मणिपुर में सरकार गठन की आहट: चुघ की नियुक्ति से बढ़ी सरगर्मी, BJP के सामने नेतृत्व और समुदाय संतुलन की चुनौती
मणिपुर में विगत लगभग एक साल से राष्ट्रपति शासन लागू है। चुघ को पर्यवेक्षक नियुक्त किए जाने से राज्य में सियासी हलचल तेज होने के आसार हैं। सरकार गठन की कोशिशों के बीच भाजपा के सामने नेतृत्व और समुदाय संतुलन बड़ी चुनौती है। पढ़िए पूर्वोत्तर के इस संवेदनशील राज्य के मौजूदा राजनीतिक समीकरण पर यह रिपोर्ट
विस्तार
मणिपुर में एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियां निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही हैं। राष्ट्रपति शासन की अवधि समाप्त होने से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर स्पष्ट संकेत देते हुए पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री तरुण चुघ को राज्य का केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। इसके साथ ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के विधायकों को दिल्ली बुलाकर सरकार गठन की संभावनाओं पर गहन मंथन शुरू कर दिया गया है। सियासी गलियारों में इसे इस बात का संकेत माना जा रहा है कि भाजपा राज्य में लोकप्रिय सरकार के गठन की दिशा में अब अंतिम चरण में प्रवेश कर चुकी है।
भाजपा संसदीय बोर्ड द्वारा सोमवार को तरुण चुघ की नियुक्ति को औपचारिक प्रक्रिया से कहीं आगे की राजनीतिक पहल माना जा रहा है। आम तौर पर केंद्रीय पर्यवेक्षक की तैनाती तभी की जाती है, जब विधायक दल के नेता के चुनाव और सरकार बनाने की जमीन तैयार हो चुकी हो। पार्टी सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय नेतृत्व यह परखना चाहता है कि मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक हालात में सरकार बनाना कितना व्यावहारिक और टिकाऊ होगा।
इसी क्रम में मणिपुर से एनडीए के करीब 20 विधायक रविवार रात दिल्ली पहुंचे, जबकि अन्य विधायक सोमवार को राजधानी पहुंचे। पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह, विधानसभा अध्यक्ष सत्यव्रत सिंह, पूर्व मंत्री वाई. खेमचंद सिंह और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ए. शारदा देवी सहित कई प्रमुख चेहरे इन बैठकों में शामिल हैं।
यह पूरी कवायद ऐसे समय में हो रही है, जब राष्ट्रपति शासन के दूसरे चरण की अवधि अगले सप्ताह समाप्त हो रही है। मणिपुर में 13 फरवरी 2025 को पहली बार छह महीने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जिसे अगस्त 2025 में बढ़ाया गया। यदि अब भी सरकार का गठन नहीं हो पाता है, तो केंद्र सरकार को संसद के बजट सत्र के दौरान राष्ट्रपति शासन बढ़ाने के लिए दोनों सदनों में वैधानिक प्रस्ताव लाना पड़ेगा।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, भाजपा इस बार केवल संख्या बल के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता और दीर्घकालिक स्थिरता को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहती है। पार्टी के पास विधानसभा में 37 विधायक हैं, जो बहुमत के आंकड़े के करीब हैं, लेकिन असली चुनौती समुदायों के बीच संतुलन साधने की है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक राष्ट्रपति शासन बनाए रखना न तो राजनीतिक रूप से लाभकारी है और न ही प्रशासनिक रूप से आदर्श, इसलिए केंद्र सरकार निर्वाचित सरकार के विकल्प को गंभीरता से आगे बढ़ा रही है।
मणिपुर विधानसभा का मौजूदा गणित
- भाजपा – 37
- एनपीपी – 6
- एनपीएफ – 5
- कांग्रेस – 5
- कुकी पीपुल्स अलायंस – 2
- जद(यू) – 1
- निर्दलीय – 3
- एक सीट खाली है
हालांकि, सरकार गठन की राह में सबसे बड़ी अड़चन कुकी विधायकों का रुख बना हुआ है। भाजपा के कुकी विधायक फिलहाल भविष्य की सरकार में शामिल होने को लेकर खुलकर सहमत नहीं दिख रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, कुकी समुदाय के भीतर भारी दबाव के चलते वे केंद्र सरकार से विधानसभा सहित अलग केंद्र शासित प्रदेश की मांग पर ठोस और सार्वजनिक आश्वासन चाहते हैं। जब तक इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता, तब तक उनका समर्थन अनिश्चित बना रह सकता है।
इसके विपरीत, नगा विधायकों का रुख अपेक्षाकृत व्यावहारिक बताया जा रहा है। नगा पीपुल्स फ्रंट से जुड़े नेताओं का मानना है कि लगातार राष्ट्रपति शासन राज्य के विकास, प्रशासन और राजनीतिक स्थिरता के लिए नुकसानदेह है। वे सरकार गठन के पक्ष में हैं, बशर्ते नई व्यवस्था सभी समुदायों के हितों को साथ लेकर चले।
ये भी पढ़ें- Manipur: मणिपुर में सरकार गठन की तैयारी तेज, दिल्ली में एनडीए की बैठक; 12 फरवरी को खत्म हो रहा राष्ट्रपति शासन
भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर भी मंथन तेज हो गया है। एक ओर एन. बीरेन सिंह का प्रशासनिक अनुभव और संगठन पर पकड़ है, वहीं दूसरी ओर पार्टी नए चेहरे के जरिए नई शुरुआत और नया संदेश देने के विकल्प पर भी विचार कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, अंतिम फैसला इस आधार पर होगा कि कौन सा नेतृत्व मैतेई, कुकी और नगा—तीनों समुदायों के बीच संवाद और भरोसे की बहाली कर सकता है।
सरकार गठन की राह में क्या हैं प्रमुख अड़चनें?
- कुकी विधायकों की अनिच्छा
- अलग केंद्र शासित प्रदेश की मांग
- नेतृत्व के चेहरे पर अंतिम सहमति
- समुदायों के बीच भरोसे की कमी
मौजूदा परिस्थितियों में मणिपुर के सामने आगे क्या रास्ता?
- विधायक दल के नेता का चुनाव करने के बाद सरकार बनाने का दावा
- राज्यपाल के सामने संख्या / बहुमत का दावा
- 13 फरवरी के बाद भी जारी रहेगा राष्ट्रपति शासन
- मणिपुर को लेकर संसद में अहम प्रस्ताव ला सकती है केंद्र सरकार
राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने हालात सामान्य करने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें सुरक्षा बलों से लूटे गए हथियारों को सरेंडर कराने जैसे निर्देश भी शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि मई 2023 में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच शुरू हुई जातीय हिंसा में अब तक कम से कम 260 लोगों की जान जा चुकी है, जिससे राज्य की सामाजिक संरचना गहरे संकट से गुजर रही है।
ये भी पढ़ें- BJP: मणिपुर में विधायक दल का नेता चुनने के लिए तरुण चुग पर्यवेक्षक नियुक्त; खत्म होगा राष्ट्रपति शासन?
कुल मिलाकर, तरुण चुघ की नियुक्ति और विधायकों की दिल्ली मौजूदगी ने मणिपुर की राजनीति को फिर से राष्ट्रीय एजेंडे के केंद्र में ला दिया है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि राज्य को एक निर्वाचित सरकार मिलती है या राष्ट्रपति शासन की अवधि एक बार फिर बढ़ाई जाती है।
