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High Court: 'बालिकाओं की समानता के लिए लंबा संघर्ष बाकी'; कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा- दहेज और बेटियों पर सोच बदले

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पोर्ट ब्लेयर Published by: शिवम गर्ग Updated Mon, 09 Feb 2026 04:59 PM IST
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सार

कलकत्ता हाईकोर्ट की पोर्ट ब्लेयर बेंच ने दहेज और बेटी के जन्म पर प्रताड़ना से जुड़े एक मामले में कहा कि समाज को बालिकाओं की पूर्ण समानता के लिए अभी लंबा सफर तय करना है।

Long Way to Achieve Complete Equality for Girl Children Says Calcutta High Court Port Blair Bench
कलकत्ता हाईकोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार

कलकत्ता हाईकोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच ने एक बेहद संवेदनशील और झकझोर देने वाले मामले में कहा है कि भारतीय समाज को बालिकाओं के लिए पूर्ण समानता हासिल करने में अभी लंबा रास्ता तय करना है। यह टिप्पणी उस मामले में आई है जिसमें एक महिला ने कथित दहेज प्रताड़ना और बेटी के जन्म के बाद बढ़े उत्पीड़न से तंग आकर अपनी डेढ़ साल की बच्ची की हत्या करने के बाद आत्महत्या कर ली थी।

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हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा महिला के ससुराल पक्ष को दी गई डिस्चार्ज राहत को रद्द करते हुए सख्त रुख अपनाया। अदालत ने मृतका के सास-ससुर, देवर और ननद को चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अपुर्बा सिन्हा रे ने 6 फरवरी को अभियोजन पक्ष की अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि हाल ही में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की विश्व कप जीत और विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों के बावजूद जमीनी सच्चाई अब भी बेहद कड़वी है।
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न्यायमूर्ति रे ने टिप्पणी करते हुए कहा "हालांकि हम अपनी बेटियों की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, लेकिन डेढ़ साल की रुद्रिका की मौत हमें याद दिलाती है कि बालिकाओं के लिए पूर्ण समानता हासिल करने में समाज को अभी बहुत आगे जाना है।" उन्होंने न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर के प्रसिद्ध कथन का भी उल्लेख किया 'कोई भी समाज तब तक स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक अंतिम संकटग्रस्त बेटी भी स्वतंत्र न हो।'

जानिए क्या था मामला

  • अदालत ने गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि मृतका भावना को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया था।
  • भावना ने 8 जुलाई 2021 को पोर्ट ब्लेयर में अपनी बच्ची की गला घोंटकर हत्या करने के बाद फांसी लगाकर जान दे दी थी।
  • उस समय उसका पति कार्यालय में मौजूद था।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सत्र न्यायालय ने केवल पति के खिलाफ ही भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (क्रूरता) और 304B (दहेज मृत्यु) के तहत आरोप तय करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य माने थे, जबकि महिला के रिश्तेदारों के बयानों को नजरअंदाज कर दिया गया। न्यायालय ने सत्र न्यायाधीश को निर्देश दिया कि ससुराल पक्ष को हिरासत में लेकर, कानून के अनुसार जमानत देने पर विचार किया जाए और इसके बाद सभी आरोपियों के खिलाफ उचित धाराओं में आरोप तय किए जाएं।

'बेटी के जन्म के बाद 20 लाख रुपये की अतिरिक्त दहेज मांग'
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि कई गवाहों के बयान इस ओर इशारा करते हैं कि मृतका को लगातार शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी गई। आरोप है कि बेटी के जन्म के बाद ससुराल पक्ष ने 20 लाख रुपये की अतिरिक्त दहेज मांग शुरू कर दी थी, क्योंकि महिला ने पुत्र को जन्म नहीं दिया। वहीं, ससुराल पक्ष की ओर से पेश वकील ने दावा किया कि अधिकांश आरोप मृतका के पति से जुड़े हैं और घटना के समय वे पोर्ट ब्लेयर में मौजूद भी नहीं थे। उन्होंने यह भी कहा कि घटना से पहले किसी प्रकार की दहेज मांग नहीं की गई थी।

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