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Artifical Intelligence: मच्छर मारने के लिए रिवॉल्वर क्यों? महंगे विदेशी हार्डवेयर का विकल्प मितव्ययी एआई
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सार
Artifical Intelligence: भारत एआई की वैश्विक जंग में गंभीर रूप से उतर चुका है और अपने विशाल डाटा और 100 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स के दम पर आत्मनिर्भर मॉडल विकसित कर रहा है। एआई का इस्तेमाल छात्रों को मातृभाषा में पढ़ाने और शिक्षकों की ट्रेनिंग में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए किया जा रहा है, ताकि पारंपरिक पद्धतियों का सुधार हो। पढ़ें रिपोर्ट-
विनीत जोशी, वी. कामकोटि
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट/केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय/एक्स
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विस्तार
दुनिया के नक्शे पर एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की जंग छिड़ी हुई है। एक तरफ चैट जीपीटी और जेमिनाई जैसे वैश्विक दिग्गज हैं, तो दूसरी तरफ भारत अपनी विविधता और डाटा की शक्ति के साथ मैदान में उतर चुका है। क्या एआई भारत की नौकरियों को निगल जाएगा? क्या हम सिलिकॉन वैली का सिर्फ एक क्लोन बनकर रह जाएंगे? दिल्ली में भारत मंडपम में 16 फरवरी से 19 फरवरी आयोजित एआई सम्मेलन एआई की जंग में भारत की एक बड़ी गर्जना के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं पर अमर उजाला के लिए राजकिशोर ने आईआईटी मद्रास के निदेशक पद्मश्री डॉ. वी. कामकोटी और भारत सरकार के उच्च शिक्षा विभाग सचिव विनीत जोशी से खास बातचीत की। डा. कामकोटी के नेतृत्व में आईआईटी मद्रास भारत के एआई क्षितिज के विस्तार में जुटी है, वहीं मोदी सरकार की तरफ से आई के लिए नीतियों को मूर्त रूप विनीत जोशी दे रहे हैं। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश...
एआई गंभीर नहीं, ‘सुपर सीरियस’:
एआई के भविष्य को लेकर भारत कितना गंभीर है? क्या हम सिर्फ फौरी तौर पर इसमें शामिल हैं? इस सवाल पर वी. कामकोटि ने कहा कि हम सिर्फ गंभीर नहीं, ‘सुपर सीरियस’ हैं। एआई के लिए दो चीजें ऑक्सीजन हैं। एक डाटा और दूसरा यूजर्स। हमारे पास 150 करोड़ की आबादी और 100 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स हैं। यूपीआई, स्मार्ट सिटी और हेल्थ सेक्टर का हमारा डाटा सेट दुनिया के लिए ईर्ष्या का विषय है। प्रधानमंत्री मोदी का विजन स्पष्ट है कि एआई का मतलब ‘एस्पायरिंग इंडिया’ और ‘एडवांटेज इंडिया’। बड़े इनोवेशन अब पश्चिम में नहीं, भारत की मिट्टी में होंगे।
चीन के ‘डीपसीक’ ने हलचल मचा दी है, भारत कहां खड़ा है? इस पर कामकोटि ने कहा कि रैंकिंग स्कोर जिसमें, भारत 21.59 और अमेरिका 78.6 को मैं पूरी तरह सही नहीं मानता... क्योंकि यह सामाजिक प्रभाव को नहीं मापता। चीन ने ‘डीपसीक’ के जरिए कम कंप्यूट पावर में बड़ा मॉडल बनाकर दुनिया को चौंकाया, लेकिन भारत उससे भी आगे की सोच रहा है। हम ‘लाइफ आफ्टर जीपीयू’ पर काम कर रहे हैं। अभी हम जीपीयू के लिए विदेशों पर निर्भर हैं, लेकिन हमारे संस्थान ऐसे सॉफ्टवेयर बना रहे हैं जो साधारण प्रोसेसर पर भी दौड़ेंगे। ‘मच्छर मारने के लिए रिवॉल्वर (जीपीयू) की जरूरत नहीं’, हम मितव्ययी और सटीक मॉडल बना रहे हैं।
