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असमानता: ग्रामीण भारत में 10% के पास 44 फीसदी भूमि, 46 फीसदी परिवार भूमिहीन; रिपोर्ट में खुलासा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: Nirmal Kant
Updated Sun, 12 Apr 2026 05:33 AM IST
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सार
ग्रामीण भारत में जमीन के मालिकाना हक को लेकर गहरी असमानता सामने आई है, जहां बड़ी आबादी भूमिहीन है और सीमित परिवारों के पास अधिकांश कृषि भूमि केंद्रित है। वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब की ताजा रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। पढ़िए रिपोर्ट-
भूमिहीन किसान। (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला (फाइल)
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विस्तार
देश ग्रामीण इलाकों में जमीन के स्वामित्व को लेकर गहरी असमानता सामने आई है। वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब की ताजा रिपोर्ट लैंड इनइक्वालिटी इन इंडिया: नेचर, हिस्ट्री एंड मार्केट्स के अनुसार देश के करीब 46 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास अपनी कोई जमीन नहीं है, जबकि महज 10 फीसदी लोगों के पास 44 फीसदी कृषि भूमि केंद्रित है।
इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि केवल 1 फीसदी सबसे संपन्न तबके के पास 18 फीसदी जमीन का नियंत्रण है। इसका अर्थ यह है कि ग्रामीण भारत की एक बड़ी आबादी या तो दूसरों की जमीन पर निर्भर है या मजदूरी के सहारे जीवन यापन कर रही है। अध्ययन में देश के लगभग 2.7 लाख गांवों और 65 करोड़ लोगों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, जिससे यह भारत में भू-स्वामित्व पर अब तक के सबसे व्यापक अध्ययनों में से एक बन जाता है। रिपोर्ट के अनुसार भूमि का यह असमान बंटवारा केवल आर्थिक कारकों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्राकृतिक परिस्थितियां, ऐतिहासिक व्यवस्थाएं और बाजार की भूमिका भी शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के अलग-अलग राज्यों में जमीन के वितरण का पैटर्न इतना भिन्न है कि यह अंतर कई देशों के बीच पाई जाने वाली असमानता के बराबर है।
सबसे अधिक असमानता उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में देखने को मिलती है, जहां औपनिवेशिक दौर की जमींदारी प्रथा और सामाजिक संरचना का असर आज भी बना हुआ है। इन राज्यों में जमीन का बड़ा हिस्सा सीमित परिवारों के पास केंद्रित है, जबकि बड़ी आबादी भूमिहीन या सीमांत किसान के रूप में मौजूद है।
इसके विपरीत, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में अपेक्षाकृत बेहतर भूमि वितरण की स्थिति सामने आती है। रिपोर्ट के अनुसार, इन राज्यों में भूमि सुधार (लैंड रिफॉर्म) और किरायेदारी कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन ने असमानता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
बाजार और विकास की सीमाएं
रिपोर्ट के अनुसार सड़क, बाजार और शहरों की नजदीकी जैसी आधुनिक विकास की सुविधाएं भी भूमि असमानता को कम करने में पूरी तरह सफल नहीं रही हैं। जिन क्षेत्रों में बेहतर कनेक्टिविटी और बाजार की पहुंच है, वहां भी जमीन का असमान बंटवारा बड़े पैमाने पर कायम है। कई गांवों में एक बड़ा जमींदार औसतन 12 फीसदी जमीन का मालिक है, जबकि कुछ मामलों में एक व्यक्ति आधे से अधिक भू-भाग पर नियंत्रण रखता है। रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि जिन गांवों में भूमि असमानता अपेक्षाकृत कम है, वहां बुनियादी विकास जैसे सड़क और शिक्षा सुविधाएं बेहतर दिखाई देती हैं।
ये भी पढ़ें: प्रशासनिक सुधार या सियासी रार: तमिलनाडु में SIR के तहत मतदाता सूची से अधिक नाम कटे, पर सियासी उबाल बंगाल में
बढ़ता जा रहा अमीर और गरीब देशों में अंतर
विश्व निकाय की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमीर-गरीब देशों के बीच बढ़ती खाई घटाने के लिए वैश्विक वित्तीय संस्थानों में बड़े सुधारों पर गत वर्ष सहमति बनीं। लेकिन इन ऐतिहासिक फैसलों के पूरा न होने से जहां समृद्ध राष्ट्र और मजबूत होते जा रहे हैं, वहीं गरीब देश विकास की दौड़ में पीछे छूटते जा रहे हैं। यूएन में आर्थिक-सामाजिक मामलों के अवर महासचिव ली जुनहुआ ने कहा, गरीब देशों की विकास मदद में सबसे बड़ी 59% गिरावट अमेरिका की ओर से हुई।
