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Tamil Nadu: तमिलनाडु में हिंदी राजनीतिक प्रक्षेपास्त्र...साइन बोर्ड से संसद तक लंबी सियासत

उपमिता वाजपेयी, अमर उजाला Published by: Nitin Gautam Updated Sun, 12 Apr 2026 04:29 AM IST
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सार

हिंदी विरोध को लेकर आत्मदाह तक हुए, जेल में मौतें हुईं तो सरकार भी गिरी। राजनीति में यह अब भी पहचान और अधिकार का सवाल है और एक मजबूत प्रक्षेपास्त्र भी।
 

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तमिलनाडु में हिंदी की राजनीति - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

मरीना बीच का हाथ थामे चलती चेन्नई की सबसे खूबसूरत सड़क, कामराजार सलाई। मद्रास यूनिवर्सिटी से लाइट हाउस तक रास्ता बताते हरे साइनबोर्ड, लेकिन इन बोर्ड पर भाषा सीमित है, तमिल और कहीं-कहीं अंग्रेज़ी। हिंदी लगभग गायब। ये साइनबोर्ड सिर्फ रास्ता नहीं दिखाते, बल्कि तमिलनाडु की उस भाषाई राजनीति की ट्रॉफी हैं, जिसे लेकर मनमुटाव आजादी के बहुत पहले शुरु हो गया था।
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मद्रास यूनिवर्सिटी में हिंदी की विभागाध्यक्ष डॉ. चिट्टी अन्नपूर्णा कहती हैं, 1937 में मद्रास प्रेसिडेंसी के गवर्नर राजगोपालाचार्य ने पहली बार तमिलनाडु में स्कूलों में हिंदी अनिवार्य किया था। उस वक्त राजनीतिक दल डीएमके-अन्नाद्रमुक नहीं थे। लेकिन करुणानिधि और तमिल आंदोलन से जुड़े ईवी रामास्वामी उर्फ पेरियार ने इसका विरोध किया। प्रदर्शन करने वाले 1100 लोगों को गिरफ्तार किया गया। दो लोग जिन्हें जेल भेजा गया था, उनकी वहीं मौत हो गई और 1940 में यह फैसला वापस लेना पड़ा। चेन्नई के एग्मोर स्टेशन के पास तमिलनाडु सरकार की प्रमुख इमारत है। जिसका नाम उन्हीं भाषा शहीदों के नाम पर थलमथु नटराजन मालिगई रखा गया।
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फिर आया संविधान। 1965 में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला। इसे तमिलनाडु में लागू करने की कोशिश में फिर से विरोध प्रदर्शन शुरु हो गए। इतिहास के प्रोफेसर कहते हैं, कांग्रेस के टीटी कृष्णमाचारी कहते थे कि यूपी वालों को तय करना होगा कि उन्हें पूरा भारत चाहिए या सिर्फ हिंदी वाला भारत। तभी तय हुआ कि 15 साल तक हिंदी और अंग्रेजी दोनों भारत की आधिकारिक भाषाएं होंगी। तमिलनाडु में भाषा की जंग सिर्फ विधानसभा और लोकसभा में ही नहीं लड़ी गई। सबसे पहले 1916 में रेडियो का नाम संस्कृत के शब्द आकाशवाणी करने पर दो युवा भूख हड़ताल पर बैठ गए थे। जब 1967 में डीएमके सरकार आई, तो रेडियो का नाम तमिल में वानोली कर दिया।