मैकाले की पद्धति का अंत शिक्षा में एआई क्रांति
एआई से शिक्षा और गवर्नेंस में क्या बदलाव आएगा? क्या ‘बोधन एआई’ जैसे प्रोजेक्ट्स सफल होंगे? इस पर विनीत जोशी ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इसकी नींव पहले ही रख दी गई थी। हमारा लक्ष्य है कि चेन्नई का श्रेष्ठ शिक्षक मणिपुर के गांव में भी पढ़ा सके। एआई के माध्यम से छात्र अपनी मातृभाषा में जटिल विषय समझ सकेंगे। यह मैकाले की एकतरफा शिक्षा पद्धति को जड़ से खत्म कर ‘वाद-विवाद’ और ‘संवाद’ की भारतीय परंपरा को वापस लाएगा। ‘बोधन एआई’ जल्द ही शिक्षा का ‘यूपीआई’ बनेगा, जो शिक्षकों की ट्रेनिंग और छात्रों के मूल्यांकन में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।
सॉवरेन मॉडल : डाटा की सुरक्षा और सांस्कृतिक सत्यता
क्या ‘भारतजन’ और ‘सर्वम’ जैसे स्वदेशी मॉडल ‘चैट जीपीटी’ को टक्कर दे पाएंगे? कामकोटि ने कहा- बिल्कुल। ‘भारतजन’ और ‘सर्वम’ ने वॉयस और इंडिक ओसीआर में दिग्गजों को धूल चटाई है। विदेशी मॉडल भारत का ‘कॉन्टेक्स्ट’ नहीं समझते। हमारी ताकत अनेकता में एकता है। एक ही भाषा के कई डायलेक्ट्स (बोलियां) हमारे डाटा को दुनिया में सबसे मजबूत बनाते हैं। हमें ‘सॉवरेन मॉडल’ चाहिए ताकि हमारे बच्चों को वही सिखाया जाए जो हमारे देश का विचार और संस्कृति है।
मानवता और खतरे: नौकरियां और न्यूरोप्लास्टिसिटी
एआई से नौकरियां जाने का डर है और ‘डीपफेक’ जैसे खतरे भी बड़े हैं, सुरक्षा क्या है? विनीत जोशी ने कहा कि खतरा अत्यधिक निर्भरता का है। ऐसा न हो कि बच्चे खुद सोचना छोड़ दें। इसलिए हम पढ़ाने के तरीके बदल रहे हैं। अब क्लास में सिर्फ ‘डिस्कशन’ होगा, रटना नहीं। सरकार ‘सेफ एंड एथिकल यूज’ के लिए गंभीर है। ‘इंडिया एआई मिशन’ में ‘सेफ एंड एथिकल एआई’ के लिए विशेष वर्टिकल है। हम तकनीक को ‘ह्यूमन-सेंट्रिक’ रख रहे हैं।
उन्होंने कहा, तकनीकी तौर पर भी हम सावधान हैं। एआई इंसान का विकल्प नहीं, बल्कि उसका 'को-पायलट' बनेगा। चाहे डॉक्टर हो या टीचर, एआई उसे सपोर्ट करेगा, रिप्लेस नहीं। तकनीक 'न्यूरोप्लास्टिसिटी' को प्रभावित करती है। एआई पर निर्भरता सोचने की क्षमता कम न कर दे। इसीलिए हम आईआईटी में 'डिजिटल डिटॉक्सिफिकेशन' काउंसलर रख रहे हैं। एआई डॉक्टर या टीचर का विकल्प नहीं, बल्कि उनका 'को-पायलट' बनेगा।
डॉ. वी. कामकोटी ने कहा, 'जीपीयू (GPU) की निर्भरता खत्म करना ही हमारा अगला बड़ा अनुसंधान है। हार्डवेयर पावरफुल नहीं होगा तो हमारा सॉफ्टवेयर पावरफुल होगा।' विनीत जोशी ने कहा, 'एआई का मतलब नौकरियों का जाना नहीं, बल्कि शिक्षा का लोकतंत्रीकरण है। यह डिजिटल डिवाइड को पाटकर हर गरीब बच्चे तक ज्ञान पहुंचाएगा।'
ये भी पढ़ें: एआई इम्पैक्ट सम्मेलन 2026: विश्व के 20 शीर्ष नेता करेंगे शिरकत, पीएम मोदी ने दिया इन दिग्गजों को आमंत्रण
कुछ त्वरित सवाल
भारत का एआई भविष्य एक शब्द में?