संयुक्त राष्ट्र अवर महासचिव ली जुनहुआ ने कहा, 2025 में 25 देशों ने गरीब राष्ट्रों के लिए अपनी विकास सहायता काटी, जिसके चलते 2024 की तुलना में कुल 23% की गिरावट दर्ज की गई। सबसे बड़ी 59% की गिरावट अमेरिका की ओर से देखी गई। ली ने यह भी कहा कि प्रारंभिक आंकड़ों के आधार पर 2026 में इसमें और 5.8 प्रतिशत की गिरावट आने की आशंका है, जो वैश्विक सहयोग के सामने नई चुनौतियों की ओर संकेत करती है।
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इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि केवल 1 फीसदी सबसे संपन्न तबके के पास 18 फीसदी जमीन का नियंत्रण है। इसका अर्थ यह है कि ग्रामीण भारत की एक बड़ी आबादी या तो दूसरों की जमीन पर निर्भर है या मजदूरी के सहारे जीवन यापन कर रही है। अध्ययन में देश के लगभग 2.7 लाख गांवों और 65 करोड़ लोगों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, जिससे यह भारत में भू-स्वामित्व पर अब तक के सबसे व्यापक अध्ययनों में से एक बन जाता है। रिपोर्ट के अनुसार भूमि का यह असमान बंटवारा केवल आर्थिक कारकों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्राकृतिक परिस्थितियां, ऐतिहासिक व्यवस्थाएं और बाजार की भूमिका भी शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के अलग-अलग राज्यों में जमीन के वितरण का पैटर्न इतना भिन्न है कि यह अंतर कई देशों के बीच पाई जाने वाली असमानता के बराबर है।
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सबसे अधिक असमानता उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में देखने को मिलती है, जहां औपनिवेशिक दौर की जमींदारी प्रथा और सामाजिक संरचना का असर आज भी बना हुआ है। इन राज्यों में जमीन का बड़ा हिस्सा सीमित परिवारों के पास केंद्रित है, जबकि बड़ी आबादी भूमिहीन या सीमांत किसान के रूप में मौजूद है।
इसके विपरीत, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में अपेक्षाकृत बेहतर भूमि वितरण की स्थिति सामने आती है। रिपोर्ट के अनुसार, इन राज्यों में भूमि सुधार (लैंड रिफॉर्म) और किरायेदारी कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन ने असमानता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
बाजार और विकास की सीमाएं
रिपोर्ट के अनुसार सड़क, बाजार और शहरों की नजदीकी जैसी आधुनिक विकास की सुविधाएं भी भूमि असमानता को कम करने में पूरी तरह सफल नहीं रही हैं। जिन क्षेत्रों में बेहतर कनेक्टिविटी और बाजार की पहुंच है, वहां भी जमीन का असमान बंटवारा बड़े पैमाने पर कायम है। कई गांवों में एक बड़ा जमींदार औसतन 12 फीसदी जमीन का मालिक है, जबकि कुछ मामलों में एक व्यक्ति आधे से अधिक भू-भाग पर नियंत्रण रखता है। रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि जिन गांवों में भूमि असमानता अपेक्षाकृत कम है, वहां बुनियादी विकास जैसे सड़क और शिक्षा सुविधाएं बेहतर दिखाई देती हैं।
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बढ़ता जा रहा अमीर और गरीब देशों में अंतर
विश्व निकाय की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमीर-गरीब देशों के बीच बढ़ती खाई घटाने के लिए वैश्विक वित्तीय संस्थानों में बड़े सुधारों पर गत वर्ष सहमति बनीं। लेकिन इन ऐतिहासिक फैसलों के पूरा न होने से जहां समृद्ध राष्ट्र और मजबूत होते जा रहे हैं, वहीं गरीब देश विकास की दौड़ में पीछे छूटते जा रहे हैं। यूएन में आर्थिक-सामाजिक मामलों के अवर महासचिव ली जुनहुआ ने कहा, गरीब देशों की विकास मदद में सबसे बड़ी 59% गिरावट अमेरिका की ओर से हुई।
संयुक्त राष्ट्र अवर महासचिव ली जुनहुआ ने कहा, 2025 में 25 देशों ने गरीब राष्ट्रों के लिए अपनी विकास सहायता काटी, जिसके चलते 2024 की तुलना में कुल 23% की गिरावट दर्ज की गई। सबसे बड़ी 59% की गिरावट अमेरिका की ओर से देखी गई। ली ने यह भी कहा कि प्रारंभिक आंकड़ों के आधार पर 2026 में इसमें और 5.8 प्रतिशत की गिरावट आने की आशंका है, जो वैश्विक सहयोग के सामने नई चुनौतियों की ओर संकेत करती है।
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