co-develoment-pact-unicorn-project-6th-gen-fighter-jet-to-frigate-and-more-cooperation-2026-07-02","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Explainer: भारत-जापान में रक्षा सह-उत्पादन समझौते पर मुहर, पहला प्रोजेक्ट क्या; आगे किन हथियारों तक जाएगा सफर?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Explainer: भारत-जापान में रक्षा सह-उत्पादन समझौते पर मुहर, पहला प्रोजेक्ट क्या; आगे किन हथियारों तक जाएगा सफर?
Thu, 02 Jul 2026 06:38 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 02 Jul 2026 06:38 PM IST
सार
भारत और जापान के बीच आज अहम द्विपक्षीय समझौते हुए। दोनों देशों के बीच हुए वार्षिक सम्मेलन के बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के अलावा फार्मा सेक्टर से जुड़े समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए गए। हालांकि, जिस एक डील पर दोनों देशों के लोगों की नजर है, वह है रक्षा क्षेत्र में सह-उत्पादन की। दरअसल, जापान अब भारत के साथ मिलकर हथियार की तकनीक को विकसित करने पर जोर दे रहा है। इससे जुड़े एक प्रोजेक्ट का एलान आज पीएम मोदी और जापनी प्रधानमंत्री की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हुआ। आइये जानते हैं इसके बारे में...
विज्ञापन
मोदी-ताकाइची की बैठक में अहम समझौते पर लगी मुहर।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची भारत के दौरे पर हैं। गुरुवार को ताकाइची और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बैठक हुई। इसके बाद दोनों नेताओं ने साझा तौर पर मीडिया को संबोधित किया। इसमें दोनों ही नेताओं ने कई बड़े एलान किए। हालांकि, जो एक समझौता इस वक्त चर्चा में है, वह है दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में सह-उत्पादन से जुड़ा। दरअसल, पीएम मोदी ने खुद इस समझौते के तहत पहले प्रोजेक्ट की जानकरी दी। पीएम ने कहा कि हम क्षेत्र की शांति, नौपरिवहन की सुरक्षा और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए साझा तौर पर रक्षा तकनीक विकसित करेंगे।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत-जापान के बीच जिस रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर की बात सामने आई है, वह क्या है? इसके तहत दोनों देश किस पहले प्रोजेक्ट पर काम करने जा रहे हैं? भारत को इससे क्या मिल सकता है? थलसेना से लेकर वायुसेना और नौसेना तक जापान भविष्य में भारत को किन हथियारों को बनाने में मदद कर सकता है? इसके अलावा भारत किस तरह जापान के लिए मददगार साबित हो सकता है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत-जापान के बीच जिस रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर की बात सामने आई है, वह क्या है? इसके तहत दोनों देश किस पहले प्रोजेक्ट पर काम करने जा रहे हैं? भारत को इससे क्या मिल सकता है? थलसेना से लेकर वायुसेना और नौसेना तक जापान भविष्य में भारत को किन हथियारों को बनाने में मदद कर सकता है? इसके अलावा भारत किस तरह जापान के लिए मददगार साबित हो सकता है? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
क्या है रक्षा सह-उत्पादन समझौता, भारत-जापान के लिए क्यों जरूरी?
रक्षा सह-उत्पादन समझौता एक ऐसी रणनीतिक साझेदारी है जिसके तहत दो या दो से ज्यादा देश सिर्फ तैयार हथियारों की खरीद-बिक्री करने के बजाय, सैन्य उपकरणों, हथियारों और आधुनिक रक्षा तकनीकों का संयुक्त रूप से विकास और निर्माण करते हैं। भारत और जापान के लिए ऐसे किसी भी समझौते के जबरदस्त फायदे हैं...ये भी पढ़ें: India-Japan Summit Highlights: पीएम मोदी बोले- ताकाइची छोटी बहन और दूरदर्शी, जापानी प्रधानमंत्री क्या बोलीं?