तमिलनाडु में हिंदी विरोध का इतिहास 
इससे पहले कांग्रेसी सीएम भक्तवत्सलम त्रिभाषीय फॉर्मूला लेकर मद्रास विधानसभा पहुंचे। विरोध फिर होने लगे। इस बार कॉलेज के छात्रों के कंधे पर इसकी कमान थी। तिरुची के चिन्नास्वामी ने आत्मदाह कर लिया। और भी लोग आत्महिंसा करने लगे। 25 जनवरी, 1965 को आधिकारिक भाषा एक्ट लागू हुआ, तो तमिलनाडु में शोक मनाया गया। भक्तवत्सल ने इसे ईशनिंदा करार दे डाला। दो हफ्ते के प्रदर्शन में 70 लोगों की जान चली गई। तमिलनाडु से कांग्रेस के केंद्रीय मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया। फरवरी, 1965 में ऐलान किया कि तमिल और अंग्रेजी ही राज्य की आधिकारिक भाषा होंगी। 1965 में कांग्रेस राज्य में चुनाव हार गई। यह थी भाषा की ताकत, या यूं कहें कमजोरी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति से फिर गरमाया मुद्दा
2019 में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति का ड्राफ्ट आया, तो फिर पुराने विवाद पिछले पन्नों को पलटकर याद दिलाए जाने लगे। इंतहा ऐसी कि केंद्र को स्पष्टीकरण देना पड़ा। यह मुद्दा इतने वर्षों तक चुप रहा, लेकिन खत्म कभी नहीं हुआ। हिंदी में एमए करनेवाली मदुरै की विद्या कहती हैं, उन्हें लगा कि हिंदी में पढ़ाई करने के बाद नौकरी के बेहतर विकल्प होंगे, इसलिए उन्होंने इसे चुना। वह केंद्रीय विद्यालय से पढ़ी हैं, इसलिए बचपन से हिंदी आती है। आगे जाकर सरकारी नौकरी करना चाहती हैं। यूनिवर्सिटी के जिस डिपार्टमेंट में विद्या पढ़ती हैं, वहां सिर्फ 9 छात्राएं हैं। इनमें छह एमए की हैं और तीन डिप्लोमा की। 2005 के पहले तक 15-20 बच्चों का एडमिशन होता था, लेकिन उसके बाद कभी यह आंकड़ा 10 पार नहीं हुआ। उनकी टीचर कहती हैं, तमिल लोगों में से हिंदी या तो ब्राह्मणों ने पढ़ी या फिर औरतों ने। 2005 में उनके यहां प्रोफेसर की आखिरी नियुक्ति हुई थी। डिपार्टमेंट ने इसी साल अप्रैल में 75 वर्ष पूरे किए हैं। अद्भुत बात यह है कि 1958 में जब हिंदी विभाग की पहली पीएचडी सबमिट हुई, तो वो अंग्रेजी में थी।

अभी क्या है तमिलनाडु में हिंदी की स्थिति?
हिंदी के हाल पर हैरानी के कई कारण और हैं। चेन्नई में दक्षिण भारतीय हिंदी प्रचार सभा के डॉ मंजूनाथ को कोर्स चलाने के लिए पिछले 6 साल से कोई पैसा नहीं मिला है। वह कहते हैं, बच्चों की फीस से जो पैसा आता है, उससे ही खर्च और सैलरी निकली है। पिछले 60 वर्षों से यह संस्था चेन्नई वालों को हिंदी सिखाती है। वैसे तमिलनाडु के लोग हिंदी फिल्में देखकर भाषा सीख लेते हैं। यही वजह है कि 20 वर्षों से टैक्सी चला रहे मनोहर टूटी फूटी हिंदी बोल लेते हैं। कहते हैं-हम हिंदी आता, टूरिस्ट के लिया सीका। उनकी तरह तमाम लोग हैं, जो अपने काम के लिए हिंदी सीखते हैं। हालांकि उनकी संख्या बमुश्किल 3 प्रतिशत है।

हिंदी पर विवाद सिर्फ राजनीतिक है। वरना 15-20 साल पहले तक कुछ लोग हिंदी सिर्फ इसलिए नहीं सीखना चाहते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह उनके संस्कार और संस्कृति के लिए खतरा है। हिंदी के खिलाफ जंग शुरू हुई तो भी यही कहा गया कि हिंदी का इस्तेमाल होने लगा तो नौकरियां हिंदी वालों में बंट जाएंगी। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का बयान है-हिंदी न तब, न अब, न कभी। वह कहते हैं हिंदी थोपी नहीं जा सकती, ये भाषाई साजिश है। यानी, तमिलनाडु की जमीन पर हिंदी एक जरूरत और स्किल है। लेकिन राजनीति में यह अब भी पहचान और अधिकार का सवाल है। और एक मजबूत प्रक्षेपास्त्र भी।

चेन्नई में रहने वाली निरुपमा नरसिम्हन, सीए हैं। कहती हैं उनके पिता बैंक में थे, इसलिए ट्रांसफर होते रहते थे। हिंदी सीखना उनके लिए जरूरत थी। लेकिन अब वह अपने बेटे को हिंदी सिखा रही हैं, स्कूल में उसका तीसरा विषय हिंदी है। निरुपमा कहती हैं, अब लोगों की सोच बदली है, चेन्नई में कई क्लासेस हैं, जो सिर्फ एक्स्ट्रा क्लास बतौर बच्चों को हिंदी सिखाती हैं। उनकी कई सहेलियां अपने बच्चों को हिंदी सिखाने स्कूल के बाद यहां भेजती हैं।  

भाषा शहीदों के नाम पर बनी इमारत थलमथु नटराजन मालिगई चेन्नई में योजना और विकास कार्यों का अहम केंद्र है। यहां चेन्नई महानगर विकास प्राधिकरण के साथ ही कई सरकारी विभागों व निगमों के कार्यालय भी हैं।


 
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