जवाब- समावेशी और न्यायसंगत।
विदेशी मॉडल्स की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
जवाब- वे भारतीय 'कॉन्टेक्स्ट' और 'संस्कृति' को नहीं समझते।
एआई सबसे बड़ा अवसर या खतरा?
जवाब- मानवता के लिए अब तक का सबसे बड़ा 'अवसर'।
2047 तक भारत एआई सुपरपावर बनेगा?
जवाब- मेरा मानना है कि हम 2037 तक ही यह मुकाम पा लेंगे।
युवाओं के लिए पहली स्किल क्या होनी चाहिए?
जवाब- नैतिकता, डेटा साइंस और गणित।
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एआई गंभीर नहीं, ‘सुपर सीरियस’:
एआई के भविष्य को लेकर भारत कितना गंभीर है? क्या हम सिर्फ फौरी तौर पर इसमें शामिल हैं? इस सवाल पर वी. कामकोटि ने कहा कि हम सिर्फ गंभीर नहीं, ‘सुपर सीरियस’ हैं। एआई के लिए दो चीजें ऑक्सीजन हैं। एक डाटा और दूसरा यूजर्स। हमारे पास 150 करोड़ की आबादी और 100 करोड़ स्मार्टफोन यूजर्स हैं। यूपीआई, स्मार्ट सिटी और हेल्थ सेक्टर का हमारा डाटा सेट दुनिया के लिए ईर्ष्या का विषय है। प्रधानमंत्री मोदी का विजन स्पष्ट है कि एआई का मतलब ‘एस्पायरिंग इंडिया’ और ‘एडवांटेज इंडिया’। बड़े इनोवेशन अब पश्चिम में नहीं, भारत की मिट्टी में होंगे।
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चीन के ‘डीपसीक’ ने हलचल मचा दी है, भारत कहां खड़ा है? इस पर कामकोटि ने कहा कि रैंकिंग स्कोर जिसमें, भारत 21.59 और अमेरिका 78.6 को मैं पूरी तरह सही नहीं मानता... क्योंकि यह सामाजिक प्रभाव को नहीं मापता। चीन ने ‘डीपसीक’ के जरिए कम कंप्यूट पावर में बड़ा मॉडल बनाकर दुनिया को चौंकाया, लेकिन भारत उससे भी आगे की सोच रहा है। हम ‘लाइफ आफ्टर जीपीयू’ पर काम कर रहे हैं। अभी हम जीपीयू के लिए विदेशों पर निर्भर हैं, लेकिन हमारे संस्थान ऐसे सॉफ्टवेयर बना रहे हैं जो साधारण प्रोसेसर पर भी दौड़ेंगे। ‘मच्छर मारने के लिए रिवॉल्वर (जीपीयू) की जरूरत नहीं’, हम मितव्ययी और सटीक मॉडल बना रहे हैं।
मैकाले की पद्धति का अंत शिक्षा में एआई क्रांति
एआई से शिक्षा और गवर्नेंस में क्या बदलाव आएगा? क्या ‘बोधन एआई’ जैसे प्रोजेक्ट्स सफल होंगे? इस पर विनीत जोशी ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इसकी नींव पहले ही रख दी गई थी। हमारा लक्ष्य है कि चेन्नई का श्रेष्ठ शिक्षक मणिपुर के गांव में भी पढ़ा सके। एआई के माध्यम से छात्र अपनी मातृभाषा में जटिल विषय समझ सकेंगे। यह मैकाले की एकतरफा शिक्षा पद्धति को जड़ से खत्म कर ‘वाद-विवाद’ और ‘संवाद’ की भारतीय परंपरा को वापस लाएगा। ‘बोधन एआई’ जल्द ही शिक्षा का ‘यूपीआई’ बनेगा, जो शिक्षकों की ट्रेनिंग और छात्रों के मूल्यांकन में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।