तकनीक को साझा तौर पर विकसित करने के मौके
इस समझौते के तहत उन्नत तकनीक वाले देश अपनी विशेषज्ञता दूसरे देश के साथ साझा करते हैं। भारत और जापान के बीच हुआ पहला सह-विकास प्रोजेक्ट यूनिकॉर्न एंटीना मास्ट का है, जिसमें दोनों देश मिलकर उन्नत नौसैनिक तकनीक विकसित करेंगे।
घरेलू रक्षा उद्योग और 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा
भारत के परिप्रेक्ष्य में, सह-उत्पादन समझौते मुख्य रूप से मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत नीतियों को गति देने के लिए किए जाते हैं। इसके जरिए देश के भीतर ही रक्षा औद्योगिक आधार का विस्तार किया जाता है, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और तकनीकी क्षमता बढ़ती है।
विदेशी निर्भरता में कमी हासिल करने का मौका
भारत-जापान के लिए इस समझौते का प्रमुख लक्ष्य किसी एक विदेशी आपूर्तिकर्ता, जैसे ऐतिहासिक रूप से भारत की रूस पर निर्भरता और जापान की अमेरिका पर निर्भरता, को कम करना और रणनीतिक आत्मनिर्भरता हासिल करना है।
रक्षा निर्यातक बनने का अवसर
सह-उत्पादन के जरिए भारत और जापान का मकसद न सिर्फ अपनी सेना के लिए हथियारों का निर्माण करना है, बल्कि अपनी क्षमता बढ़ाकर एक प्रमुख वैश्विक रक्षा निर्यातक बनना भी है। इसका एक सफल उदाहरण भारत और रूस द्वारा सह-उत्पादित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे भारत ने दूसरे देशों को निर्यात करना शुरू कर दिया है।
विश्वास और कूटनीतिक साझेदारी में मजबूती
जापान जैसे देश के साथ हथियार सह-उत्पादन (जैसे संभावित मोगामी-क्लास स्टील्थ फ्रिगेट्स या जेट/टैंक इंजन्स) करना दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास को दर्शाता है। यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग को मबूत करने का एक ताकतवर माध्यम है।
भारत-जापान के लिए इस समझौते का प्रमुख लक्ष्य किसी एक विदेशी आपूर्तिकर्ता, जैसे ऐतिहासिक रूप से भारत की रूस पर निर्भरता और जापान की अमेरिका पर निर्भरता, को कम करना और रणनीतिक आत्मनिर्भरता हासिल करना है।
रक्षा निर्यातक बनने का अवसर
सह-उत्पादन के जरिए भारत और जापान का मकसद न सिर्फ अपनी सेना के लिए हथियारों का निर्माण करना है, बल्कि अपनी क्षमता बढ़ाकर एक प्रमुख वैश्विक रक्षा निर्यातक बनना भी है। इसका एक सफल उदाहरण भारत और रूस द्वारा सह-उत्पादित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे भारत ने दूसरे देशों को निर्यात करना शुरू कर दिया है।
विश्वास और कूटनीतिक साझेदारी में मजबूती
जापान जैसे देश के साथ हथियार सह-उत्पादन (जैसे संभावित मोगामी-क्लास स्टील्थ फ्रिगेट्स या जेट/टैंक इंजन्स) करना दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास को दर्शाता है। यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग को मबूत करने का एक ताकतवर माध्यम है।
भारत-जापान के बीच अहम रक्षा समझौते पर मुहर।
- फोटो : अमर उजाला
भारत-जापान के बीच किस रक्षा सह-उत्पादन समझौते का एलान?
भारत और जापान के बीच रक्षा सह-उत्पादन समझौते के तहत जिस पहले प्रोजेक्ट पर सहमति बनी है, वह नौसैनिक रेडियो एंटीना यूनिकॉर्न (यूनिफाइड कॉम्प्लेक्स रेडियो एंटीना) के साझा-विकास से जुड़ा है। यह दोनों देशों के बीच रक्षा उपकरण विकास के क्षेत्र में पहला संयुक्त प्रोजेक्ट होगा। नवंबर 2024 में भारत और जापान के बीच इस तकनीक के हैंडओवर और सह-विकास के लिए एक कार्यान्वयन ज्ञापन (मेमोरैंडम ऑफ इंप्लिमेंटेशन) पर हस्ताक्षर किए गए थे।
क्या है यूनिकार्न तकनीक, जिससे मजबूत होगी नौसेना?
