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कलपक्कम में हुआ कमाल!: जो अब तक केवल रूस कर सका वो हम करेंगे, कैसे परमाणु क्षेत्र में आत्मनिर्भर होगा भारत?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Tue, 07 Apr 2026 05:14 PM IST
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सार

तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र से सोमवार को एक बड़ी खबर आई। वैज्ञानिकों ने यहां परमाणु ऊर्जा को लेकर जारी एक प्रयोग में क्रिटिकैलिटी हासिल कर ली। इस उपलब्धि को हासिल करने के साथ ही भारत अब परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की तरफ कदम बढ़ा चुका है। 

Kalpakkam Nuclear Power Facility Fast Breeder Reactor Criticality achieved Atomic Programme Thorium Uranium Ru
कलपक्कम परमाणु ऊर्जा संयंत्र ने हासिल की उपलब्धि। - फोटो : अमर उजाला/AI
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विस्तार

भारत ने तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र में क्रिटिकैलिटी यानी क्रांतिकता हासिल कर ली। अगर भारत का परमाणु कार्यक्रम इसी क्रिटिकैलिटी की सफल राह पर आगे बढ़ा तो परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनने में देर नहीं लगेगी। इसका असर यह होगा कि भारत जल्द ही पारंपरिक जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा पैदा करने की जगह स्वच्छ अक्षय ऊर्जा पैदा करने के लिए तैयार हो जाएगा। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत का कलपक्कम परमाणु ऊर्जा संयंत्र क्या है? क्रिटिकैलिटी क्या होती है और इसे हासिल करने के बाद पलक्कम संयंत्र के चर्चा में आने की क्या वजहें हैं? भारत के लिए यह उपलब्धि कितनी बड़ी है? कैसे भारत 1950 के दशक में देखा गया परमाणु ऊर्जा का तीन चरण का सपना पूरा करने के करीब आ गया है? आइये जानते हैं...
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क्या है कलपक्कम परमाणु ऊर्जा संयंत्र?

तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) भारत का पहला स्वदेशी फास्ट ब्रीडर परमाणु रिएक्टर है। 500 मेगावाट (MWe) क्षमता वाले इस उन्नत रिएक्टर को इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (आईजीसीएआर) की ओर से डिजाइन और भाविनी की तरफ से निर्मित किया गया है। इसे बनाने में 200 से ज्यादा भारतीय उद्योगों और लघु एवं मध्यम उद्योगों की भूमिका रही है। 

भारत पिछले करीब 40 साल से एक फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) में प्रयोगों को अंजाम दे रहा है। भारत का परमाणु ऊर्जा विभाग इस दौरान परमाणु ईंधन के सही और पूरी क्षमता के साथ इस्तेमाल की कोशिशों में जुटा है। चूंकि अन्य कोई भी देश अपनी संवेदनशील परमाणु ऊर्जा तकनीक भारत को मुहैया कराने के लिए तैयार नहीं हुआ है। इसलिए आईजीसीएआर ने खुद ही एक परिपूर्ण फास्ट ब्रीडर रिएक्टर को बनाने में ताकत झोंक दी। इसी का नतीजा है कि कलपक्कम में पीएफबीआर भी अब सफलता की ओर है। 

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कैसे काम करता है यह ऊर्जा संयंत्र?

पारंपरिक ऊर्जा संयंत्रों के उलट, यह फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अपने संचालन के दौरान जितना परमाणु ईंधन जलाता है, उससे कहीं अधिक नया ईंधन (फिसाइल सामग्री) पैदा करता है। इसके कोर में यूरेनियम-प्लूटोनियम मिक्स्ड ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग होता है, जिसके चारों ओर यूरेनियम-238 का एक ब्लैंकेट रखा जाता है। जब एक रसायनिक प्रतिक्रिया पूरी हो जाती है तो इसी दौरान उच्च गति वाले न्यूट्रॉन एक रिएक्शन के बाद बेकार माने जाने वाले यूरेनियम-238 को ताजा प्लूटोनियम में बदल देते हैं। इसका इस्तेमाल एक बार फिर नए ईंधन के रूप में किया जा सकता है। एक तरह से कहें तो यह कभी न खत्म होने वाला ईंधन बन जाता है। 

भारत के लिए कलपक्कम परमाणु ऊर्जा संयंत्र क्यों खास?

