{"_id":"69dadc23a6f227f81e03dd43","slug":"administrative-reform-or-political-row-tamil-nadu-sir-voter-list-more-names-removed-bengal-political-heat-2026-04-12","type":"story","status":"publish","title_hn":"प्रशासनिक सुधार या सियासी रार: तमिलनाडु में SIR के तहत मतदाता सूची से अधिक नाम कटे, पर सियासी उबाल बंगाल में","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
प्रशासनिक सुधार या सियासी रार: तमिलनाडु में SIR के तहत मतदाता सूची से अधिक नाम कटे, पर सियासी उबाल बंगाल में
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: Nirmal Kant
Updated Sun, 12 Apr 2026 05:11 AM IST
विज्ञापन
सार
देश में मतदाता सूचियों के एसआईआर को लेकर विवाद प्रशासनिक से ज्यादा सियासी है। तमिलनाडु में बंगाल से अधिक नाम कटे, फिर भी वहां शांति है। जबकि बंगाल और बिहार में कम नाम कटने पर भी हंगामा है। आंकड़े इस विरोधाभास को स्पष्ट करते हैं कि बहस प्रक्रिया नहीं, बल्कि सियासी गणित पर है। पढ़िए रिपोर्ट-
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : संवाद
विज्ञापन
विस्तार
देश में मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण के लिए चुनाव आयोग के चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान पर मचा घमासान प्रशासनिक से ज्यादा सियासी है। आंकड़ों की हकीकत तस्दीक करती है कि जिस तमिलनाडु में पश्चिम बंगाल से कहीं अधिक नाम सूची से हटाए गए, वहां चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह शांत है। वहीं, बंगाल और बिहार में इसी मुद्दे पर सियासी उबाल है।
मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर हो रहा विरोध कितना राजनीतिक है, इसका अंदाजा तमिलनाडु और बंगाल के आंकड़ों की तुलना से लगता है। तमिलनाडु में मतदाता सूची शुद्धिकरण के दौरान रिकॉर्ड 97.37 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, लेकिन वहां किसी राजनीतिक दल ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। वहीं, पश्चिम बंगाल में तमिलनाडु के मुकाबले कम यानी 90 लाख नाम कटे हैं, लेकिन यहां इसे साजिश करार देकर भारी हंगामा किया जा रहा है। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि रार प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर नहीं, बल्कि उन राज्यों में है, जहां चुनावी गणित खास समीकरणों पर टिका है।
बिहार-बंगाल में उबाल के पीछे सियासी मंशा
बिहार और पश्चिम बंगाल में इस मुद्दे को तूल देने के पीछे का कारण पूरी तरह अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण है। जिन राज्यों में घुसपैठ बड़ा मुद्दा है और मुस्लिम वोट बैंक की भूमिका निर्णायक है, वहीं इस प्रशासनिक कवायद को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है। तमिलनाडु में इस सुधार को तकनीकी माना गया, जबकि बिहार-बंगाल में इसे अल्पसंख्यकों और प्रवासियों के अधिकारों से जोड़कर एक राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश हो रही है।
बढ़ गया मतदान
एसआईआर प्रक्रिया के बाद सबसे सकारात्मक पहलू मतदान प्रतिशत में हुई बढ़ोतरी के रूप में सामने आया है। 12 राज्यों के अनुभव बताते हैं कि जैसे ही सूची से मृत और फर्जी नाम हटे, वास्तविक मतदाताओं की तस्वीर साफ हो गई। सूची से फर्जी नाम बाहर होते ही कुल मतदाताओं की संख्या घटी। इससे मतदान का वास्तविक प्रतिशत स्वतः ही ऊपर चला गया। यह पारदर्शी चुनाव और फर्जी मतदान रोकने की दिशा में लोकतंत्र के लिए सबसे शुभ संकेत है।
उत्तर प्रदेश में हुई सबसे बड़ी सफाई
संख्या बल के लिहाज से उत्तर प्रदेश में इस अभियान का सबसे व्यापक असर दिखा है। यूपी में रिकॉर्ड 2.04 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। इतनी बड़ी कटौती के बावजूद वहां कोई राजनीतिक टकराव नहीं दिखा। एसआईआर से पहले 15.44 करोड़ वोटर थे। पहली ड्राफ्ट लिस्ट में 2.89 लाख वोटर कट गए थे। राजनीतिक दल और वोटर सक्रिय हुए और उन्होंने संबंधित कागजात दिखाए तो करीब 84 लाख वोटरों के नाम जुड़ गए। फिलहाल यूपी की वोटर सूची में 13.39 करोड़ नाम हैं।
