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कर्नाटक चुनाव: येदियुरप्पा ही नहीं, भाजपा के सामने हैं ये बड़ी चुनौतियां, तीन बिंदुओं में समझें समीकरण
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Sun, 29 Jan 2023 11:57 AM IST
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सार
कर्नाटक में भाजपा को पार्टी के अंदर की चुनौतियों से जुझना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री बदलने के बाद से पार्टी में आंतरिक कलह जारी है। आइए जानते हैं यहां भाजपा के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं? कैसे भाजपा इसका सामना करने की कोशिश कर रही है?
कर्नाटक विधानसभा चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
इस साल मई में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होना है। अभी यहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) सत्ता में है। सूबे में चुनावी माहौल अभी से बनने लगे हैं। राजनीतिक दलों ने पूरी ताकत झोंक दी है। हाल ही में राहुल गांधी ने यहां 20 दिन तक भारत जोड़ो यात्रा की। राहुल की इस यात्रा को काफी समर्थन भी मिला। यही कारण है कि अब भाजपा ने नए सिरे से यहां गणित बैठाना शुरू कर दिया है। शनिवार को गृहमंत्री अमित शाह भी यहां पहुंचे।
भाजपा को पार्टी के अंदर की चुनौतियों से जुझना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री बदलने के बाद से पार्टी में आंतरिक कलह जारी है। आइए जानते हैं यहां भाजपा के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं? कैसे भाजपा इसका सामना करने की कोशिश कर रही है?
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भाजपा को पार्टी के अंदर की चुनौतियों से जुझना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री बदलने के बाद से पार्टी में आंतरिक कलह जारी है। आइए जानते हैं यहां भाजपा के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं? कैसे भाजपा इसका सामना करने की कोशिश कर रही है?
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पहले कर्नाटक का समीकरण जान लेते हैं
कर्नाटक के अंदर 2018 में जब विधानसभा चुनाव हुए थे तो भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। पार्टी को स्पष्ट बहुमत तो नहीं था, लेकिन 104 सीटों पर जीत जरूर मिली थी। सरकार बनाने के लिए कर्नाटक में बहुमत का आंकड़ा 113 है। राज्य में कांग्रेस और जेडीएस ने गठबंधन करके सरकार बनाई। हालांकि, बाद में दोनों पार्टियों के कई विधायकों ने पाला बदल लिया। इन विधायकों की मदद से भाजपा ने सरकार बनाई। बीएस येदियुरप्पा राज्य के मुख्यमंत्री बने। लेकिन 2021 में भाजपा नेतृत्व ने उनकी जगह बसवराज बोम्मई को सीएम बना दिया। कहा जाता है कि बोम्मई को येदियुरप्पा की सलाह पर ही सीएम बनाया गया। हालांकि, उसके बाद से येदियुरप्पा जरूर धीरे-धीरे साइड लाइन चले गए। कर्नाटक में येदियुरप्पा की पकड़ काफी मजबूत मानी जाती है। खासतौर पर लिंगायत समुदाय में उन्हें काफी पसंद किया जाता है।
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष भी कर्नाटक से ताल्लुक रखते हैं। इस चुनाव में वह भी काफी एक्टिव हैं। हालांकि, बताया जाता है कि बीएल संतोष, बीएस येदियुरप्पा और बोम्मई के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। भाजपा में ये तीन फ्रंट सामने हैं। इसके अलावा बोम्मई कैबिनेट के भी कुछ सीनियर मंत्री ऐसे हैं, जो मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं। इनका एक अलग मोर्चा बन चुका है।