दुनियाभर में परमाणु ऊर्जा संयंत्र मौजूदा समय में लाइट वॉटर रिएक्टरों का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें ईंधन के तौर पर यूरेनियम लगता है। हालांकि, दुनिया में यूरेनियम के भंडार लगातार घट रहे हैं और नए भंडार की कम मौजूदगी की वजह से धीरे-धीरे खात्मे की कगार पर पहुंचने वाले हैं। भारत के पास भी यूरेनियम के भंडार काफी कम हैं। 

रिपोर्ट्स की मानें तो भारत के पास दुनिया का केवल एक प्रतिशत यूरेनियम है। हालांकि, फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों की खास बात यह है कि पारंपरिक रिएक्टर्स से इतर इनमें ईंधन के तौर पर प्लूटोनियम और थोरियम का भी इस्तेमाल हो सकता है। आकलन के मुताबिक, वैश्विक थोरियम भंडार का लगभग 25 फीसदी हिस्सा भारत में, खासकर दक्षिण भारत की तटीय रेत में मौजूद है। यह भारत को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा थोरियम का भंडार बनाता है। 

थोरियम को जब तेज रफ्तार के न्यूट्रॉन के संपर्क में लाया जाता है तो यह यूरेनियम-233 पैदा करता है। यानी थोरियम सीधे तौर पर एक बेहद कीमती परमाणु तत्व में बदल जाता है। कलपक्कम का यह रिएक्टर इसी काम में माहिर है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर यह सफल होता है तो भारत अपने थोरियम भंडार से वर्षों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो जाएगा।

अब क्यों चर्चा में आया कलपक्कम का यह ऊर्जा संयंत्र?

कलपक्कम में स्थित 500 मेगावाट का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर 6 अप्रैल 2026 को ऐतिहासिक क्रिटिकैलिटी हासिल करने की वजह से चर्चा में आया है। आइये जानते हैं यह क्रिटिकैलिटी क्या होती है और कितनी अहम है...
 

1. क्या होती है क्रिटिकैलिटी?

क्रिटिकैलिटी किसी परमाणु रिएक्टर के संचालन की वह खास स्थिति है, जिसमें परमाणु विखंडन की शृंखला प्रतिक्रिया (चेन रिएक्शन) स्थिर हो जाती है और यह प्रतिक्रिया लगातार जारी रखने में सक्षम हो जाती है। इसका मतलब है कि यह रिएक्टर अब बिना किसी बाहरी दखल के मौजूदा ईंधन के जरिए ऊर्जा पैदा करने के लिए तैयार हो गया है।

हालांकि, यह बताना भी अहम है कि क्रिटिकैलिटी हासिल करना सीधे तौर पर बिजली पैदा करना नहीं है, बल्कि यह उसके लिए सबसे जरूरी और पहली शर्त है। अब इस रिएक्टर की क्षमता और कुशलता को समझने के लिए कम-क्षमता वाले कुछ परीक्षण किए जाएंगे, जिसके बाद इसे पावर ग्रिड से जोड़कर बिजली उत्पादन शुरू किया जा सकता है।

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2. क्यों दुनियाभर में चर्चा में यह कदम?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 अप्रैल को इस उपलब्धि की घोषणा करते हुए इसे भारत की असैन्य परमाणु यात्रा में एक निर्णायक कदम बताया। उनके साथ-साथ विदेश मंत्री एस. जयशंकर, देश-विदेश के वैज्ञानिकों ने भी इस उपलब्धि की चर्चा शुरू कर दी। 

