Kargil Vijay: कारगिल में BSF के इंस्पेक्टर हबीबुल्लाह, जिन्होंने पाकिस्तानी रेडियो संदेशों का किया था अनुवाद
कारिगल युद्ध के समय घुसपैठिए वायरलेस बातचीत के दौरान दार्दी, बाल्टी, पुस्तो, फ़ारसी और अरबी भाषाओं का उपयोग कर रहे थे। इस स्तर पर बीएसएफ की 'जी' शाखा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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कारगिल की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना ने रेडियो पर ऐसी भाषाओं में संदेश भेजे थे, जिन्हें भारतीय सेना के लिए समझना मुश्किल था। सेना और अन्य प्रमुख खुफिया एजेंसियों ने द्रास और बटालिक क्षेत्र में अवरोधन केंद्र स्थापित किए थे। हालांकि, उन्हें दुश्मन के वायरलेस संचार की व्याख्या करने में कठिनाई हुई, क्योंकि घुसपैठिए वायरलेस बातचीत के दौरान दार्दी, बाल्टी, पुस्तो, फ़ारसी और अरबी भाषाओं का उपयोग कर रहे थे। इस स्तर पर बीएसएफ की 'जी' शाखा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। द्रास में एक सबसे बहुमुखी दुभाषिया तैनात था, जो घुसपैठियों के प्रसारण को सीधे सुन रहा था और तुरंत अनुवाद कर रहा था। वह सशस्त्र बलों के लिए वास्तविक समय पर कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी तैयार कर रहा था। वह 8वीं बटालियन बीएसएफ के इंस्पेक्टर (जी) हबीबुल्लाह थे। वे बाद में कश्मीर में आतंकवादियों से लड़ते हुए देश के लिए शहीद हो गए। वे द्रास के स्थानीय निवासी थे। उन्होंने पुस्तो, दर्दी और बाल्टी भाषाओं के अनुवाद में सेना और बीएसएफ के लिए बहुत मददगार साबित हुए थे।
चेन्निगुंड में 08 बटालियन बीएसएफ की यूनिट 'जी' सेल के साथ संयुक्त निदेशक (जी) ओएस झा, डीसी (जी) की प्रत्यक्ष देखरेख में एक व्याख्या/अनुवाद प्रकोष्ठ की स्थापना की गई। वहां पर श्रीनगर से बहुभाषी संसाधन के व्यक्तियों को नियुक्त किया गया। प्रमुख खुफिया एजेंसियों और सेना के रिकॉर्ड किए गए कैसेट का बीएसएफ 'जी' द्वारा अनुवाद और विश्लेषण किया गया। यह व्यवस्था घुसपैठियों की ताकत, उनकी चौकियों के स्थान, उनके मनोबल, आपूर्ति और भंडार की स्थिति, सुदृढीकरण की स्थिति, पुनःपूर्ति, हताहतों की संख्या और हताहतों की निकासी की स्थिति, कमांडरों का दौरा,
घुसपैठियों के पास टेलीफोन लाइनों की उपलब्धता, भारतीय तोपखाने/मोर्टार गोलाबारी का प्रभाव, हवाई हमले का प्रभाव, दुश्मन की संभावित कार्य योजना आदि का आकलन करने में बहुत उपयोगी थी।
बीएसएफ प्रवक्ता के मुताबिक, 29 मई 1999 के पहले सप्ताह में घुसपैठ का पता चलने के तुरंत बाद, चेन्निगुंड में स्थापित बीएसएफ 'जी' ने अपने संसाधनों को सक्रिय कर दिया। घुसपैठ की प्रकृति और सीमा के बारे में सटीक जानकारी प्राप्त की। कुछ तथ्यों का पता लगाने के बाद, इन्हें कमांडेंट के माध्यम से ब्रिगेड मुख्यालय के संज्ञान में लाया गया। मई 1999 के दूसरे सप्ताह के अंत तक, बीएसएफ 'जी' संसाधनों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में घुसपैठ की प्रकृति और सीमा का कमोबेश पता लगा लिया गया था। बीएसएफ 'जी' के संसाधन, सेना के अधिकारियों को द्रास और बटालिक क्षेत्रों में उपयोग के लिए भी उपलब्ध कराए गए थे।
ये संसाधन, स्थानीय होने और इलाके से अच्छी तरह वाकिफ होने के कारण, बहुत मददगार साबित हुए। इनका उपयोग गांवों में स्थानीय आबादी के साथ घुसपैठियों के मेलजोल का पता लगाने के लिए भी किया गया। एक बार जब वे यह पुष्टि कर पाए कि कोई घुसपैठिया स्थानीय आबादी के साथ नहीं मिला है, तो उनका उपयोग आगे घुसपैठ के संवेदनशील स्थानों और मार्गों और घुसपैठियों के संभावित भागने के रास्तों की पहचान करने और उनका पता लगाने के लिए किया गया। बीएसएफ की इस पहल से सैनिकों को उचित स्थान पर तैनात करने में मदद मिली। ताकि आगे किसी भी घुसपैठ को प्रभावी ढंग से नियंत्रित और रोका जा सके।
द्रास में सबसे बहुमुखी दुभाषिया 8वीं बटालियन बीएसएफ के इंस्पेक्टर (जी) हबीबुल्लाह थे। वे घुसपैठियों के प्रसारण को सीधे सुन रहे थे। उनके अनुवाद की मदद से भारतीय सेना को बड़ी मदद मिली। उनकी जानकारी से सशस्त्र बलों ने वास्तविक समय पर कार्रवाई की। हबीबुल्लाह ने रिकॉर्ड किए गए वायरलेस वार्तालापों का मौके पर अनुवाद किया था। इस काम में ब्रिगेड मुख्यालय ने अक्सर उनकी मदद ली थी। उन्होंने स्थानीय युवाओं को पोर्टर के रूप में काम करने के लिए प्रेरित करने में भी मदद की।
एक महत्वपूर्ण समय के दौरान जब स्थानीय लोग पाकिस्तानी तोपखाने की गोलाबारी के कारण दहशत में क्षेत्र से भाग गए थे और दुश्मन की तोपखाने/मोर्टार गोलाबारी के बीच कोई भी पोर्टर का कर्तव्य निभाने को तैयार नहीं था, तब 8वीं बटालियन बीएसएफ के इंस्पेक्टर हबीबुल्लाह उन युवाओं को भारतीय सेना की मदद के लिए आगे लाया था।
घुसपैठ की प्रकृति और सीमा की पुष्टि करने वाली पहली खुफिया जानकारी कारगिल में तैनात जेएडी (जी) बीएसएफ श्रीनगर द्वारा बल मुख्यालय बीएसएफ को भेजी गई थी। इसे बीएसएफ ने बिना समय गंवाए गृह मंत्रालय के साथ साझा किया। इस जानकारी ने घुसपैठ की सीमा, प्रकृति और गंभीरता के बारे में एक चेतावनी के रूप में काम किया था। गृह मंत्रालय (एमएचए) ने बीएसएफ को जेएडी (जी) बीएसएफ श्रीनगर को युद्ध क्षेत्र में स्थायी रूप से तैनात करने और दिन-प्रतिदिन की खुफिया जानकारी प्रदान करने का निर्देश दिया।