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Hindi News ›   India News ›   'One nation, one election' mechanism may be ready for rollout by 2029: Joint panel chief

क्या 2029 से देश में एक साथ होंगे चुनाव?: जानिए कहां तक पहुंची तैयारी; संयुक्त संसदीय समिति ने क्या कहा

Fri, 10 Jul 2026 03:47 PM IST
निर्मल कांत पीटीआई, पणजी।
पीटीआई, पणजी। Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 10 Jul 2026 03:47 PM IST
सार

देश में एक साथ चुनाव कराने के लिए संसद की संयुक्त समिति इससे जुड़े विधेयकों की जांच कर रही है। समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा कि वर्ष 2029 तक यह व्यवस्था लागू हो सकती है। उनका दावा है कि अब तक राय देने वाले करीब 99 फीसदी लोगों ने इसका समर्थन किया है। पढ़िए रिपोर्ट-

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'One nation, one election' mechanism may be ready for rollout by 2029: Joint panel chief
एक राष्ट्र एक चुनाव - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

संसद की संयुक्त समिति ऐसी व्यवस्था तैयार करने पर काम कर रही है, जिससे 'एक देश, एक चुनाव'  की व्यवस्था वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव तक पूरी तरह लागू की जा सके। यह बात समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने शुक्रवार को कही। समिति एक साथ चुनाव कराने से जुड़े विधेयकों की जांच कर रही है, 
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पीपी चौधरी ने गोवा में समिति की दो दिवसीय बैठक के दौरान पत्रकारों से बात की। इस दौरान उन्होंने कहा कि अब तक जिन नागरिक समाज से जुड़े लोगों और संगठनों से राय ली गई है, उनमें से करीब 99 फीसदी ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि बार-बार चुनाव होने से देश को होने वाले लगभग सात लाख करोड़ रुपये के आर्थिक नुकसान को कम करना इसका मकसद है।
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गोवा के मुख्यमंत्री से क्या चर्चा हुई?
समिति ने संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 पर गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों से चर्चा की। चौधरी ने कहा, हमने मुख्यमंत्री और मंत्रियों से अनौपचारिक बातचीत की। वे गोवा की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। हमने इस बात पर चर्चा की कि 'एक देश, एक चुनाव' कैसे लागू किया जा सकता है, इसमें कौन-कौन सी चुनौतियां हैं और उन्हें इस तरह कैसे दूर किया जाए कि सभी पक्षों के लिए संतुलित और स्वीकार्य व्यवस्था बन सके।  
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किन राज्यों का दौरा कर चुकी समिति?
उन्होंने बताया कि समिति गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली समेत कई राज्यों का दौरा कर चुकी है। वहां समिति ने संविधान विशेषज्ञों, नागरिक समाज के संगठनों, शिक्षाविदों और अन्य लोगों से बातचीत की। राजस्थान के पाली से भाजपा सांसद चौधरी ने कहा कि जिन लोगों से राय ली गई, उनमें बहुत बड़ी संख्या ने एक साथ चुनाव कराने के विचार का समर्थन किया है।

उन्होंने कहा, हमें पता चला है कि करीब 99 फीसदी लोगों, खासकर नागरिक समाज और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया है। अब हमारा प्रयास ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसे सभी राजनीतिक दल स्वीकार कर सकें।  

जब उनसे पूछा गया कि इसे कब तक लागू किया जा सकता है, तो उन्होंने कहा कि समिति अलग-अलग विकल्पों पर विचार कर रही है। इससे संकेत मिलता है कि यह व्यवस्था वर्ष 2029 के अगले लोकसभा चुनाव तक लागू हो सकती है।

कुछ राज्यों में 2029 से पहले भी कराए जा सकते हैं चुनाव: पीपी चौधरी
उन्होंने कहा कि इससे पहले भी कुछ राज्यों के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं, यदि राजनीतिक दल और संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री अपनी इच्छा से अपने चुनावों का समय एक जैसा करने पर सहमत हो जाएं। 

चौधरी ने इस प्रस्ताव के आर्थिक लाभों का जिक्र किया। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति के सामने रखी गई रिपोर्ट का हवाला दिया। 

कोविंद समिति की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
उन्होंने कहा कि कोविंद समिति को दी गई एक आर्थिक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, देश में अलग-अलग समय पर चुनाव कराने से करीब सात लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है। वहीं, यदि चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो देश की अर्थव्यवस्था को उतना ही फायदा हो सकता है। चौधरी ने कहा, अब चुनाव केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहते। यदि देश के किसी भी हिस्से में चुनाव होते हैं, तो उसका असर दूसरे राज्यों पर भी पड़ता है, क्योंकि आज सभी राज्यों की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ी हुई है।  

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उन्होंने गोवा का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी बड़े राज्य में चुनाव होते हैं, तो उसका असर गोवा आने वाले पर्यटकों की संख्या पर पड़ता है। वहीं, अगर गोवा में चुनाव होते हैं, तो वहां के पर्यटन उद्योग पर भी असर पड़ता है।

बार-बार चुनाव का कितना आर्थिक असर?
उन्होंने कहा, आज की अर्थव्यवस्था पूरी दुनिया से जुड़ी हुई है। किसी एक राज्य में पड़ने वाला बुरा असर दूसरे राज्यों पर भी पड़ता है। बार-बार चुनाव होने के आर्थिक असर राज्य की सीमाओं से आगे तक पहुंचते हैं। 


भाजपा सांसद ने यह भी कहा कि बार-बार चुनाव होने से सरकार के कामकाज में बाधा आती है। इसका असर शिक्षा पर भी पड़ता है, क्योंकि शिक्षकों को बार-बार चुनाव से जुड़े कामों में लगाया जाता है। इनमें मतदाता सूची तैयार करना, प्रशिक्षण लेना और मतदान की ड्यूटी करना शामिल है। 

उन्होंने कहा,  इसका नतीजा यह होता है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित होती है। सबसे ज्यादा नुकसान आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के उन बच्चों को होता है, जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। यदि यह स्थिति आने वाले वर्षों तक बनी रही, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। 
 
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