अगर यह संयंत्र सारे प्रयोगों में सफल हो जाता है और इसे बिजली पैदा करने के लिए वाणिज्यिक यानी कमर्शियल ग्रिड से जोड़ दिया जाता है तो भारत दुनिया का सिर्फ दूसरा ऐसा देश बन जाएगा, जिसके पास व्यावसायिक रूप से संचालित होने वाला फास्ट ब्रीडर रिएक्टर होगा। अब तक यह उपलब्धि सिर्फ रूस के पास ही मौजूद है।

इतना ही नहीं यह भारत के तीन-चरण के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण की सबसे बड़ी सफलता है। यह उपलब्धि भविष्य में (तीसरे चरण में) भारत के विशाल थोरियम भंडार का ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करने का रास्ता साफ करती है।

भारत के लिए यह उपलब्धि कितनी बड़ी साबित होने वाली है? 

आने वाली चार शताब्दियों की ऊर्जा सुरक्षा: भारत के पास यूरेनियम का भंडार भले ही दुनिया का एक प्रतिशत हो, लेकिन वैश्विक थोरियम का लगभग 25 प्रतिशत भंडार भारत में मौजूद है। वर्तमान में भारत अपने ऊर्जा स्रोतों के लिए आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है। इस रिएक्टर की सफलता के बाद भारत अपने थोरियम भंडार का उपयोग करके अगले 400 वर्षों तक 500 गीगावाट (जीडब्ल्यू) बिजली उत्पन्न करने में सक्षम हो सकता है। 



आत्मनिर्भरता और तीसरे चरण का प्रवेश द्वार: यह ऐतिहासिक कदम भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा की तरफ से तैयार किए गए तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीसरे चरण में प्रवेश करने के लिए एक निर्णायक कदम है। इसके जरिए भारत आखिरकार परमाणु ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है और उसे विदेशी परमाणु ईंधन का आयात करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

दुनिया के सबसे विशिष्ट क्लब में भारत: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की तकनीक अत्यंत जटिल है। अमेरिका, फ्रांस और जापान जैसे कई विकसित देशों ने तरल सोडियम को सुरक्षित रूप से संभालने में विफलता और अन्य वित्तीय चिंताओं के कारण अपने कार्यक्रमों को बंद कर दिया। इसके व्यावसायिक रूप से ग्रिड से जुड़ने के बाद, रूस के बाद भारत दुनिया का केवल दूसरा देश बन जाएगा जिसके पास वाणिज्यिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर होगा।

परमाणु कचरे में भारी कमी: चूंकि यह रिएक्टर पहले चरण के रिएक्टरों से निकले इस्तेमाल किए गए ईंधन का दोबारा इस्तेमाल करता है, यह परमाणु कचरे की मात्रा को कई गुना कम कर देता है। इसके अलावा, थोरियम रिएक्टरों से निकलने वाले कचरे में ऐसे आइसोटोप नहीं होते, जिनकी हाफ-लाइफ 35 वर्ष से ज्यादा हो, जिससे कचरे को लंबे समय तक विशाल भूमिगत स्टोरेज में डंप करने की चिंता काफी कम हो जाती है।

स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु लक्ष्य: यूरेनियम की तरह ही थोरियम से बिजली पैदा करने पर कोई ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित नहीं होती है, जिससे यह ऊर्जा का एक बहुत ही स्वच्छ स्रोत बन जाता है। प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, यह भारत को अपने नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को हासिल करने में भी काफी मदद करेगा।

आर्थिक लाभ और बाहरी संकटों से बचाव: देश को सस्ती और प्रचुर मात्रा में बिजली मिलने से खाना पकाने और परिवहन के लिए आयातित गैस, पेट्रोल और डीजल पर हमारी निर्भरता कम हो सकती है। इसके अलावा, आयात कम होने से पश्चिम एशिया में तनाव (जैसे हालिया युद्ध और लाल सागर संकट) जैसी भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण आने वाले तेल और गैस संकट से भी भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक सुरक्षित हो जाएगी।


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