यूनिकॉर्न तकनीक नौसेना के युद्धपोतों के लिए विकसित एक आधुनिक एंटीना प्रणाली है। भारत और जापान ने इस तकनीक के सह-विकास और उत्पादन के लिए समझौता किया है।
क्या है तकनीक?
- पारंपरिक रूप से युद्धपोतों के डेक पर अलग-अलग जगहों पर कई प्रकार के एंटीना और संचार उपकरण लगे होते हैं। यूनिकॉर्न तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह इन सभी संचार प्रणालियों और एंटीना को एक ही कॉम्पैक्ट ढांचे में एकीकृत कर देती है। इसे औपचारिक तौर पर नोरा-50 भी कहा जाता है।
- कई एंटीना की जगह सिर्फ एक ढांचा होने से जहाज का रडार क्रॉस-सेक्शन काफी कम हो जाता है। इससे जहाज की स्टील्थ क्षमता यानी दुश्मन के रडार से छिपने की खूबी बहुत बढ़ जाती है, जो इसे आधुनिक युद्ध में एक अहम बढ़त दिलाती है।
- इतना ही नहीं यह प्रणाली बैंडविड्थ के इस्तेमाल को और बेहतर स्तर तक पहुंचा देती है, जिससे जहाजों को एक विस्तृत फ्रीक्वेंसी रेंज पर उच्च गति वाली सुरक्षित संचार व्यवस्था की सुविधा मिलती है।
क्या है इसका फायदा?
यूनिकॉर्न मास्ट रियल टाइम में समुद्री निगरानी में बेहद कारगर है। इसके इस्तेमाल से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड देशों के बीच तालमेल बेहतर होगा और नौसेना समुद्री डकैती, अवैध शिकार और अन्य अंतरराष्ट्रीय अपराधों का ज्यादा प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सकेगी। यह हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में भारत की नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर की भूमिका को और मजबूत करेगा।
इस तकनीक की क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका इस्तेमाल जापान के उन्नत मोगामी-क्लास फ्रिगेट्स पर नैविगेशन, डेटा जुटाने और स्टेल्थ ऑपरेशन्स के लिए पहले से ही किया जा रहा है। अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक, इस उन्नत प्रणाली के भारतीय संस्करण का निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), जापान की तीन कंपनियां- योकोहामा रबर, एनईसी कॉर्पोरेशन और सम्पा कोग्यो केके के साथ मिलकर किया जाएगा।
यूनिकॉर्न मास्ट रियल टाइम में समुद्री निगरानी में बेहद कारगर है। इसके इस्तेमाल से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड देशों के बीच तालमेल बेहतर होगा और नौसेना समुद्री डकैती, अवैध शिकार और अन्य अंतरराष्ट्रीय अपराधों का ज्यादा प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सकेगी। यह हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में भारत की नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर की भूमिका को और मजबूत करेगा।
इस तकनीक की क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका इस्तेमाल जापान के उन्नत मोगामी-क्लास फ्रिगेट्स पर नैविगेशन, डेटा जुटाने और स्टेल्थ ऑपरेशन्स के लिए पहले से ही किया जा रहा है। अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक, इस उन्नत प्रणाली के भारतीय संस्करण का निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), जापान की तीन कंपनियां- योकोहामा रबर, एनईसी कॉर्पोरेशन और सम्पा कोग्यो केके के साथ मिलकर किया जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुताबिक, यूनिकॉर्न रेडियो एंटीना का यह सह-विकास प्रोजेक्ट भारत-जापान रक्षा तकनीकी साझेदारी में एक नया अध्याय खोलेगा, जिससे क्षेत्रीय शांति और नियम-आधारित समुद्री सुरक्षा को बल मिलेगा। यह कदम भारत की 'आत्मनिर्भर भारत' पहल और रक्षा आधुनिकीकरण के लिए भी बेहद जरूरी माना जा रहा है, जो उन्नत जापानी तकनीक को भारतीय नौसेना में शामिल करने के रास्ते खोलेगा।
यूनिकॉर्न एंटीना सिस्टम के पहले सह-विकास समझौते के बाद भारत और जापान कई और आधुनिक हथियारों और रक्षा उपकरणों के सह-उत्पादन और विकास पर विचार कर रहे हैं।
1. मोगामी-क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट्स
जापान ने भारतीय शिपयार्ड्स में अपनी अत्यधिक उन्नत मोगामी-क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट्स (छोटे युद्धपोतः के सह-उत्पादन में दिलचस्पी दिखाई है। यह तकनीक नौसेना की समुद्री सुरक्षा को काफी मजबूती प्रदान कर सकती है।
भारत को और किन हथियारों के सह-उत्पादन में मिल सकता है जापान का साथ?