सॉवरेन मॉडल : डाटा की सुरक्षा और सांस्कृतिक सत्यता
क्या ‘भारतजन’ और ‘सर्वम’ जैसे स्वदेशी मॉडल ‘चैट जीपीटी’ को टक्कर दे पाएंगे? कामकोटि ने कहा- बिल्कुल। ‘भारतजन’ और ‘सर्वम’ ने वॉयस और इंडिक ओसीआर में दिग्गजों को धूल चटाई है। विदेशी मॉडल भारत का ‘कॉन्टेक्स्ट’ नहीं समझते। हमारी ताकत अनेकता में एकता है। एक ही भाषा के कई डायलेक्ट्स (बोलियां) हमारे डाटा को दुनिया में सबसे मजबूत बनाते हैं। हमें ‘सॉवरेन मॉडल’ चाहिए ताकि हमारे बच्चों को वही सिखाया जाए जो हमारे देश का विचार और संस्कृति है।
मानवता और खतरे: नौकरियां और न्यूरोप्लास्टिसिटी
एआई से नौकरियां जाने का डर है और ‘डीपफेक’ जैसे खतरे भी बड़े हैं, सुरक्षा क्या है? विनीत जोशी ने कहा कि खतरा अत्यधिक निर्भरता का है। ऐसा न हो कि बच्चे खुद सोचना छोड़ दें। इसलिए हम पढ़ाने के तरीके बदल रहे हैं। अब क्लास में सिर्फ ‘डिस्कशन’ होगा, रटना नहीं। सरकार ‘सेफ एंड एथिकल यूज’ के लिए गंभीर है। ‘इंडिया एआई मिशन’ में ‘सेफ एंड एथिकल एआई’ के लिए विशेष वर्टिकल है। हम तकनीक को ‘ह्यूमन-सेंट्रिक’ रख रहे हैं।
उन्होंने कहा, तकनीकी तौर पर भी हम सावधान हैं। एआई इंसान का विकल्प नहीं, बल्कि उसका 'को-पायलट' बनेगा। चाहे डॉक्टर हो या टीचर, एआई उसे सपोर्ट करेगा, रिप्लेस नहीं। तकनीक 'न्यूरोप्लास्टिसिटी' को प्रभावित करती है। एआई पर निर्भरता सोचने की क्षमता कम न कर दे। इसीलिए हम आईआईटी में 'डिजिटल डिटॉक्सिफिकेशन' काउंसलर रख रहे हैं। एआई डॉक्टर या टीचर का विकल्प नहीं, बल्कि उनका 'को-पायलट' बनेगा।
डॉ. वी. कामकोटी ने कहा, 'जीपीयू (GPU) की निर्भरता खत्म करना ही हमारा अगला बड़ा अनुसंधान है। हार्डवेयर पावरफुल नहीं होगा तो हमारा सॉफ्टवेयर पावरफुल होगा।' विनीत जोशी ने कहा, 'एआई का मतलब नौकरियों का जाना नहीं, बल्कि शिक्षा का लोकतंत्रीकरण है। यह डिजिटल डिवाइड को पाटकर हर गरीब बच्चे तक ज्ञान पहुंचाएगा।'
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कुछ त्वरित सवाल
भारत का एआई भविष्य एक शब्द में?
जवाब- समावेशी और न्यायसंगत।
विदेशी मॉडल्स की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
जवाब- वे भारतीय 'कॉन्टेक्स्ट' और 'संस्कृति' को नहीं समझते।
एआई सबसे बड़ा अवसर या खतरा?
जवाब- मानवता के लिए अब तक का सबसे बड़ा 'अवसर'।
2047 तक भारत एआई सुपरपावर बनेगा?
जवाब- मेरा मानना है कि हम 2037 तक ही यह मुकाम पा लेंगे।
युवाओं के लिए पहली स्किल क्या होनी चाहिए?
जवाब- नैतिकता, डेटा साइंस और गणित।
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