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यूसीसी पर पूर्व जस्टिस करोल की दो टूक: समय की जरूरत है समान नागरिक संहिता, पूरे देश के लिए केंद्र बनाए कानून
Thu, 29 Oct 2026 02:11 AM IST
शिवम गर्ग
एएनआई, नई दिल्ली
एएनआई, नई दिल्ली
Published by: शिवम गर्ग
Updated Thu, 29 Oct 2026 02:11 AM IST
सार
समान नागरिक संहिता पर राष्ट्रीय कानूनी संवाद में पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल ने पूरे देश के लिए केंद्रीय कानून की जरूरत बताई। वहीं, अन्य वक्ताओं ने सामाजिक विविधता, महिलाओं के अधिकार और अलग-अलग राज्यों के कानूनों से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की।
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पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल
- फोटो : Amar Ujala Graphics
विस्तार
समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल ने इसे समय की जरूरत बताते हुए कहा कि देश में एक समान कानून होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यूसीसी पूरे देश के लिए है और इसे लागू करने के लिए केंद्र सरकार को कानून बनाना चाहिए।
जस्टिस करोल बुधवार को अनुच्छेद 44 और समान नागरिक संहिता पर आयोजित राष्ट्रीय कानूनी संवाद में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यूसीसी को लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। कुछ लोग इसे देश को एकजुट करने और कानून में समानता लाने का माध्यम मानते हैं, जबकि कुछ को इससे संस्कृति और धर्म पर असर पड़ने की आशंका है।
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छठ पूजा का उदाहरण देकर बिहार की तारीफ
जस्टिस करोल ने बिहार की सामाजिक एकता और धर्मनिरपेक्षता की सराहना की। उन्होंने कहा "अगर आप धर्मनिरपेक्षता या अनुच्छेद 44 को देखना चाहते हैं, तो बिहार जरूर जाएं। छठ पूजा पर हर समुदाय के लोग जाति से परे होकर पूजा करते हैं।"
राज्यों के बजाय केंद्र के कानून पर जोर
जस्टिस करोल ने सवाल उठाया कि विविधताओं वाले देश में अलग-अलग राज्य समान नागरिक संहिता को अपने स्तर पर किस तरह लागू कर सकते हैं। उनके मुताबिक, पूरे देश में समान कानून लागू करने के लिए केंद्रीय कानून की जरूरत है।
कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद और कार्मिक, लोक शिकायत, कानून एवं न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष सुजीत कुमार ने भी यूसीसी पर अपने विचार रखे।
उत्तराखंड की UCC समिति के सदस्य ने क्या कहा?
उत्तराखंड में यूसीसी के मसौदे और नियम बनाने वाली समिति के सदस्य मनु गौर ने कहा कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन आजादी के बाद सभी भारतीय हैं। उन्होंने ब्रिटिश शासन की 'फूट डालो और राज करो' नीति का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेजों ने धर्म और जाति के आधार पर लोगों को बांटा।
गौर ने विवाह को लेकर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में विवाह एक संस्कार है, जबकि दूसरे धर्मों में इसे अनुबंध के रूप में देखा जाता है। उन्होंने शाह बानो और सौरभ बानो मामलों का उल्लेख करते हुए यूसीसी की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक, उत्तराखंड की मुस्लिम महिलाओं ने ये मामले उठाए थे और हलाला प्रथा के खिलाफ एक याचिका भी लंबित है।
अलग-अलग राज्यों के कानून से बच निकलने की आशंका
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रोमी चाको ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में यूसीसी लागू करने से उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा। उनके अनुसार, हर राज्य अपने सामाजिक और पारंपरिक हालात के आधार पर कानून बना सकता है। ऐसे में लोग निवास स्थान बदलकर कानून से बचने की कोशिश कर सकते हैं।
कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने किया। उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का जिक्र करते हुए कहा कि इस कानून ने बहुविवाह पर रोक लगाने की व्यवस्था की।
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जस्टिस करोल बुधवार को अनुच्छेद 44 और समान नागरिक संहिता पर आयोजित राष्ट्रीय कानूनी संवाद में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यूसीसी को लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। कुछ लोग इसे देश को एकजुट करने और कानून में समानता लाने का माध्यम मानते हैं, जबकि कुछ को इससे संस्कृति और धर्म पर असर पड़ने की आशंका है।
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#WATCH | Delhi | On Uniform Civil Code, Former Judge of the Supreme Court of India, Justice Sanjay Karol says, "It is the need of the hour. There can be two different views: One view is that it integrates the nation and unifies the law. The other side is that it is a threat to the culture and religion..."
— ANI (@ANI) October 28, 2026
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छठ पूजा का उदाहरण देकर बिहार की तारीफ
जस्टिस करोल ने बिहार की सामाजिक एकता और धर्मनिरपेक्षता की सराहना की। उन्होंने कहा "अगर आप धर्मनिरपेक्षता या अनुच्छेद 44 को देखना चाहते हैं, तो बिहार जरूर जाएं। छठ पूजा पर हर समुदाय के लोग जाति से परे होकर पूजा करते हैं।"
राज्यों के बजाय केंद्र के कानून पर जोर
जस्टिस करोल ने सवाल उठाया कि विविधताओं वाले देश में अलग-अलग राज्य समान नागरिक संहिता को अपने स्तर पर किस तरह लागू कर सकते हैं। उनके मुताबिक, पूरे देश में समान कानून लागू करने के लिए केंद्रीय कानून की जरूरत है।
कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद और कार्मिक, लोक शिकायत, कानून एवं न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष सुजीत कुमार ने भी यूसीसी पर अपने विचार रखे।
उत्तराखंड की UCC समिति के सदस्य ने क्या कहा?
उत्तराखंड में यूसीसी के मसौदे और नियम बनाने वाली समिति के सदस्य मनु गौर ने कहा कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन आजादी के बाद सभी भारतीय हैं। उन्होंने ब्रिटिश शासन की 'फूट डालो और राज करो' नीति का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेजों ने धर्म और जाति के आधार पर लोगों को बांटा।
गौर ने विवाह को लेकर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में विवाह एक संस्कार है, जबकि दूसरे धर्मों में इसे अनुबंध के रूप में देखा जाता है। उन्होंने शाह बानो और सौरभ बानो मामलों का उल्लेख करते हुए यूसीसी की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक, उत्तराखंड की मुस्लिम महिलाओं ने ये मामले उठाए थे और हलाला प्रथा के खिलाफ एक याचिका भी लंबित है।
अलग-अलग राज्यों के कानून से बच निकलने की आशंका
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रोमी चाको ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में यूसीसी लागू करने से उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा। उनके अनुसार, हर राज्य अपने सामाजिक और पारंपरिक हालात के आधार पर कानून बना सकता है। ऐसे में लोग निवास स्थान बदलकर कानून से बचने की कोशिश कर सकते हैं।
कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने किया। उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का जिक्र करते हुए कहा कि इस कानून ने बहुविवाह पर रोक लगाने की व्यवस्था की।