कर्नाटक के अंदर 2018 में जब विधानसभा चुनाव हुए थे तो भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। पार्टी को स्पष्ट बहुमत तो नहीं था, लेकिन 104 सीटों पर जीत जरूर मिली थी। सरकार बनाने के लिए कर्नाटक में बहुमत का आंकड़ा 113 है। राज्य में कांग्रेस और जेडीएस ने गठबंधन करके सरकार बनाई। हालांकि, बाद में दोनों पार्टियों के कई विधायकों ने पाला बदल लिया। इन विधायकों की मदद से भाजपा ने सरकार बनाई। बीएस येदियुरप्पा राज्य के मुख्यमंत्री बने। लेकिन 2021 में भाजपा नेतृत्व ने उनकी जगह बसवराज बोम्मई को सीएम बना दिया। कहा जाता है कि बोम्मई को येदियुरप्पा की सलाह पर ही सीएम बनाया गया। हालांकि, उसके बाद से येदियुरप्पा जरूर धीरे-धीरे साइड लाइन चले गए। कर्नाटक में येदियुरप्पा की पकड़ काफी मजबूत मानी जाती है। खासतौर पर लिंगायत समुदाय में उन्हें काफी पसंद किया जाता है।
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष भी कर्नाटक से ताल्लुक रखते हैं। इस चुनाव में वह भी काफी एक्टिव हैं। हालांकि, बताया जाता है कि बीएल संतोष, बीएस येदियुरप्पा और बोम्मई के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। भाजपा में ये तीन फ्रंट सामने हैं। इसके अलावा बोम्मई कैबिनेट के भी कुछ सीनियर मंत्री ऐसे हैं, जो मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं। इनका एक अलग मोर्चा बन चुका है।
भाजपा के सामने चार बड़ी चुनौतियां
इसे समझने के लिए हमने कर्नाटक भाजपा के एक बड़े नेता से बात की। उन्होंने कहा, मौजूदा समय कर्नाटक के अंदर सरकार और पार्टी दोनों ही कई चुनौतियों से जूझ रही है। हालांकि, इनमें चार जो सबसे बड़ी चुनौती है वो कार्यकर्ता, संगठन के बड़े नेता और संगठन-सरकार में तालमेल की कमी है।
इसे समझने के लिए हमने कर्नाटक भाजपा के एक बड़े नेता से बात की। उन्होंने कहा, मौजूदा समय कर्नाटक के अंदर सरकार और पार्टी दोनों ही कई चुनौतियों से जूझ रही है। हालांकि, इनमें चार जो सबसे बड़ी चुनौती है वो कार्यकर्ता, संगठन के बड़े नेता और संगठन-सरकार में तालमेल की कमी है।
1. सरकार से नाखुश हैं कार्यकर्ता: पिछले साल कर्नाटक के अंदर दो हिंदूवादी युवा नेताओं की हत्या हो गई। इन मामलों में सरकार के रवैए पर सवाल हुए। इससे संघ से जुड़े दूसरे संगठनों के कार्यकर्ता और युवा नेता नाराज चल रहे हैं। एबीवीपी, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता और नेता सरकार से नाखुश हैं। ये लोग बोम्मई को सीएम पद से हटाने की मांग कर रहे हैं।
2. प्रदेश संगठन में कई गुटों का बनना : बोम्मई के अलावा बीएस येदियुरप्पा, बीएल संतोष का भी अलग गुट प्रदेश में काम कर रहा है। इसके अलावा कुछ कैबिनेट मंत्री भी हैं, जो खुद को सीएम पद का मजबूत दावेदार मानते हैं। संगठन में कई गुट बनने से भी पार्टी को नुकसान होता दिख रहा है। आलम ये है कि एक गुट के समर्थक नेता किसी दूसरे गुट के बुलावे पर बैठक तक में शामिल नहीं होते। यहां तक की पार्टी के एक वरिष्ठ नेता खुद को सुपर सीएम मानकर चलते हैं। सीएमओ का कोई भी प्रोटोकॉल मानने से साफ इंकार कर देते हैं।
3. संगठन और सरकार में तालमेल की कमी: ये भी एक बड़ी चुनौती है। आमतौर पर भाजपा को सरकार और संगठन के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए जाना जाता है, लेकिन कर्नाटक में इसके उलट होता है। यहां सरकार और संगठन के बीच कोई तालमेल नहीं है।
4. नेतृत्व की कमी : येदियुरप्पा के बाद अब पार्टी में कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जिसके नाम पर पूरी पार्टी एकजुट हो सके। कुल मिलाकर प्रदेश स्तर पर पार्टी में नेतृत्व की बड़ी कमी है।
राहुल गांधी की यात्रा से कर्नाटक कांग्रेस में जान आयी
कर्नाटक में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा बीस दिनों तक रही। इस यात्रा के बाद कर्नाटक कांग्रेस ने नारा दिया कि 'अबकी बार, कांग्रेस 150 पार'। राहुल ने कर्नाटक के अंदर काफी रणनीति तैयार की। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कर्नाटक में यात्रा के दौरान सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी पहुंची।
राहुल की यात्रा का रूट और सियासी समीकरण समझें तो ये यात्रा दक्षिण कर्नाटक से होकर गुजरी। यात्रा सात जिलों की सात संसदीय सीटों चामराजनगर, मैसुरू, मांड्या, तुमकुर, चित्रदुर्ग, बेल्लारी और रायचूर से होकर गुजरी। इन सात संसदीय इलाकों में करीब 21 विधानसभा सीटें आती हैं।