यूनिकॉर्न एंटीना सिस्टम के पहले सह-विकास समझौते के बाद भारत और जापान कई और आधुनिक हथियारों और रक्षा उपकरणों के सह-उत्पादन और विकास पर विचार कर रहे हैं।
1. मोगामी-क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट्स
जापान ने भारतीय शिपयार्ड्स में अपनी अत्यधिक उन्नत मोगामी-क्लास स्टेल्थ फ्रिगेट्स (छोटे युद्धपोतः के सह-उत्पादन में दिलचस्पी दिखाई है। यह तकनीक नौसेना की समुद्री सुरक्षा को काफी मजबूती प्रदान कर सकती है।
भारत-जापान के लिए रक्षा उत्पादन के लिए कई मौके।
- फोटो : अमर उजाला
2. एयरो इंजन और फाइटर जेट्स
भारत के महत्वाकांक्षी पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) प्रोजेक्ट के लिए जापान के सहयोग से एयरो-इंजन विकसित करने पर काम हो रहा है। इसके अलावा, भारत छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने के जापानी-ब्रिटिश-इतालवी प्रोजेक्ट ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (जीकैप) में शामिल होने के लिए भी जापान के साथ बातचीत कर रहा है। अगर यह बातचीत सफल होती है तो आने वाले समय में सह-उत्पादन समझौते के तहत भारत इस तकनीक को भी विकसित कर सकता है।
3. उन्नत प्रोपल्शन सिस्टम और इंजन
दोनों देश अगली पीढ़ी के युद्धपोतों के लिए इलेक्ट्रिकल या हाइब्रिड प्रोपल्शन सिस्टम और ड्रोन्स के लिए इलेक्ट्रिक मोटर्स व हाइब्रिड सिस्टम को मिलकर विकसित करने के अवसर तलाशने शुरू कर दिए हैं। इसके अलावा भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जापानी रक्षा उद्योगों के साथ टैंक के इंजनों के सह-विकास की संभावनाओं पर भी विशेष रूप से जोर दिया है।
भारत के महत्वाकांक्षी पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) प्रोजेक्ट के लिए जापान के सहयोग से एयरो-इंजन विकसित करने पर काम हो रहा है। इसके अलावा, भारत छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने के जापानी-ब्रिटिश-इतालवी प्रोजेक्ट ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (जीकैप) में शामिल होने के लिए भी जापान के साथ बातचीत कर रहा है। अगर यह बातचीत सफल होती है तो आने वाले समय में सह-उत्पादन समझौते के तहत भारत इस तकनीक को भी विकसित कर सकता है।
3. उन्नत प्रोपल्शन सिस्टम और इंजन
दोनों देश अगली पीढ़ी के युद्धपोतों के लिए इलेक्ट्रिकल या हाइब्रिड प्रोपल्शन सिस्टम और ड्रोन्स के लिए इलेक्ट्रिक मोटर्स व हाइब्रिड सिस्टम को मिलकर विकसित करने के अवसर तलाशने शुरू कर दिए हैं। इसके अलावा भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जापानी रक्षा उद्योगों के साथ टैंक के इंजनों के सह-विकास की संभावनाओं पर भी विशेष रूप से जोर दिया है।
4. मानवरहित वाहन और रोबोटिक्स
रक्षा सहयोग के तहत दोनों देश मानवरहित जमीनी वाहनों और सैन्य रोबोटिक्स के निर्माण से जुड़ी परियोजनाओं पर भी काम कर रहे हैं। गौरतलब है कि जापान ने हाल ही में अपने हथियारों के निर्यात से जुड़ी पाबंदियों को हटा दिया था। इससे भारत के मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान को सीधे तौर फायदा हो सकता है, क्योंकि भारत अब जापानी तकनीकी विशेषज्ञता और उनके रक्षा उद्योगों का लाभ उठाकर अपनी सैन्य आत्मनिर्भरता को मजबूत कर सकेगा।
