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Khabaron Ke Khiladi: पार्टियों में क्यों हो रहा बिखराव, विश्लेषकों ने बताया सत्ता का चुंबक या कोई और है वजह?
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 20 Jun 2026 05:23 PM IST
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खबरों के खिलाड़ी।
- फोटो : अमर उजाला/AI
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बीते कुछ वक्त से सियासी दलों के विधायकों-सांसदों की टूट की खबर सुर्खियों में है। पहले आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों का भाजपा में विलय हुआ। फिर पश्चिम बंगाल में टीएमसी की हार के बाद उसके विधायकों ने बगावत की। इसके बाद सांसदों ने पूर्वोत्तर की एक अनाम पार्टी में विलय का एलान कर दिया। अब शिवसेना में बगावत की खबरें हैं। दावा तो समाजवादी पार्टी के लिए भी होने लगा है। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, पीयूष पंत, राकेश शुक्ल और श्रीनिवास मौजूद रहे।
समीर चौगांवकर: जिस तरह से उद्धव ठाकरे की पार्टी में टूट हुई है, वो निश्चित रूप से ये उनके लिए बहुत बड़ा झटका है। 2022 की टूट के बाद उद्धव ठाकरे ने खुद को बचा लिया था। इस टूट के बाद भी मुझे लगता है कि महाराष्ट्र बाला साहेब ठाकरे को मानने वाला एक वोट बैंक है जो आगे भी उद्धव के साथ रहेगा। फिलहाल तो उद्धव के लिए बड़ी चुनौती का वक्त है। इसके बाद शरद पवार की पार्टी में टूट की अटकलें भी लगाई जा रही हैं। मुझे लगता है कि ये वक्त क्षेत्रीय दलों के लिए बुरा है। अगला चुनाव उद्धव ठाकरे के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। पार्टी चलाने के लिए पैसा कहां से आएगा ये भी उद्धव को देखना होगा।
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समीर चौगांवकर: जिस तरह से उद्धव ठाकरे की पार्टी में टूट हुई है, वो निश्चित रूप से ये उनके लिए बहुत बड़ा झटका है। 2022 की टूट के बाद उद्धव ठाकरे ने खुद को बचा लिया था। इस टूट के बाद भी मुझे लगता है कि महाराष्ट्र बाला साहेब ठाकरे को मानने वाला एक वोट बैंक है जो आगे भी उद्धव के साथ रहेगा। फिलहाल तो उद्धव के लिए बड़ी चुनौती का वक्त है। इसके बाद शरद पवार की पार्टी में टूट की अटकलें भी लगाई जा रही हैं। मुझे लगता है कि ये वक्त क्षेत्रीय दलों के लिए बुरा है। अगला चुनाव उद्धव ठाकरे के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। पार्टी चलाने के लिए पैसा कहां से आएगा ये भी उद्धव को देखना होगा।
श्रीनिवास: तमाम क्षेत्रीय दल कांग्रेस के वोट को लेकर बड़े हुए। इस टूट के वक्त सबसे ज्यादा खुशी कांग्रेस को रही होगी। ये संक्रमण का काल है। आज की राजनीति में जो सत्ता की कुर्सी पर होता है वो चाहता है कि मैं तब तक सत्ता में रहूं जब तक मेरी सांसें चलें। अब राजनीति का स्वरूप बदल गया है। दीर्घकालिक रूप से ये कांग्रेस के लिए फायदे की बात है।
पीयूष पंत: उद्धव ठाकरे राजनीतिक रूप से बहुत कमजोर हो गए हैं। उनके नेतृत्व में एक फाइटिंग स्प्रिट नहीं है। अखिलेश के साथ अभी वो क्राइसेस नहीं है। समाजवादी पार्टी सत्ता में लौट सकती है। जब तक नेताओं को लगता है कि हमारी पार्टी सत्ता में लौट सकती है तब तक उसका एक आकर्षण रहता है। उद्धव का जमीन स्तर पर जुड़ाव कहीं दिखाई नहीं दिया।
पीयूष पंत: उद्धव ठाकरे राजनीतिक रूप से बहुत कमजोर हो गए हैं। उनके नेतृत्व में एक फाइटिंग स्प्रिट नहीं है। अखिलेश के साथ अभी वो क्राइसेस नहीं है। समाजवादी पार्टी सत्ता में लौट सकती है। जब तक नेताओं को लगता है कि हमारी पार्टी सत्ता में लौट सकती है तब तक उसका एक आकर्षण रहता है। उद्धव का जमीन स्तर पर जुड़ाव कहीं दिखाई नहीं दिया।
राकेश शुक्ल: उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले इस तरह की बातें सिर्फ नरेटिव गढ़ने के लिए है। हर राज्य में दो से तीन फीसदी वोट चलायमान होता है। अगर ये नरेटिव बन गया कि अखिलेश यादव अपने सांसदों को ही संभाल नहीं पा रहे हैं तो सरकार कैसे संभालेंगे। मुझे लगता है कि ये उसी की कोशिश है। हालांकि, मुझे नहीं लगता कि सपा के सांसदों में टूट होगी।
विनोद अग्निहोत्री: सवाल ये है कि क्षेत्रीय पार्टियां टूट क्यों रही हैं? ये पार्टियां क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बनी थीं। समय के साथ ये क्षेत्रीय आकांक्षाओं से बदलकर परिवार पर आ गया। दूसरा जब पार्टियां टूटती हैं तो जो सत्ता में होता है उसका पलड़ा भारी होता है। सत्ता मिलने के बाद आपके कार्यकर्ताओं का और नेताओं का मनोबल बढ़ जाता है। कांग्रेस इसका फायदा उठा सकती है, लेकिन कांग्रेस अभी डेलेमा में हैं।
विनोद अग्निहोत्री: सवाल ये है कि क्षेत्रीय पार्टियां टूट क्यों रही हैं? ये पार्टियां क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बनी थीं। समय के साथ ये क्षेत्रीय आकांक्षाओं से बदलकर परिवार पर आ गया। दूसरा जब पार्टियां टूटती हैं तो जो सत्ता में होता है उसका पलड़ा भारी होता है। सत्ता मिलने के बाद आपके कार्यकर्ताओं का और नेताओं का मनोबल बढ़ जाता है। कांग्रेस इसका फायदा उठा सकती है, लेकिन कांग्रेस अभी डेलेमा में हैं।