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ऑक्सफोर्ड की डराने वाली रिपोर्ट: हीटवेव की चपेट में भारत के 14 शहर, अहमदाबाद दुनिया का दूसरा सबसे रिस्की जगह
Fri, 10 Jul 2026 05:28 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Fri, 10 Jul 2026 05:28 PM IST
सार
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के नए अध्ययन ने दुनिया के बड़े शहरों में बढ़ते हीटवेव खतरे को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। रिपोर्ट में भारत के 14 शहरों को सबसे अधिक जोखिम वाले शहरों में शामिल किया गया है, जिनमें अहमदाबाद, जयपुर, बंगलूरू, चेन्नई, लखनऊ और पुणे जैसे प्रमुख शहर भी हैं। शोध के मुताबिक, सिर्फ बढ़ता तापमान ही नहीं बल्कि गरीबी, हरियाली की कमी, कमजोर बुनियादी ढांचा और कूलिंग सुविधाओं तक सीमित पहुंच भी इस संकट को और गंभीर बना रही है।
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हीटवेव का खतरा
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
क्या आने वाले वर्षों में भारत के बड़े शहरों में रहना और मुश्किल हो जाएगा? क्या सिर्फ गर्मी ही नहीं, बल्कि शहरों की बनावट भी लोगों की जान के लिए खतरा बनती जा रही है? ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक नए अध्ययन ने ऐसे ही कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दुनिया के 205 बड़े शहरों पर किए गए इस अध्ययन में भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया और घाना के शहरों को सबसे ज्यादा हीट जोखिम वाला बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक खतरे वाले 95 फीसदी से ज्यादा शहर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा उप-सहारा अफ्रीका में मौजूद हैं।
सबसे ज्यादा खतरे में भारत के 14 शहर
अध्ययन में 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों का विश्लेषण किया गया। इराक का अल बसरा दुनिया का सबसे ज्यादा जोखिम वाला शहर पाया गया, जबकि गुजरात का अहमदाबाद दूसरे स्थान पर है। भारत के जिन शहरों को सबसे अधिक खतरे वाली श्रेणी में रखा गया है, उनमें अहमदाबाद, जयपुर, नागपुर, पुणे, चेन्नई, मदुरै, बंगलूरू, कानपुर, लखनऊ समेत कुल 14 शहर शामिल हैं। ये शहर देश के प्रमुख औद्योगिक, आईटी, पर्यटन और कारोबारी केंद्र हैं, जहां करोड़ों लोग रहते हैं।
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सिर्फ तापमान नहीं, ये हैं असली वजहें
रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका नेथमी जयरात्ने करियावासम के मुताबिक, हीटवेव का खतरा केवल अधिक तापमान से तय नहीं होता। शहरों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है। रिपोर्ट में बताया गया है कि बुजुर्ग, बच्चे और आर्थिक रूप से कमजोर लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। जिन इलाकों में एयर कंडीशनिंग जैसी कूलिंग सुविधाएं कम हैं, वहां खतरा और बढ़ जाता है। इसके अलावा शहरों में तेजी से घटती हरियाली और कंक्रीट का फैलाव भी गर्मी को कई गुना बढ़ा देता है।
यह भी पढ़ें: Heatwave: दुनिया में बढ़ते तापमान के बीच जलवायु परिवर्तन ने वैज्ञानिकों को चौंकाया, क्या खत्म हो जाएगी पृथ्वी?
हर ज्यादा गर्म शहर सबसे ज्यादा जोखिम वाला नहीं
अध्ययन में यह भी सामने आया कि सिर्फ अधिक तापमान वाले शहर ही सबसे खतरनाक नहीं होते। उदाहरण के तौर पर बैंकॉक और जेद्दा में गर्मी अधिक पड़ती है, लेकिन वहां बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, मजबूत बुनियादी ढांचा और कूलिंग व्यवस्था होने के कारण जोखिम अपेक्षाकृत कम है। वहीं कराची, फैसलाबाद और नाइजीरिया के कादुना जैसे शहरों में तापमान अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद कमजोर व्यवस्थाओं के कारण लोगों पर खतरा अधिक है।
क्या एसी ही समाधान है?