5. पनडुब्बियां और एम्फीबियस विमान
भारतीय नौसेना ने जापान के यूएस-2 एम्फीबियस एयरक्राफ्ट, जो पानी और जमीन दोनों जगह काम कर सकता है को हासिल करने में भी दिलचस्पी दिखाई है। रणनीतिकारों का मानना है कि भारत भविष्य में पनडुब्बियों जैसे प्रमुख सैन्य उपकरणों के निर्माण के लिए भी जापानी सहयोग की उम्मीद कर सकता है।
रक्षा सहयोग के तहत दोनों देश मानवरहित जमीनी वाहनों और सैन्य रोबोटिक्स के निर्माण से जुड़ी परियोजनाओं पर भी काम कर रहे हैं। गौरतलब है कि जापान ने हाल ही में अपने हथियारों के निर्यात से जुड़ी पाबंदियों को हटा दिया था। इससे भारत के मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान को सीधे तौर फायदा हो सकता है, क्योंकि भारत अब जापानी तकनीकी विशेषज्ञता और उनके रक्षा उद्योगों का लाभ उठाकर अपनी सैन्य आत्मनिर्भरता को मजबूत कर सकेगा।
5. पनडुब्बियां और एम्फीबियस विमान
भारतीय नौसेना ने जापान के यूएस-2 एम्फीबियस एयरक्राफ्ट, जो पानी और जमीन दोनों जगह काम कर सकता है को हासिल करने में भी दिलचस्पी दिखाई है। रणनीतिकारों का मानना है कि भारत भविष्य में पनडुब्बियों जैसे प्रमुख सैन्य उपकरणों के निर्माण के लिए भी जापानी सहयोग की उम्मीद कर सकता है।
जापान को रक्षा सह-उत्पादन समझौते से क्या मिल सकता है?
भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग केवल भारत के लिए ही फायदेमंद नहीं है, बल्कि यह साझेदारी जापान के रणनीतिक और आर्थिक हितों के लिए भी बेहद अहम है। खासकर हालिया भू-राजनीतिक बदलावों के बीच।1. जापानी रक्षा उद्योग के लिए एक विशाल बाजार
जापान ने हाल ही में हथियारों के निर्यात पर लगी अपनी 80 साल पुराना पाबंदी हटा ली। लंबे समय तक बाजार की कमी के कारण जापानी रक्षा उद्योग सीमित था, लेकिन अब वे अपने उन्नत हथियारों को वैश्विक बाजार में बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा बाजारों में से एक है। इस साझेदारी से जापानी कंपनियों को अपने उन्नत सिस्टम, जैसे मोगामी-क्लास फ्रिगेट्स, यूनिकॉर्न मास्ट, इंजन आदि को भारत को बेचने का एक बहुत बड़ा अवसर मिलेगा।
2. भारत में निर्माण कर वैश्विक निर्यात की संभावना
भारत के पास 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत एक तेजी से बढ़ता रक्षा औद्योगिक आधार है, जहां निजी कंपनियां भी आधुनिक हथियार बना रही हैं। जापान, भारत के साथ सह-उत्पादन करके न केवल भारत के लिए हथियार बना सकता है, बल्कि भविष्य में भारत में निर्मित इन उपकरणों को तीसरे देशों को निर्यात करने की संभावना भी तलाश सकता है।
रक्षा खर्च में कहां भारत और जापान।
- फोटो : अमर उजाला
3. हिंद महासागर में ऊर्जा और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा
जापान अपनी ऊर्जा जरूरतों के आयात के लिए मुख्य रूप से समुद्री मार्गों, खासकर मलक्का जलडमरूमध्य और हिंद महासागर पर निर्भर है। भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर यानी सुरक्षा देने वाली शक्ति के रूप में एक मजबूत और प्रभावी भूमिका निभाता है। भारत की नौसैनिक ताकत और समुद्री निगरानी क्षमता, जैसे- यूनिकॉर्न मास्ट से मिलने वाली स्टेल्थ क्षमता का फायदा उठाकर जापान अपने इन अहम व्यापारिक और ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा को और पुख्ता कर सकता है।