दक्षिणी कर्नाटक का यह पूरा हिस्सा वोक्कालिंगा समुदाय का गढ़ माना जाता है। जो मूल रूप से जेडीएस से जुड़ा है। ऐसे में जेडीएस का हिस्सा पाने के लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही अपनी अपनी निगाहें लगाए बैठी हैं। खासकर मैसूर इलाके में पारंपरिक रूप से लड़ाई कांग्रेस और जेडीएस के बीच में है। हालांकि, यहां बीजेपी अपना पैर जमाने की कोशिश कर रही है, लेकिन वह ज्यादा सफल नहीं हो पा रही।
कर्नाटक में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा बीस दिनों तक रही। इस यात्रा के बाद कर्नाटक कांग्रेस ने नारा दिया कि 'अबकी बार, कांग्रेस 150 पार'। राहुल ने कर्नाटक के अंदर काफी रणनीति तैयार की। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कर्नाटक में यात्रा के दौरान सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी पहुंची।
राहुल की यात्रा का रूट और सियासी समीकरण समझें तो ये यात्रा दक्षिण कर्नाटक से होकर गुजरी। यात्रा सात जिलों की सात संसदीय सीटों चामराजनगर, मैसुरू, मांड्या, तुमकुर, चित्रदुर्ग, बेल्लारी और रायचूर से होकर गुजरी। इन सात संसदीय इलाकों में करीब 21 विधानसभा सीटें आती हैं।
दक्षिणी कर्नाटक का यह पूरा हिस्सा वोक्कालिंगा समुदाय का गढ़ माना जाता है। जो मूल रूप से जेडीएस से जुड़ा है। ऐसे में जेडीएस का हिस्सा पाने के लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही अपनी अपनी निगाहें लगाए बैठी हैं। खासकर मैसूर इलाके में पारंपरिक रूप से लड़ाई कांग्रेस और जेडीएस के बीच में है। हालांकि, यहां बीजेपी अपना पैर जमाने की कोशिश कर रही है, लेकिन वह ज्यादा सफल नहीं हो पा रही।
अब आगे क्या?
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'कर्नाटक की स्थिति के बारे में भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को जानकारी है। यहां पहले ये कयास लगाए जा रहे थे कि येदियुरप्पा को मनाने के लिए उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का राज्यपाल बनाया जा सकता है। हालांकि, अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है। ऐसे में अब बोम्मई के जरिए ही बीएस येदियुरप्पा को मनाने की कोशिश होगी। बोम्मई को भी बीएस येदियुरप्पा का खास माना जाता है। चुनाव में हिजाब, हलाल जैसे मुद्दे भी हावी रह सकते हैं।'
भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता कहते हैं, 'कर्नाटक में गुटबाजी को खत्म करने के लिए गृहमंत्री अमित शाह खुद मोर्चा संभाल चुके हैं। पीएम नरेंद्र मोदी खुद इसपर नजर रख रहे हैं। पीएम मोदी के इशारे पर ही केंद्रीय टीम ने एक अलग सर्वे करवाया और अब उसी सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर पार्टी बड़े फैसले ले सकती है।'
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'कर्नाटक की स्थिति के बारे में भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को जानकारी है। यहां पहले ये कयास लगाए जा रहे थे कि येदियुरप्पा को मनाने के लिए उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का राज्यपाल बनाया जा सकता है। हालांकि, अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है। ऐसे में अब बोम्मई के जरिए ही बीएस येदियुरप्पा को मनाने की कोशिश होगी। बोम्मई को भी बीएस येदियुरप्पा का खास माना जाता है। चुनाव में हिजाब, हलाल जैसे मुद्दे भी हावी रह सकते हैं।'
भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता कहते हैं, 'कर्नाटक में गुटबाजी को खत्म करने के लिए गृहमंत्री अमित शाह खुद मोर्चा संभाल चुके हैं। पीएम नरेंद्र मोदी खुद इसपर नजर रख रहे हैं। पीएम मोदी के इशारे पर ही केंद्रीय टीम ने एक अलग सर्वे करवाया और अब उसी सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर पार्टी बड़े फैसले ले सकती है।'