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर राधिका खोसला का कहना है कि दुनिया भर में एयर कंडीशनर की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। बड़ी आबादी के लिए एसी खरीदना संभव नहीं है और यदि पूरी दुनिया इसी पर निर्भर हो गई तो बिजली की खपत और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ेगा, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और तेज हो सकती है।
कैसे कम होगा खतरा?
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि शहरों में बड़े पैमाने पर पेड़-पौधे लगाए जाएं, पारंपरिक और कम ऊर्जा खपत वाले कूलिंग उपायों को बढ़ावा दिया जाए तथा भवनों और शहरों की योजना इस तरह बनाई जाए कि गर्मी का असर कम हो। उनका मानना है कि केवल एसी पर निर्भर रहने के बजाय प्राकृतिक और टिकाऊ उपाय अपनाना ही भविष्य का रास्ता है।
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दुनिया के 205 बड़े शहरों पर किए गए इस अध्ययन में भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया और घाना के शहरों को सबसे ज्यादा हीट जोखिम वाला बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक खतरे वाले 95 फीसदी से ज्यादा शहर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा उप-सहारा अफ्रीका में मौजूद हैं।
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सबसे ज्यादा खतरे में भारत के 14 शहर
अध्ययन में 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों का विश्लेषण किया गया। इराक का अल बसरा दुनिया का सबसे ज्यादा जोखिम वाला शहर पाया गया, जबकि गुजरात का अहमदाबाद दूसरे स्थान पर है। भारत के जिन शहरों को सबसे अधिक खतरे वाली श्रेणी में रखा गया है, उनमें अहमदाबाद, जयपुर, नागपुर, पुणे, चेन्नई, मदुरै, बंगलूरू, कानपुर, लखनऊ समेत कुल 14 शहर शामिल हैं। ये शहर देश के प्रमुख औद्योगिक, आईटी, पर्यटन और कारोबारी केंद्र हैं, जहां करोड़ों लोग रहते हैं।
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सिर्फ तापमान नहीं, ये हैं असली वजहें
रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका नेथमी जयरात्ने करियावासम के मुताबिक, हीटवेव का खतरा केवल अधिक तापमान से तय नहीं होता। शहरों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है। रिपोर्ट में बताया गया है कि बुजुर्ग, बच्चे और आर्थिक रूप से कमजोर लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। जिन इलाकों में एयर कंडीशनिंग जैसी कूलिंग सुविधाएं कम हैं, वहां खतरा और बढ़ जाता है। इसके अलावा शहरों में तेजी से घटती हरियाली और कंक्रीट का फैलाव भी गर्मी को कई गुना बढ़ा देता है।
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हर ज्यादा गर्म शहर सबसे ज्यादा जोखिम वाला नहीं
अध्ययन में यह भी सामने आया कि सिर्फ अधिक तापमान वाले शहर ही सबसे खतरनाक नहीं होते। उदाहरण के तौर पर बैंकॉक और जेद्दा में गर्मी अधिक पड़ती है, लेकिन वहां बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, मजबूत बुनियादी ढांचा और कूलिंग व्यवस्था होने के कारण जोखिम अपेक्षाकृत कम है। वहीं कराची, फैसलाबाद और नाइजीरिया के कादुना जैसे शहरों में तापमान अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद कमजोर व्यवस्थाओं के कारण लोगों पर खतरा अधिक है।
क्या एसी ही समाधान है?
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर राधिका खोसला का कहना है कि दुनिया भर में एयर कंडीशनर की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। बड़ी आबादी के लिए एसी खरीदना संभव नहीं है और यदि पूरी दुनिया इसी पर निर्भर हो गई तो बिजली की खपत और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ेगा, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और तेज हो सकती है।
कैसे कम होगा खतरा?
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि शहरों में बड़े पैमाने पर पेड़-पौधे लगाए जाएं, पारंपरिक और कम ऊर्जा खपत वाले कूलिंग उपायों को बढ़ावा दिया जाए तथा भवनों और शहरों की योजना इस तरह बनाई जाए कि गर्मी का असर कम हो। उनका मानना है कि केवल एसी पर निर्भर रहने के बजाय प्राकृतिक और टिकाऊ उपाय अपनाना ही भविष्य का रास्ता है।