4. चीन के प्रभाव को संतुलित करना
जापान के लिए सबसे बड़ा खतरा चीन है, जो पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर में लगातार आक्रामक रुख अपना रहा है। इसके अलावा जापान दशकों से आर्थिक रूप से भी चीन पर निर्भर रहा है, जिसे वह अब कम करना चाहता है। भारत के साथ मजबूत रक्षा संबंध स्थापित करने से जापान को स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत के अपने विजन को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। हिंद महासागर में भारत और जापान की रणनीतिक साझेदारी से चीन का सामरिक दायरा कम हो सकता है।
जापान अपनी ऊर्जा जरूरतों के आयात के लिए मुख्य रूप से समुद्री मार्गों, खासकर मलक्का जलडमरूमध्य और हिंद महासागर पर निर्भर है। भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर यानी सुरक्षा देने वाली शक्ति के रूप में एक मजबूत और प्रभावी भूमिका निभाता है। भारत की नौसैनिक ताकत और समुद्री निगरानी क्षमता, जैसे- यूनिकॉर्न मास्ट से मिलने वाली स्टेल्थ क्षमता का फायदा उठाकर जापान अपने इन अहम व्यापारिक और ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा को और पुख्ता कर सकता है।
4. चीन के प्रभाव को संतुलित करना
जापान के लिए सबसे बड़ा खतरा चीन है, जो पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर में लगातार आक्रामक रुख अपना रहा है। इसके अलावा जापान दशकों से आर्थिक रूप से भी चीन पर निर्भर रहा है, जिसे वह अब कम करना चाहता है। भारत के साथ मजबूत रक्षा संबंध स्थापित करने से जापान को स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत के अपने विजन को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। हिंद महासागर में भारत और जापान की रणनीतिक साझेदारी से चीन का सामरिक दायरा कम हो सकता है।
5. सुरक्षा साझेदारियों को विविध करने में आसानी
ऐतिहासिक रूप से जापान अपनी सुरक्षा और रक्षा जरूरतों के लिए पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर रहा है। हालांकि, अमेरिकी रुख में उतार-चढ़ाव को देखते हुए, जापान को अपनी सुरक्षा नीति की समीक्षा करने और नए विश्वसनीय साझेदार खोजने की जरूरत महसूस हुई है। भारत जैसे विशाल और लोकतांत्रिक देश के साथ रक्षा संबंध बनाकर, जापान अपनी साझेदारियों का सफलता के साथ विविधीकरण कर सकता है। इससे दोनों देश मिलकर एक बहुध्रुवीय एशिया के निर्माण में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
ऐतिहासिक रूप से जापान अपनी सुरक्षा और रक्षा जरूरतों के लिए पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर रहा है। हालांकि, अमेरिकी रुख में उतार-चढ़ाव को देखते हुए, जापान को अपनी सुरक्षा नीति की समीक्षा करने और नए विश्वसनीय साझेदार खोजने की जरूरत महसूस हुई है। भारत जैसे विशाल और लोकतांत्रिक देश के साथ रक्षा संबंध बनाकर, जापान अपनी साझेदारियों का सफलता के साथ विविधीकरण कर सकता है। इससे दोनों देश मिलकर एक बहुध्रुवीय एशिया के निर्माण में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।