ये भी पढ़ें: पीएम मोदी का ब्लॉगर अवतार- 'मेरे पीछे देख सकते हैं, लोगों का हुजूम बता रहा बंगाल का मिजाज'
पांच राज्यों के बाद देशभर में विस्तार
निर्वाचन आयोग की यह मुहिम अभी थमी नहीं है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के तत्काल बाद यह प्रक्रिया उन सभी राज्यों में शुरू की जाएगी जो अब तक इससे अछूते हैं। आयोग का स्पष्ट मानना है कि फर्जी वोटरों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने का दौर अब खत्म होना चाहिए। 2029 के आम चुनाव से पहले देश की हर मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिहीन बनाने का लक्ष्य है।
Trending Videos
मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर हो रहा विरोध कितना राजनीतिक है, इसका अंदाजा तमिलनाडु और बंगाल के आंकड़ों की तुलना से लगता है। तमिलनाडु में मतदाता सूची शुद्धिकरण के दौरान रिकॉर्ड 97.37 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, लेकिन वहां किसी राजनीतिक दल ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। वहीं, पश्चिम बंगाल में तमिलनाडु के मुकाबले कम यानी 90 लाख नाम कटे हैं, लेकिन यहां इसे साजिश करार देकर भारी हंगामा किया जा रहा है। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि रार प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर नहीं, बल्कि उन राज्यों में है, जहां चुनावी गणित खास समीकरणों पर टिका है।
विज्ञापन
विज्ञापन
बिहार-बंगाल में उबाल के पीछे सियासी मंशा
बिहार और पश्चिम बंगाल में इस मुद्दे को तूल देने के पीछे का कारण पूरी तरह अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण है। जिन राज्यों में घुसपैठ बड़ा मुद्दा है और मुस्लिम वोट बैंक की भूमिका निर्णायक है, वहीं इस प्रशासनिक कवायद को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है। तमिलनाडु में इस सुधार को तकनीकी माना गया, जबकि बिहार-बंगाल में इसे अल्पसंख्यकों और प्रवासियों के अधिकारों से जोड़कर एक राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश हो रही है।
बढ़ गया मतदान
एसआईआर प्रक्रिया के बाद सबसे सकारात्मक पहलू मतदान प्रतिशत में हुई बढ़ोतरी के रूप में सामने आया है। 12 राज्यों के अनुभव बताते हैं कि जैसे ही सूची से मृत और फर्जी नाम हटे, वास्तविक मतदाताओं की तस्वीर साफ हो गई। सूची से फर्जी नाम बाहर होते ही कुल मतदाताओं की संख्या घटी। इससे मतदान का वास्तविक प्रतिशत स्वतः ही ऊपर चला गया। यह पारदर्शी चुनाव और फर्जी मतदान रोकने की दिशा में लोकतंत्र के लिए सबसे शुभ संकेत है।
उत्तर प्रदेश में हुई सबसे बड़ी सफाई
संख्या बल के लिहाज से उत्तर प्रदेश में इस अभियान का सबसे व्यापक असर दिखा है। यूपी में रिकॉर्ड 2.04 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। इतनी बड़ी कटौती के बावजूद वहां कोई राजनीतिक टकराव नहीं दिखा। एसआईआर से पहले 15.44 करोड़ वोटर थे। पहली ड्राफ्ट लिस्ट में 2.89 लाख वोटर कट गए थे। राजनीतिक दल और वोटर सक्रिय हुए और उन्होंने संबंधित कागजात दिखाए तो करीब 84 लाख वोटरों के नाम जुड़ गए। फिलहाल यूपी की वोटर सूची में 13.39 करोड़ नाम हैं।
ये भी पढ़ें: पीएम मोदी का ब्लॉगर अवतार- 'मेरे पीछे देख सकते हैं, लोगों का हुजूम बता रहा बंगाल का मिजाज'
पांच राज्यों के बाद देशभर में विस्तार
निर्वाचन आयोग की यह मुहिम अभी थमी नहीं है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के तत्काल बाद यह प्रक्रिया उन सभी राज्यों में शुरू की जाएगी जो अब तक इससे अछूते हैं। आयोग का स्पष्ट मानना है कि फर्जी वोटरों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने का दौर अब खत्म होना चाहिए। 2029 के आम चुनाव से पहले देश की हर मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिहीन बनाने का लक्ष्य है।